FPI Equity vs Debt Investment: भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की खरीदारी और बिकवाली हमेशा सुर्खियों में रहती है। जब विदेशी निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालते हैं तो बाजार में गिरावट और अर्थव्यवस्था पर उसके असर को लेकर खूब चर्चा होती है। इस साल भी FPIs भारतीय इक्विटी बाजार से बड़ी रकम निकाल चुके हैं, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ी है। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच FPIs के डेट बाजार में निवेश की चर्चा शायद ही कभी होती है।
हकीकत यह है कि विदेशी निवेशक केवल भारतीय शेयरों में ही नहीं, बल्कि सरकारी बॉन्ड और अन्य डेट इंस्ट्रूमेंट में भी बड़े पैमाने पर निवेश करते रहे हैं। यही निवेश कई बार अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा साबित हुआ है। डीएसपी म्युचुअल फंड की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशकों में भारत को डेट बाजार में मिला FPIs निवेश, इक्विटी निवेश की तुलना में भले कम दिखता हो, लेकिन उसका आकार और अर्थव्यवस्था को मिलने वाला समर्थन किसी भी तरह से कम महत्वपूर्ण नहीं है।
ऐसे समय में जब FPIs का इक्विटी निवेश कमजोर पड़ रहा है और विदेशी पूंजी निवेश दबाव में है, डेट बाजार में आने वाला विदेशी निवेश रुपये को सहारा देने, चालू खाते के घाटे की भरपाई और अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है।
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों (FPIs) का मोहभंग होता दिख रहा है। जून के पहले हफ्ते में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से करीब 43,000 करोड़ रुपये (सटीक आंकड़ा 42,927 करोड़ रुपये) निकाल लिए हैं। वैश्विक स्तर पर टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में आ रहे नए मौकों और डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार आ रही कमजोरी की वजह से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय बाजार से ताबड़तोड़ पैसे निकाल रहे हैं।
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के मुताबिक, इस ताजा बिकवाली के साथ ही साल 2026 में अब तक भारतीय इक्विटी मार्केट से कुल 2.67 लाख करोड़ रुपये बाहर निकल चुके हैं। यह आंकड़ा पिछले पूरे साल 2025 में हुई 1.66 लाख करोड़ रुपये की कुल निकासी से भी कहीं ज्यादा है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का भारत के डेट बाजार में निवेश आम धारणा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है और आने वाले समय में यह अर्थव्यवस्था को सहारा देने का एक बड़ा स्रोत बन सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, निवेशकों का ध्यान आमतौर पर FPIs के इक्विटी निवेश पर केंद्रित रहता है, लेकिन डेट बाजार में भी वर्षों से उल्लेखनीय विदेशी निवेश आया है। वित्त वर्ष 1999 से अब तक भारत को FPIs के जरिए इक्विटी में 154.4 अरब डॉलर और डेट बाजार में 95.5 अरब डॉलर का निवेश प्राप्त हुआ है। यानी विदेशी निवेशकों द्वारा भारत में लगाए गए हर 100 डॉलर में करीब 38 डॉलर डेट बाजार में आए हैं, लेकिन इस निवेश की चर्चा बहुत कम होती है।
डेट में आया यह निवेश कुल इक्विटी निवेश का 62 फीसदी और इक्विटी व डेट दोनों को मिलाकर कुल FPIs निवेश का लगभग 38 फीसदी है।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल बॉन्ड इंडाइसेस में भारत के शामिल होने के बाद विदेशी निवेशकों के डेट निवेश का स्वरूप बदल गया है। सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश के लिए Debt-FAR प्रमुख माध्यम बनकर उभरा है। बता दें कि Debt-FAR (Fully Accessible Route) एक विशेष व्यवस्था है, जिसके तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को चुनिंदा भारतीय सरकारी बॉन्ड में बिना किसी निवेश सीमा के निवेश करने की अनुमति मिलती है। RBI ने इसे 2020 में शुरू किया था ताकि विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय डेट बाजार तक पहुंच आसान बनाई जा सके। FAR के तहत निवेश पर सामान्य निवेश सीमा लागू नहीं होती, जिससे यह वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक विकल्प बन गया है।
वित्त वर्ष 2025 से अब तक भारत को FPIs के जरिए डेट बाजार में लगभग 19.3 अरब डॉलर का निवेश प्राप्त हुआ है। इसमें से 11.8 अरब डॉलर का निवेश केवल Debt-FAR के जरिए आया है। मार्च 2025 FPIs डेट निवेश के लिए अब तक का सबसे मजबूत महीना रहा। इस दौरान भारत में 4.3 अरब डॉलर का डेट निवेश आया। इसमें से 3.3 अरब डॉलर का निवेश केवल FAR रूट के जरिए हुआ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले FPIs के लिए कैपिटल गेंस टैक्स हटाने का प्रस्ताव लागू होता है, तो FAR रूट भारतीय डेट बाजार में निवेश करने के इच्छुक वैश्विक निवेशकों के लिए लगभग खुला और टैक्स के लिहाज से ज्यादा बेहतर माध्यम बन सकता है। इससे सरकार को अपनी उधारी जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिल सकती है।
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फंड हाउस के एनालिसिस के अनुसार, FPIs के डेट निवेश का सबसे मजबूत दौर 2010 से 2015 के बीच रहा। मार्च 2010 से फरवरी 2015 तक के पांच वर्षों में भारत को FPIs के जरिए डेट बाजार में 46.5 अरब डॉलर का निवेश मिला। इस दौरान 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूतियों (G-Sec) पर औसत यील्ड 8.23 फीसदी रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2014 से अप्रैल 2015 का समय सबसे अनुकूल हाई-यील्ड वाला दौर था। इस अवधि में भारत को 29.4 अरब डॉलर का डेट निवेश प्राप्त हुआ। उस समय 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की औसत यील्ड 8.23 फीसदी, औसत महंगाई दर 5.62 फीसदी और रियल यील्ड 2.61 फीसदी थी।
