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REITs निवेश गाइड: बढ़ते विकल्पों के बीच निवेशकों के लिए अवसर और जोखिम दोनों बढ़े

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पिछले सप्ताह एक नया रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (रीट) बैगमेन प्राइम ऑफिस रीट स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हुआ। इसके साथ ही अब देश में छह रीट हो गए हैं

Last Updated- May 28, 2026 | 11:13 PM IST
REITs

REITs Investment Guide: पिछले सप्ताह एक नया रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (रीट) बैगमेन प्राइम ऑफिस रीट स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हुआ। इसके साथ ही अब देश में छह रीट हो गए हैं: एम्बेसी, माइंडस्पेस, ब्रुकफील्ड, नेक्सस, नॉलेज और बैगमेन। ऐसे में निवेशकों को उपलब्ध विकल्पों की बढ़ती सूची में से बेहद सावधानी से चयन करना चाहिए।

कैसे काम करते हैं रीट्स?

रीट्स ऑफिस और मॉल जैसी उच्च गुणवत्ता वाली वाणिज्यिक संपत्तियों के मालिक होते हैं और उनका प्रबंधन करते हैं। वे निवेशकों को सीधे भौतिक संपत्ति के मालिक बने बिना आय सृजित करने वाली वाणिज्यिक रियल एस्टेट में भागीदारी की अनुमति देते हैं। निवेशक स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध रीट यूनिट्स को खरीद सकते हैं। नेक्सस सिलेक्ट ट्रस्ट के मुख्य वित्तीय अधिकारी राजेश देव ने कहा, ‘वे नियमित वितरण और संभावित पूंजी वृद्धि के जरिये कमाते हैं।’

रीट्स को अपने नकदी प्रवाह का करीब 90 फीसदी रकम साल में कम से कम दो बार वितरित करना होता है। नॉलेज रियलिटी ट्रस्ट के मुख्य वित्तीय अधिकारी और इंडियन रीट्स एसोसिएशन की कार्यकारी समिति के सदस्य नीरज तोशनीवाल ने कहा, ‘भारत में सूचीबद्ध रीट्स फिलहाल हर तिमाही वितरण करते हैं।’ यह एक विनियमित उत्पाद है। तोशनीवाल ने कहा, ‘रीट्स को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) विनियमित करता है और प्रशासन एवं खुलासा संबंधी आवश्यकताओं को निर्धारित करता है।’

रीट्स पर क्यों विचार करें निवेशक?

प्रवेश लागत अधिक होने के कारण खुदरा निवेशकों के लिए सीधे तौर पर वाणिज्यिक रियल एस्टेट का स्वामित्व हासिल करना मुश्किल है। एम्बेसी रीट के मुख्य वित्तीय अधिकारी अभिषेक अग्रवाल ने कहा, ‘रीट्स बड़ी पूंजी लगाए बिना प्रीमियम ग्रेड ए वाणिज्यिक रियल एस्टेट में निवेश का अवसर प्रदान करते हैं।’ रीट्स वास्तव में पेशेवर प्रबंधन, संस्थागत स्तर की पारदर्शिता और रियल एस्टेट परिसंपत्तियों एवं किरायेदारों में विविधीकरण प्रदान करते हैं।

अग्रवाल ने कहा, ‘वे स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्धता के जरिये तरलता प्रदान करते हैं।’ घरेलू खपत के बढ़ने के साथ ही रीट्स भी बढ़ सकते हैं। देव ने कहा, ‘रिटेल केंद्रित रीट्स को भारत में लगातार बढ़ रही खपत का फायदा मिल सकता जो किराये में वृद्धि और स्थिर नकदी प्रवाह का समर्थन करती है।’

प्रमुख जोखिम

रीट यूनिट की कीमतें ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील होती हैं। तोशनीवाल ने कहा, ‘बढ़ती ब्याज दरें उधारी लागत को बढ़ाकर और अपेक्षाकृत आकर्षण को कम करते हुए रीट्स के प्रदर्शन को नुकसान पहुंचा सकती हैं।’ रीट यूनिट में शेयर के मुकाबले कम उतार-चढ़ाव होता है। मगर इसके बावजूद बाजार में गिरावट के दौरान उसमें उतार-चढ़ाव दिख सकता है। अधिकतर भारतीय रीट फिलहाल ऑफिस रियल एस्टेट पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिसकी प्रकृति चक्रीय है।

