बेंचमार्क सूचकांक में सोमवार को भारी गिरावट देखने को मिली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण वैश्विक स्तर पर शुरू हुई बिकवाली ने शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स को करीब 1,000 अंक लुढ़का दिया। हालांकि आईटी शेयरों में आई तेजी और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के सकारात्मक निवेश की मदद से घरेलू बाजार अपनी गिरावट कम करने में सफल रहे और लगभग सपाट बंद हुए।
भारत में बाजार बंद होने के बाद वैश्विक शेयर बाजारों में भी रिकवरी देखने को मिली जबकि तेल की कीमतें कम हुईं। इसकी वजह यह उम्मीद थी कि अमेरिका और ईरान, होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए किसी समझौते के करीब पहुंच रहे हैं। सेंसेक्स 1,058 अंक यानी 1.4 फीसदी तक गिरकर इंट्राडे में 74,180 के निचले स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन अंत में 75,315 पर बंद हुआ। इस तरह से इसमें 77 अंकों की बढ़त दर्ज की गई। निफ़्टी 50 शुरुआती कारोबार में गिरकर 23,317 पर पहुंच गया था, लेकिन अंत में करीब-करीब बिना किसी बदलाव के 23,650 पर बंद हुआ। इसमें 6.5 अंकों यानी 0.03 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।
आईटी शेयरों ने रिकवरी की अगुआई की। पिछले हफ्ते लगभग 6 फीसदी गिरने के बाद निफ्टी आईटी इंडेक्स 2.4 फीसदी चढ़ा और इसके सभी शेयर हरे निशान में बंद हुए। विश्लेषकों ने कहा कि रुपये में तेज गिरावट और डॉलर में मजबूती से निर्यातोन्मुखी सॉफ्टवेयर कंपनियों के लिए कमाई का नजरिया बेहतर हुआ है क्योंकि इन कंपनियों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी मुद्रा में आता है। निफ्टी फार्मा भी करीब 0.5 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुआ।
एफपीआई शुद्ध खरीदार बने रहे। उन्होंने घरेलू इक्विटी में 2,813 करोड़ रुपये का निवेश किया। घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने 2,682 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। ज्यादातर एशियाई बाजार दबाव में रहे क्योंकि ईरान संघर्ष और बढ़ने से निवेशकों का भरोसा कमजोर बना रहा। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति में लंबे समय तक रुकावट की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को जल्दी से कदम उठाने की चेतावनी दिए जाने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत कुछ समय के लिए 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं। इस बीच, खाड़ी क्षेत्र में ड्रोन हमलों और अन्य हमलों की खबरों ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
हालांकि भारतीय बाजार बंद होने के बाद ब्रेंट क्रूड 1.3 फीसदी से ज्यादा गिरकर 108 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया। ऐसा तब हुआ, जब ईरान की एक अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी ने बताया कि अमेरिका ने ईरानी तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी छूट देने का प्रस्ताव रखा है, जो होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए ईरान की एक अहम मांग थी। विश्लेषकों ने आगाह किया कि खाड़ी क्षेत्र में लंबी लड़ाई, तेल की बढ़ती कीमतें, भुगतान संतुलन पर दबाव और लगातार विदेशी पूंजी के बाहर जाने से भारत की आर्थिक कमजोरी और बढ़ सकती है।
एमके ग्लोबल के शोध प्रमुख और रणनीतिकार शेषाद्रि सेन ने कहा, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर अब भारत की आर्थिक स्थिरता पर पड़ने लगा है। चालू खाते पर लगातार दबाव बना हुआ है। एफपीआई बिकवाली करते जा रहे हैं। जब तक खाड़ी संघर्ष हल नहीं हो जाता और होर्मुज स्ट्रेट का मार्ग फिर से नहीं खुल जाता, तब तक हमें भारतीय शेयरों में गिरावट का काफी जोखिम नजर आ रहा है। हालांकि हमें उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में हालात सामान्य हो जाएंगे। हम किसी भी कमजोरी को बाजार में प्रवेश का अच्छा मौका मानते हैं, जिसमें डिस्क्रिशनरी और औद्योगिक सेक्टरों पर हमारा विशेष जोर रहेगा।