एचएसबीसी ने भारतीय शेयरों की रेटिंग न्यूट्रल से घटाकर अंडरवेट कर दी है। इसके लिए उसने बढ़ती महंगाई, ऊर्जा की ऊंची कीमतों और घरेलू मांग में संभावित सुस्ती से कमाई पर बढ़ते जोखिमों का हवाला दिया है। गुरुवार को जारी एक नोट में ब्रोकरेज फर्म ने कहा कि भारत की आयातित ऊर्जा पर निर्भरता और इसके चलते महंगाई तथा घरेलू मांग पर पड़ने वाले जोखिमों ने कमाई में जारी सुधार की स्थिरता पर संदेह पैदा कर दिया है।
एचएसबीसी के इक्विटी रणनीतिकार प्रमुख (एशिया प्रशांत) हेरल्ड वैन डेर लिंडे ने लिखा है, हमें उम्मीद है कि आने वाले महीनों में कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए 16 फीसदी सालाना वृद्धि की मौजूदा उम्मीदों के मुकाबले आम सहमति वाले अनुमानों में कमी की जाएगी। हालांकि मूल्यांकन अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे आ गए हैं, लेकिन जैसे-जैसे कमाई के अनुमानों में गिरावट का असर दिखेगा, वे ऊंचे ही नजर आएंगे। मौजूदा आर्थिक माहौल में भारत अपने उत्तर-पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में कम आकर्षक लग रहा है।
ब्रोकरेज फर्म ने दक्षिण कोरिया की रेटिंग अंडरवेट से बढ़ाकर न्यूट्रल कर दी है और उसे वृद्धि की आकर्षक कहानी बताया है। ब्रोकरेज ने महंगाई में फिर से तेजी आने के जोखिम की भी चेतावनी दी है, खासकर अगर राज्यों के चुनावों के बाद ईंधन की कीमतें बढ़ाई जाती हैं। फर्म ने कहा कि ज्यादा महंगाई से उपभोग मांग घट सकती है और नॉन-परफॉर्मिंग लोन (एनपीएल) बढ़ने से वित्तीय व्यवस्था पर दबाव आ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, रुपये में कमजोरी के कारण भारत को लेकर विदेशी निवेशकों का रुख अभी भी सतर्क बना हुआ है। वैन डेर लिंडे ने कहा, विदेशी मुद्रा के मूल्य में तेजी से आई गिरावट ने रिटर्न पर असर डाला है और हमारे फॉरेक्स रणनीतिकार के अनुसार अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारतीय रुपये पर और कमजोर होने का दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, निवेशक अब एआई के संभावित प्रभावों पर, खासकर सॉफ्टवेयर सेवाओं के क्षेत्र में, ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। कुल मिलाकर, इन सभी कारकों से विदेशी निवेश का प्रवाह सीमित रहने की संभावना है।
हालांकि घरेलू निवेश का मजबूत प्रवाह, खास तौर पर सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी के जरिये, एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन एचएसबीसी का मानना है कि अगर आईपीओ की गतिविधियों को फिर से तेज करना है तो विदेशी मांग का वापस आना जरूरी है। लेकिन एचएसबीसी ने यह भी कहा कि भारत में अभी भी कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में निवेश के अवसर हैं, खास तौर पर निजी क्षेत्र के बैंकों, मूल धातुओं और हेल्थकेयर सेक्टर के कुछ हिस्सों में, भले ही व्यापक बाज़ार में चुनौतियां बढ़ रही हों।