उभरते बाजारों के दिग्गज निवेशक मार्क मोबियस का बुधवार को निधन हो गया। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन और सह-संस्थापक रामदेव अग्रवाल ने कुछ साल पहले एक मंच पर उनसे मुलाकात की थी। उन्होंने पुनीत वाधवा के साथ फोन पर बातचीत में दिवंगत निवेशक के साथ अपने अनुभव साझा किए। पेश हैं संपादित अंश:
मार्क मोबियस एक बेहद प्रतिष्ठित निवेशक थे, खासकर उनकी अलग पहचान वाली हेयरस्टाइल के लिए। मैंने उनसे कुछ साल पहले एक मंच पर मुलाकात की थी। वह अपने आप में एक ब्रांड थे। लेकिन सबसे अहम बात यह है कि उन्होंने उभरते बाजारों को निवेशकों के रडार पर लाने में बड़ी भूमिका निभाई। वह अपने समय से काफी आगे थे और भारत, ब्राजील जैसे देशों के उभरने को बहुत पहले देख चुके थे। मुझे ऐसा कोई और व्यक्ति याद नहीं आता जिसने अपना पूरा जीवन केवल उभरते बाजारों को समर्पित किया हो।
वह मुख्य रूप से म्यूचुअल फंड निवेशक थे। वह कंपनियों से व्यक्तिगत रूप से मिलने, उनके संयंत्रों का दौरा करने और कामकाज को समझने में विश्वास रखते थे। यह बात मैं भी मानता हूं। दूसरी बात, उनका सोचने का तरीका बेहद स्वतंत्र था। वह अपनी समझ के आधार पर निवेश करते थे। संकट के समय खरीदते थे और उन शेयरों में निवेश करते थे जो अनदेखे या अलोकप्रिय होते थे। वह बाजार की भावना से नहीं, बल्कि अपने वैल्यूएशन से चलते थे। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
मुझे लगता है कि मार्क मोबियस, पीटर लिंच के ज्यादा करीब थे। हालांकि राकेश झुनझुनवाला, मोबियस और बफेट के बीच एक बड़ा अंतर था। मोबियस एक म्यूचुअल फंड मैनेजर थे, जो पब्लिक फंड मैनेजमेंट करते थे। जबकि बफेट और झुनझुनवाला अपने निजी निवेश करते थे। इससे उन्हें लंबे समय तक निवेश बनाए रखने की अधिक स्वतंत्रता मिलती थी।
म्यूचुअल फंड में अक्सर शेयर अच्छा प्रदर्शन करने पर मुनाफावसूली करनी पड़ती है और पूंजी को दूसरी जगह लगाना होता है। यही कारण था कि मोबियस लगातार यात्रा करते रहते थे और दुनिया भर में नए अवसरों की तलाश करते थे। उनका जीवन पूरी तरह निवेश को समर्पित था।
इसका मतलब है कि आपको तब खरीदना चाहिए जब कोई शेयर अनदेखा, नापसंद या अलोकप्रिय हो। जब वह लोकप्रिय हो जाता है, तब तक ज्यादातर मुनाफा निकल चुका होता है।
ऐसा नहीं है। आज भी कई निवेशक लंबी अवधि के निवेश में विश्वास करते हैं। लेकिन समस्या शोर की है। आज बातचीत ज्यादातर छोटी अवधि पर केंद्रित है, जिसे मैं ’10 महीने की सोच’ कहता हूं। ‘10 साल की सोच’ अभी भी है, लेकिन वह कम सुनाई देती है। असल में बड़ी संपत्ति 10 महीने में नहीं, 10 साल में बनती है।
काफी हद तक बाजार की चरम ठीक हो चुकी हैं और कुछ अभी भी सुधर रही हैं। लगभग 20–21 गुना पी/ई स्तर पर बाजार पहले की तुलना में ज्यादा संतुलित दिखता है। यह ऐसा बाजार नहीं है जिसमें सब कुछ दांव पर लगा दिया जाए, लेकिन यह पहले से अधिक संतुलित जरूर है। हालांकि भू-राजनीतिक जोखिम, खासकर तेल की कीमतें, अभी भी महत्वपूर्ण कारक हैं।
पूरी तरह नहीं। लेकिन मेरा मानना है कि समय के साथ तेल की कीमतें संतुलित हो जाएंगी, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल तेल को सहन नहीं कर सकती। इतनी ऊंची कीमतों पर खपत घटती है, अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है और महंगाई बढ़ती है। कम समय में यह स्थिति महंगाई और अस्थिरता ला सकती है, लेकिन समय के साथ अर्थव्यवस्थाएं खुद को ढाल लेती हैं। यह दुनिया का अंत नहीं है।