लड़ाई शुरू होने के बाद से वैश्विक वित्तीय बाजारों में हुए उथल-पुथल भरे दौर के बाद ताजा तेजी ने कुछ हद तक राहत दी है। संघर्ष बढ़ने के बाद के सप्ताहों में भारतीय शेयर बाजार में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति देखने को मिली। इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 45 प्रतिशत की उछाल, रुपये में कमजोरी और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के कारण प्रमुख सूचकांकों में 11 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई।
संघर्ष से पहले लगभग 91 के स्तर पर रहने वाला रुपया अपने सबसे कमजोर स्तर 95 रुपये के पार चला गया। इस दौरान इंडिया वीआईएक्स दोगुना से अधिक हो गया, जिससे निवेशकों की बढ़ी हुई चिंता जाहिर होती है। अन्य परिसंपत्ति वर्गों ने सीमित राहत प्रदान की। बॉन्ड यील्ड में वृद्धि ने फिक्स्ड-इनकम के आकर्षण को कम कर दिया, जबकि सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट ने पारंपरिक सुरक्षित निवेश विकल्प की लोकप्रियता फीकी की। वैश्विक स्तर पर धातुओं की कीमतें गिरीं, जबकि डॉलर इंडेक्स में बढ़त हुई।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने बिकवाली जारी रखी। उन्होंने भारतीय इक्विटी बाजारों में लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये की निकासी की, जो उनकी किसी एक महीने में सबसे बड़े बिकवाली में से एक थी। लेकिन घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने अहम सहारा दिया, जिससे बिकवाली का दबाव कम करने में मदद मिली।
सेक्टर के हिसाब से देखें तो नुकसान हर तरफ था। लेकिन फाइनैंशियल, ऑटो और रियल एस्टेट जैसे दर-संवेदी क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा मार पड़ी। व्यापक बाजारों में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे रिटेल और हाई-बीटा निवेशकों के बीच जोखिम से बचने की भावना स्पष्ट रूप से देखी गई।
इस माहौल में, बुधवार की बड़ी तेजी धारणा में बदलाव का संकेत है। इसे तेल की कीमतों में नरमी और तनाव कम होने की उम्मीदों से मदद मिली। लेकिन
भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी बने हुए हैं और ऊर्जा बाजार अभी पूरी तरह से स्थिर नहीं हुए हैं। इसलिए बाजार के कारोबारी इस रिकवरी के टिकाऊ होने को लेकर अभी भी सतर्क हैं।