बोफा सिक्योरिटीज में इंडिया रिसर्च के प्रमुख अमीश शाह का कहना है कि भले ही भारतीय इक्विटी बाजारों में गिरावट आई हो, लेकिन उनके मूल्यांकन अभी सिर्फ लंबे समय के औसत स्तर पर ही लौटे हैं और वे दूसरे उभरते बाजारों (ईएम) के मुकाबले अब भी महंगे हैं। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कमोडिटी की कीमतों में उछाल से इस वैश्विक ब्रोकरेज फर्म ने भारत की कमाई के अनुमान को काफी कम कर दिया है।
उसके बेस केस के मुताबिक निफ्टी दिसंबर 2026 तक लगभग 15 फीसदी बढ़कर 26,200 तक पहुंच सकता है, लेकिन इसमें गिरावट का जोखिम अभी भी बना हुआ है। मंदी की सूरत में 8 फीसदी की संभावित गिरावट और सबसे खराब स्थिति में 23 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। मुंबई में समी मोडक को दिए इंटरव्यू में शाह ने कहा कि बाजार में आगे कोई भी बढ़त कंपनियों की आय में बढ़ोतरी से आएगी, न कि मूल्यांकन में विस्तार से। उनसे बातचीत के अंश:
आपने निफ्टी की आय में बढ़ोतरी का अनुमान 14 प्रतिशत से घटाकर 11 किया और अब 8 प्रतिशत कर दिया है। इतनी बड़ी कटौती क्यों?
मेरा मानना है कि हमारी पिछली कटौती (14 से 11 प्रतिशत तक) भी काफी सतर्कता के साथ और काफी जल्दी की गई थी, संघर्ष शुरू होने के करीब तुरंत बाद ही। तब से हमने जिन कुछ जोखिमों की ओर इशारा किया था, वे वाकई सामने आ चुके हैं। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं और उनके जल्द ही युद्ध से पहले के स्तर पर वापस आने की संभावना नहीं है। आपूर्ति में रुकावटें दूर होने में समय लगेगा, चाहे वह एलएनजी हो या एल्युमीनियम जैसी कमोडिटी की। इसलिए, उत्पादन लागत का दबाव अब वास्तविक है और सभी क्षेत्रों में साफ दिखाई दे रहा है। इसके अलावा, हम भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा 50 आधार अंक की दर वृद्धि को भी ध्यान में रख रहे हैं, क्योंकि महंगाई को नियंत्रित करना जरूरी होगा।
यदि कमाई में वृद्धि धीमी पड़ जाती है, तो क्या इससे मूल्यांकन में गिरावट करनी पड़ेगी?
जरूरी नहीं। बाजार आगे की ओर देखते हैं। हमारा मूल्यांकन ढांचा वित्त वर्ष 2028 की कमाई पर आधारित है, जिसे हम ज्यादा सामान्य मानते हैं। इस लिहाज से, हम वित्त वर्ष 2027 की कमजोर आय के लिए बाजार को कोई सजा नहीं दे रहे हैं। फिर भी इसका कुछ परोक्ष असर तो पड़ता ही है, क्योंकि वित्त वर्ष 2028 में वृद्धि निचले आधार से शुरू होगी। लेकिन इससे मूल्यांकन पर कोई बहुत बड़ा झटका नहीं लगेगा।
विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि इसमें बदलाव आएगा?
इसके दो जवाब हैं। हां, संघर्ष समाप्त होने पर उनके निवेश में सुधार हो सकता है क्योंकि मौजूदा बिकवाली का एक हिस्सा शॉर्ट सेलिंग से जुड़ा है। यह मसला खत्म हो जाएगा तो कम मूल्यांकन कुछ निवेश आकर्षित कर सकता है। लेकिन लड़ाई नहीं होती तब भी भारत तुलनात्मक रूप से अच्छी स्थिति में नहीं है। अन्य उभरते बाजार (ईएम) कहीं बेहतर वृद्धि-समायोजित मूल्यांकन की पेशकश करते हैं।
उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरिया से लगभग 180 प्रतिशत आय वृद्धि की उम्मीद है और वह लगभग 7 गुना पी/ई पर कारोबार कर रहा है। ताइवान में लगभग 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी है और वह 18 गुना पर है। चीन के लिए यह लगभग 14 प्रतिशत है और वह 11 गुना पर कारोबार कर रहा है। दूसरी ओर, भारत में 8-14 प्रतिशत की बढ़ोतरी की उम्मीद है, लेकिन वह लगभग 19 गुना पर कारोबार कर रहा है। इसलिए, एक वैश्विक आवंटक के नजरिये से भारत तुलनात्मक रूप से महंगा है।
क्या इसका मतलब यह है कि भारत का मूल्यांकन प्रीमियम और घट जाएगा?
हमारे नजरिये से देखें तो भारत अभी अपने दीर्घावधि औसत मल्टीपल के आसपास कारोबार कर रहा है। पहले, बाजार में एक प्रीमियम होता था, यानी एक या दो स्टैंडर्ड डेविएशन ज्यादा, लेकिन वह प्रीमियम शायद इतनी आसानी से वापस न आए।
तो अब बाजारों में तेजी कैसे आएगी?
सीधे शब्दों में कहा जा सकता है कि कमाई से बाजारों की चाल तय हो सकती है। हमें यहां से मूल्यांकन की वजह से कोई बढ़त की गुंजाइश नहीं दिख रही है।