जैसे-जैसे वैश्विक निवेशक दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं, भारतीय इक्विटी की रैंकिंग नीचे खिसक गई है। मॉर्गन स्टैनली के प्रबंध निदेशक और मुख्य इक्विटी रणनीतिकार (भारत) रिधम देसाई का कहना है कि भारत को लेकर जो निराशा का माहौल है, वह पूर्ण विकास के बजाय सापेक्ष वृद्धि से ज्यादा जुड़ा है। मॉर्गन स्टैनली इंडिया इन्वेस्टमेंट फोरम 2026 से पहले मुंबई में समी मोडक और सुंदर सेतुरामन के साथ एक साक्षात्कार में देसाई ने तर्क दिया कि निवेशकों का रुख अत्यधिक मंदी वाला हो गया है। लेकिन जल्द ही नजरिया सकारात्मक होना शुरू हो सकता है। बातचीत के मुख्य अंश:
विदेशी ब्रोकरेज और निवेशकों के बीच भारत को लेकर निराशा बढ़ती दिख रही है। इस धारणा का क्या कारण है?
यह निराशा मोटे तौर पर भारत की सापेक्ष वृद्धि को लेकर है, न कि उसकी निरपेक्ष वृद्धि को लेकर। पिछली दो तिमाहियों में भारत की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। लेकिन अमेरिका, दक्षिण कोरिया, ताइवान और यहां तक कि जापान जैसे बाजारों की तुलना में इसकी वृद्धि अभी भी उतनी प्रभावशाली नहीं लगती।
इस समय वैश्विक वृद्धि को जो चीज आगे बढ़ा रही है, वह है एआई की अगुआई में भारी निवेश का दौर, विशेष रूप से डेटा केंद्रों, सेमीकंडक्टर, मेमरी चिप, ऊर्जा सुविधाओं और निर्माण के क्षेत्र में। उम्मीद है कि अमेरिका की शीर्ष तकनीकी दिग्गज कंपनियां इस साल पूंजीगत व्यय पर लगभग 800 अरब डॉलर और अगले साल 1 लाख करोड़ डॉलर से अधिक खर्च करेंगी।
वृद्धि के अलावा भारत में निवेशक धारणा किससे प्रभावित हो रही है?
दूसरी बड़ी चिंता भारत के सेवा निर्यात मॉडल के लिए एआई के कारण होने वाली संभावित उथल-पुथल है। भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक सेवा निर्यात पर निर्भर है और दुनिया भर में धारणा बढ़ रही हैकि एआई इस काम का बड़ा हिस्सा हथिया सकता है।
मैं व्यक्तिगत रूप से इस विचार से सहमत नहीं हूं। लेकिन बाजार अभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि एआई से भारत की मध्यम से लंबी अवधि की वृद्धि की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। यह सब ऐसे समय हो रहा है जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) पैसा बाहर ले जा रहे हैं और घरेलू कंपनियां विदेश में निवेश बढ़ा रही हैं।
ये चिंताएं कुछ समय की हैं या फिर बरकरार रह सकती हैं?
एआई पूंजीगत खर्च चक्र कुछ समय तक रह सकता है। हालांकि भारत के सेवा निर्यात से जुड़ी चिंताएं धीरे धीरे कम हो जाएंगी, क्योंकि डेटा कुछ और ही साबित करने लगेंगे। असल में, अप्रैल के सेवा निर्यात के आंकड़ों ने चौंकाया है और वैश्विक टेक्नॉलजी कंपनियां भारत में लगातार हायरिंग बढ़ा रही हैं।
इससे पता चलता है कि वे अब भी भारत को बड़े पैमाने पर कुशल टैलेंट के लिए सबसे अच्छी जगह मानती हैं। मेरा अपना मानना है कि एआई भारत के सेवा क्षेत्र के लिए खतरा बनने के बजाय असल में एक बड़ा अवसर बन सकता है।
आप अगले एक साल में कमाई में बढ़ोतरी के रुझान को किस तरह देख रहे हैं?
भारत ने पिछले साल कर कटौती, दर कटौती और तरलता समर्थन के जरिये कई प्रोत्साहन दिए। आय पर अब इनका असर दिखना शुरू हो गया है और भविष्य में इसमें और मजबूती आनी चाहिए। अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा नहीं खिंचा तो वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत की वृद्धि दर का अंतर कम हो सकता है। एक बार ऐसा हुआ तो पूंजी की निकासी कम हो जानी चाहिए और भुगतान संतुलन की स्थिति में सुधार होना चाहिए।
दिलचस्प यह है कि जहां एक ओर विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बेच रहे हैं, वहीं पिछले कुछ महीनों में विदेशी ऋण प्रवाह सकारात्मक बना हुआ है। ब्लूमबर्ग बॉन्ड इंडेक्स में भारत का शामिल किए जाने की संभावना एक महत्त्वपूर्ण सकारात्मक कारक है।
मौजूदा मूल्यांकन पर भारतीय इक्विटी बाजार कितने आकर्षक हैं?
जब मैं भारत के सापेक्ष मूल्यांकन को देखता हूं, तो ये मेरे 35 साल के करियर में अब तक के सबसे कम स्तर पर है। पिछले 12 महीनों का सापेक्ष प्रदर्शन भी सबसे कमजोर रहा है और विदेशी निवेशकों की स्थिति 16-17 साल के निचले स्तर पर है। इसीलिए मेरा मानना है कि बाजार भारत को लेकर जरूरत से ज्यादा निराशावादी हो गया है।
इसके विपरीत नजरिये से देखें, तो आमतौर पर यही वह समय होता है जब निवेशकों को सकारात्मक रुख अपनाना शुरू कर देना चाहिए। अगर आप लंबी अवधि, मान लीजिए चार से पांच साल, का नजरिया रखते हैं, तो मुझे लगता है कि भारत दुनिया का सबसे आकर्षक मूल्यांकन वाला इक्विटी बाजार है।