किराये की आय ऑफिस स्पेस की मांग पर निर्भर करती है। अरविंद राव ऐंड एसोसिएट्स के संस्थापक अरविंद राव ने कहा, ‘हाइब्रिड एवं दूर से काम करने जैसे प्रावधान और ऑफिस का इस्तेमाल करने वाले सूचना प्रौद्योगिकी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में भर्ती की रफ्तार धीमी पड़ने से वाणिज्यिक रियल एस्टेट की मांग प्रभावित हो सकती है।’ किरायेदारों का एक ही जगह पर केंद्रित होने से भी रिटर्न प्रभावित हो सकता है। एक बड़े किरायेदार के बाहर निकलने के बाद लंबे समय तक उसकी भरपाई न होने से भी उपलब्ध नकदी प्रवाह में कमी आ सकती है। भौगोलिक लिहाज से एक ही जगह पर केंद्रित होने का जोखिम भी बरकरार है। अधिकतर उच्च ग्रेड वाली वाणिज्यिक प्रॉपर्टी मुंबई, बेंगलूरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में हैं। रीट्स से होने वाली आय सावधि जमा या बॉन्ड से मिलने वाले ब्याज भुगतान की तरह न तो निश्चित होती है और न ही उसकी कोई गारंटी।

निवेश से पहले कर लें जांच

रीट पोर्टफोलियो की ऑक्युपेंसी दर की जांच करें। राव ने कहा, ‘लगातार 85 से 90 फीसदी की ऑक्युपेंसी वास्तव में सकारात्मक संकेत है जबकि ऑक्युपेंसी में गिरावट का रुझान दिखने पर सतर्क हो जाएं।’

किरायेदार की गुणवत्ता का आकलन करें और देखें कि उसमें कितनी विविधता है। निवेशकों को शीर्ष 6 या 7 किरायेदारों की पहचान करनी चाहिए और यह जांच लेना चाहिए कि उनसे कुल मिलाकर कितना किराया आता है। साथ ही उन कंपनियों की वित्तीय सेहद का भी आकलन करना चाहिए। अस्थिर नकदी प्रवाह वाले किरायेदारों से अधिक जोखिम हो सकता है। राव ने कहा, ‘स्थिर आय वाली किरायेदार कंपनियां आर्थिक नरमी के दौरान भी किराये का भुगतान जारी रखने के लिए बेहतर स्थिति में होती हैं।’

रीट्स के बाजार मूल्य की तुलना उसके शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) से करें। अगर कोई रीट अपने एनएवी के प्रीमियम पर कारोबार करता है तो यह देखें कि पोर्टफोलियो या प्रबंधन की गुणवत्ता उसे कितना सही ठहराती है। रीट प्रायोजक की गुणवत्ता और प्रतिष्ठा भी बेहतर होनी चाहिए। दमदार प्रायोजक भविष्य में अधिग्रहण का समर्थन कर सकता है और वाणिज्यिक किरायेदारों को आकर्षित करने में मदद कर सकता है। ग्रेड ए संपत्तियों की दमदार संभावित सूची वाला रीट बिना किसी स्पष्ट संभावित सूची वाले के मुकाबले बेहतर स्थिति में होता है।

किसे करना चाहिए निवेश?

रीट्स उन निवेशकों के लिए उपयुक्त हैं जो अपेक्षाकृत स्थिर आय चाहते हैं। जिन निवेशकों के पास पहले से ही उचित इक्विटी एवं डेट पोर्टफोलियो है और अब विविधीकरण करना चाहते हैं तो उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प है। रीट्स से लाभ उठाने के लिए निवेशकों के पास कम से कम 7 से 10 साल का निवेश दायरा होना चाहिए। जो लोग संपत्ति के प्रत्यक्ष स्वामित्व से जुड़ी तरलता और प्रबंधन के बोझ से बचना चाहते हैं वे भी रीट्स में निवेश कर सकते हैं।

किन्हें इनसे बचना चाहिए?

