भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) मार्जिन ट्रेडिंग सुविधा (एमटीएफ) के नियमों में बड़े बदलाव पर विचार कर रहा है, जिससे इसमें ज्यादा लचीलापन और परिचालन संबंधी छूट मिल सकेगी। सूत्रों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नियामक सभी एक्सचेंजों में डायनामिक प्राइस बैंड लागू करने पर भी चर्चा कर रहा है।
सेबी की द्वितीयक बाजार सलाहकार समिति (एसएमएसी), जिसे बाजार के बुनियादी ढांचे और पारदर्शिता में सुधार का काम सौंपा गया है, ने पिछले हफ्ते इस इकोसिस्टम के लिए कई सुधारों पर चर्चा की। बैठक में एमटीएफ के ढांचे में बदलावों पर फैसले को अंतिम रूप दिया गया। एमटीएफ के तहत निवेशकों को ट्रेड की कुल कीमत का सिर्फ एक हिस्सा ही पहले से चुकाने की सुविधा होती है। बाकी रकम ब्रोकर ब्याज पर देते हैं।
सेबी ने एमटीएफ के लिए पात्र कोलैटरल का दायरा बढ़ाने और ब्रोकरों के लिए एमटीएफ सेवाएं देने हेतु नेटवर्थ की जरूरत बढ़ाने पर चर्चा की है। पात्र कोलैटरल का दायरा बढ़ाने की अपनी कोशिश में नियामक सरकारी प्रतिभूतियां, म्युचुअल फंडों, एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों और रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (रीट्स) और इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (इनविट्स) के यूनिटों को शामिल कर सकता है।
एक जानकार ने कहा, नियामक एमटीएफ बाजार का विस्तार करने पर विचार कर रहा है। प्रस्तावित बदलावों के बाद कोई भी एमटीएफ में सिर्फ ग्रुप-1 प्रतिभूतियों में ही निवेश जारी रख पाएगा, लेकिन जहां तक कोलैटरल की बात है तो इसे ग्रुप-1 से बढ़ाकर ईटीएफ, म्युचुअल फ़ंड और एनसीडी तक किया जा सकेगा।
नियामक ने लिक्विड एसेट को गिरवी रखने और उनके इस्तेमाल की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कुछ उपायों पर भी चर्चा की है। यह ऐसी प्रक्रिया है जिसे विशेषज्ञों ने फिलहाल काफी मुश्किल बताया है। उद्योग के एक जानकार ने बताया, प्रतिभूतियों के बदले कर्ज के तहत कोई भी व्यक्ति प्रतिभूतियों को गिरवी रखकर किसी भी मकसद के लिए कर्ज ले सकता है। इस मामले में कोई भी व्यक्ति तरल प्रतिभूतियों को गिरवी रखकर उन पर मिलने वाली लिमिट का इस्तेमाल सिर्फ एमटीएफ में निवेश के लिए कर पाएगा।
एमटीएफ फ्रेमवर्क में दी गई छूट से कैश सेगमेंट में वॉल्यूम बढ़ाने में मदद मिलेगी। ग्राहकों के लिए लिवरेज के मौकों में बढ़ोतरी के साथ-साथ कैश वॉल्यूम भी बढ़ेगा। ये चर्चाएं ऐसे समय हो रही हैं, जब बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ा है। पिछले दो महीनों में एमटीएफ खातों में भी कुछ नरमी देखने को मिली है। इससे पहले, पिछले सात महीनों तक एमटीएफ खातों की राशि 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर बनी रही थी क्योंकि ब्रोकर राजस्व के इस नए स्रोत का लगातार विस्तार कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, शेयर ब्रोकरों ने एमटीएफ में सुधारों को लेकर कई सुझाव दिए हैं ताकि इसे परिचालन के लिहाज से ज्यादा आसान बनाया जा सके। ऐसा तब किया गया है जब कमाई के रास्ते सीमित हो गए हैं। इस बारे में जानकारी के लिए सेबी को भेजे गए ईमेल का जवाब नहीं मिला। कोलैटरल के दायरे को बढ़ाने के संबंध में जल्द ही एक विस्तृत परिपत्र जारी होने की उम्मीद है।
इसके अलावा, शेयर ब्रोकरों के लिए एमटीएफ की सुविधा देने के मामले में न्यूनतम नेटवर्थ की आवश्यकता को भी 3 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये किया जा सकता है। नियामक की एक और अहम चर्चा डायनामिक नैरो प्राइस बैंड और बेहतर वोलैटिलिटी नियंत्रणों के जरिये ऑप्शन प्राइसिंग की अनियमितताओं पर रोक लगाने के उपायों पर केंद्रित है।
एक अन्य सूत्र ने कहा, एनएसई पर डायनामिक प्राइसिंग पहले से ही लागू है। बाजार नियामक चाहता है कि कमोडिटी समेत दूसरे एक्सचेंज भी इसे लागू करें। कुछ एमआईआई स्तर पर सिस्टम से जुड़ी दिक्कतें देखी गई हैं, जिन्हें मजबूत बनाने की ज़रूरत है और इस सिस्टम को आसानी से दोहराया जा सकता है।
इस फ्रेमवर्क के तहत बाजार के हालात और उतार-चढ़ाव के आधार पर प्राइस बैंड को समायोजित किया जा सकता है और उन्हें लचीला रखा जा सकता है।