एनालिसिस में कहा गया है कि विदेशी निवेशक केवल हाई नॉमिनल यील्ड से ही आकर्षित नहीं होते, बल्कि पॉजिटिव रियल यील्ड (यानी महंगाई को घटाने के बाद मिलने वाला वास्तविक रिटर्न) भी उनके निवेश फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन अवधियों में 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड 8 फीसदी से ज्यादा रही, उन महीनों में 35.8 अरब डॉलर का निवेश आया। वहीं, जब रियल यील्ड 2 फीसदी से ऊपर रही, तब भारत को कुल 51.6 अरब डॉलर का FPIs डेट निवेश प्राप्त हुआ।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फिलहाल सरकारी प्रतिभूतियों पर रियल यील्ड 2 फीसदी के स्तर से काफी ज्यादा है, जो विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने वाला एक अहम फैक्टर हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि FPIs डेट निवेश भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि डेट निवेश में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, लेकिन समय-समय पर इसने अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण सहारा दिया है। वर्ष 2003 से अब तक भारत को विदेशी निवेशकों के जरिए शुद्ध रूप से 95.3 अरब डॉलर का डेट निवेश प्राप्त हुआ है।
मार्च 2023 से फरवरी 2026 के बीच की अवधि में ही भारत को 34.5 अरब डॉलर का डेट निवेश मिला। इस दौरान 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की औसत यील्ड 6.8 फीसदी और रियल यील्ड 2.8 फीसदी रही।
रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे समय में जब कमजोर इक्विटी FPIs निवेश और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में निकासी के कारण पूंजी खाते (capital account) पर दबाव बना हुआ है, डेट निवेश चालू खाते के घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) की फंडिंग में मदद कर सकता है। इसके अलावा, यह रुपये पर दबाव कम करने और नीति निर्माताओं को बाहरी क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक अतिरिक्त साधन उपलब्ध करा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में डेट बाजार में आने वाला विदेशी निवेश, इक्विटी निवेश की तुलना में अपेक्षाकृत ज्यादा स्थिर साबित हो सकता है।
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रिपोर्ट के अनुसार, FPIs का डेट निवेश चार प्रमुख कारकों से प्रभावित होता है— पॉजिटिव रियल यील्ड, मुद्रा के स्थिर या मजबूत होने की उम्मीद, निवेश के लिए आसान पहुंच (मार्केट एक्सेस) और वैश्विक स्तर पर निवेशकों की जोखिम लेने की अनुकूल प्रवृत्ति।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में भारत मजबूत रियल यील्ड प्रदान कर रहा है। साथ ही रुपये के मूल्यांकन को लेकर भी निवेशकों का भरोसा बेहतर हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार तक पहुंच बढ़ाना एक महत्वपूर्ण नीतिगत साधन है और FAR (फुली एक्सेसिबल रूट) फ्रेमवर्क पहले से ही विदेशी निवेशकों को निवेश की बुनियादी सुविधा उपलब्ध करा रहा है। इसके अलावा, कैपिटल गेंस टैक्स हटाने का प्रस्ताव लागू होने पर विदेशी निवेशकों को टैक्स में कटौती के बाद बेहतर रिटर्न मिल सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता भारत के नियंत्रण में नहीं है, लेकिन 2014-15, 2017 और हाल के बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने के दौर जैसे उदाहरण बताते हैं कि अनुकूल वैश्विक परिस्थितियां भारत में बड़े पैमाने पर डेट निवेश ला सकती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को भविष्य में भी चालू खाते के घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) का सामना करना पड़ेगा और इसकी भरपाई के लिए उसे इक्विटी आधारित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDIs) के जरिए विदेशी पूंजी आकर्षित करनी होगी। हालांकि, डेट निवेश भी एक सहायक समाधान के रूप में काम कर सकता है, जो प्रतिकूल वैश्विक परिस्थितियों में अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, यह केवल कीमती धातुओं के आयात पर शुल्क बढ़ाकर चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने की कोशिश करने से ज्यादा प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) ऐसे विदेशी व्यक्ति, संस्थान या फंड होते हैं जो भारत के फाइनेंशियल सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं, लेकिन कंपनियों के प्रबंधन या नियंत्रण में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी नहीं लेते। इनमें पेंशन फंड, सॉवरेन वेल्थ फंड, म्युचुअल फंड, बीमा कंपनियां, हेज फंड और एसेट मैनेजमेंट कंपनियां शामिल हो सकती हैं।
FPIs भारत में निवेश करने के लिए भारतीय बाजार नियामक सेबी (SEBI) के नियमों के तहत पंजीकरण कराते हैं। इनका निवेश आमतौर पर लिस्टेड शेयरों, सरकारी बॉन्ड, कॉरपोरेट बॉन्ड, ट्रेजरी बिल, म्युचुअल फंड यूनिट्स, ETF, डिबेंचर और कुछ अन्य फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स में होता है। FPIs का मकसद भारतीय अर्थव्यवस्था और पूंजी बाजारों से रिटर्न कमाना होता है, जबकि उनका निवेश अपेक्षाकृत आसानी से बाजार से निकल भी सकता है।
इक्विटी शेयर (Stocks)
सरकारी प्रतिभूतियां (Government Securities/G-Secs)
कॉरपोरेट बॉन्ड
ट्रेजरी बिल (T-Bills)
डिबेंचर और बॉन्ड
म्युचुअल फंड यूनिट्स
एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF)
डेरिवेटिव्स (Futures & Options)
कमर्शियल पेपर और अन्य अनुमत डेट इंस्ट्रूमेंट्स