अगर निवेशक पूंजी की सुरक्षा के प्रति अधिक सतर्क है तो उन्हें रीट्स में निवेश से बचना चाहिए क्योंकि इसमें कीमतें गिर सकती हैं। 5 साल से कम निवेश अवधि वाले लोगों के लिए भी रीट्स उपयुक्त नहीं है। राव ने कहा, ‘युवा निवेशकों को शुरुआती दौर में रीट्ट में निवेश करने के बजाय इक्विटी के जरिये चक्रवृद्धि लाभ को प्राथमिकता देनी चाहिए।’

क्या करें नए निवेशक?

रीट्स अपेक्षाकृत स्थिर आय चाहने वाले नए निवेशकों के लिए आकर्षक बने हुए हैं। अग्रवाल ने कहा, ‘भारत के ऑफिस स्पेस बाजार की बुनियादी बातें और संस्थागत ग्रेड परिसंपत्तियों की गुणवत्ता लंबी अवधि में रीट्स के लिए सकारात्मक हैं।’देव ने कहा कि भारत वैश्विक बाजारों के मुकाबले रीट के अपने सफर के शुरुआती चरण में है। इससे दीर्घकालिक अवसर पैदा होता है। उन्होंने कहा, ‘मध्यम से लंबी अवधि के दृष्टिकोण के साथ रीट्स में निवेश करें और उच्च गुणवत्ता वाली परिसंपत्तियों एवं स्थिर नकदी प्रवाह वाले रीट्स को चुनें।’

मौजूदा परिस्थिति 18 से 20 महीने पहले के मुकाबले उतनी अनुकूल नहीं है। राव ने कहा, ‘भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दर में कटौती के चक्र ने रीट्स का समर्थन किया लेकिन वैश्विक उथल-पुथल एवं युद्ध संबंधी चिंताओं ने उसके लिए अनिश्चितता पैदा की है।’ रीट्स में निवेश करने के इच्छुक लोगों को एकमुश्त निवेश करने से बचना चाहिए। उन्हें सात से आठ महीनों में धीरे-धीरे निवेश करना चाहिए।

कराधान

रीट्स द्वारा किए गए विभिन्न प्रकार के वितरण यानी लाभांश और ब्याज पर अलग-अलग तरीके से कर लगाया जाता है। लाभांश आय की कराधान विशेष प्रयोजन कंपनी (एसपीवी) द्वारा अपनाए गए कर व्यवस्था पर निर्भर करता है। मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंट सुरेश सुराणा ने कहा, ‘रीट्स के जरिये वितरित लाभांश आय आम तौर पर तब छूट जाती है जब एसपीवी ने आयकर अधिनियम की धारा 115बीएए के तहत रियायती कर व्यवस्था का विकल्प नहीं चुना है। अगर एसपीवी ने विकल्प चुना है तो यह निवेशक की लागू स्लैब दर पर कर योग्य हो जाता है।’

एसपीवी से रीट द्वारा वितरित ब्याज आय को अन्य स्रोतों से आय के तहत निवेशक की लागू स्लैब दर पर कर लगाया जाता है। यह 10 फीसदी की विदहोल्डिंग कर के अधीन भी है। किराये की आय पर समान कराधान लागू होता है। 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए सूचीबद्ध रीट यूनिट पर पूंजीगत लाभ को दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ माना जाता है। सुराणा ने कहा, ‘ऐसे लाभ पर 1.25 लाख रुपये की निर्दिष्ट सीमा से ऊपर 12.5 फीसदी की दर से इंडेक्सेशन लाभ के बिना कर लगाया जाता है। एक वर्ष या उससे कम समय तक रखी गई इकाइयों पर 20 फीसदी की दर से अल्पकालिक पूंजीगत लाभ कर लगता है।’

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First Published - May 28, 2026 | 11:13 PM IST

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