शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव और निवेशकों के कमजोर मनोबल के बीच भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने आज आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की समय सीमा और न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों में एकबार के लिए कुछ रियायतों की घोषणा की।
आईपीओ लाने की तैयारी करने वाली कंपनियों के लिए नियामक ने ऑब्जर्वेशन लेटर या मंजूरी पत्र की वैधता अवधि बढ़ा दी है। हालांकि यह छूट सिर्फ उन कंपनियों के लिए है जिनकी आईपीओ लाने की समय सीमा 30 सितंबर तक खत्म हो रही है। इससे दो दर्जन से ज्यादा कंपनियों को राहत मिली है।
मौजूदा नियमों के मुताबिक मंजूरी पत्र 12 महीनों के लिए वैध होते हैं। अगर इतने समय में आईपीओ नहीं आया तो संबंधित कंपनी को अपना विवरण मसौदा दोबारा दाखिल करना होता है। गोपनीय फाइलिंग के मामलों में कंपनी को अपना आईपीओ लाने के लिए 18 महीनों का समय मिलता है।
उद्योग निकायों से मिले सुझावों और मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों के कारण बाजार में बनी अनिश्चितता, साथ ही निवेशकों की कम भागीदारी को देखते हुए सेबी ने एकबारगी छूट देने का फैसला किया है। इसके तहत ‘ऑब्जर्वेशन लेटर’ की वैधता को सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया है। नियामक ने एक परिपत्र में यह जानकारी दी।
हालांकि, कंपनियों को इसके लिए अद्यतन आईपीओ दस्तावेज जमा करने होंगे। साथ ही लीड मैनेजर की ओर से एक वचन-पत्र भी जमा करना होगा, जिसमें आईसीडीआर विनियमों के अनुपालन की पुष्टि की गई हो।
सेबी ने पाया कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के चलते कंपनियों को पूंजी बाजार तक पहुंच बनाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसके कारण कई कंपनियों ने अपने निर्गम लाने की योजनाओं को टाल दिया है या उनमें बदलाव किया है या उन्हें वापस ले लिया है। इससे नियामकीय मंजूरियों में चूक होने और प्रक्रियाओं के दोहराव का जोखिम बढ़ गया है।
एक अलग परिपत्र में सेबी ने न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता नियमों का पालन करने में विफल रहीं सूचीबद्ध कंपनियों को दंडात्मक प्रावधानों से भी एकबारगी छूट दी है। यह राहत उन कंपनियों पर लागू होती है जिनकी अनुपालन की समयसीमा 1 अप्रैल से 30 सितंबर, 2026 के बीच आती है।
स्टॉक एक्सचेंज और डिपॉजिटरी को निर्देश दिया गया है कि वे इस दौरान कोई भी दंडात्मक कार्रवाई शुरू न करें। 1 अप्रैल से अब तक की गई कोई भी कार्रवाई वापस ले ली जाएगी।
एसोसिएशन ऑफ इन्वेस्टमेंट बैंकर्स ऑफ इंडिया (एआईबीआई) के चेयरमैन महावीर लुणावत ने कहा, ‘इस एकबारगी छूट से आईपीओ लाने वाली उन कंपनियों को मदद मिलेगी, जिनकी मंजूरी की समय सीमा खत्म होने वाली है। यह कंपनियों को बाजार की स्थितियों का बेहतर आकलन करने और बढ़ी हुई अस्थिरता के बीच रणनीतिक रूप से अपने निर्गम लाने का सही समय चुनने में मदद करेगा।’
न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता नियमों का पालन नहीं करने पर आम तौर पर जुर्माना, प्रवर्तक की शेयरधारिता को फ्रीज करने और अन्य पाबंदियां लगाई जाती हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी इस तरह की ढील दी गई थी।
उद्योग संगठनों ने हाल ही में कोष जुटाने में आने वाली चुनौतियों और तय समय सीमा के भीतर 25 फीसदी न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता की सीमा को पूरा करने में होने वाली मुश्किलों को लेकर चिंता जताई थी।
प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के अनुसार मौजूदा बाजार की चुनौतियों के बावजूद वित्त वर्ष 2026 में कंपनियों ने 112 आईपीओ के जरिये रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये जुटाए हैं। इससे पिछले वित्त वर्ष में कंपनियों ने 78 निर्गम माध्यम से 1.62 लाख करोड़ रुपये जुटाए थे।
फिलहाल, करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद कर रहीं 144 कंपनियों को सेबी से आईपीओ लाने की मंजूरी मिल चुकी है और वे बाजार में उतरने का इंतजार कर रही हैं। इसके अलावा 63 अन्य कंपनियां 1.37 लाख करोड़ रुपये जुटाने के लक्ष्य के साथ नियामक की मंजूरी की प्रतीक्षा कर रही हैं।
उतार-चढ़ाव और सूचीबद्धता के बाद कमजोर प्रदर्शन की वजह से बाजार की गतिविधियों पर असर पड़ा है। वित्त वर्ष 2026 में करीब 22,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही 18 कंपनियों ने आईपीओ लाने की अपनी मंजूरी की वैधता खत्म होने दी जबकि 9,200 करोड़ जुटाने का लक्ष्य रखने वाली 15 कंपनियों ने अपने मसौदा वापस ले लिए। इस साल आईपीओ में खुदरा निवेशकों की भागीदारी में भी कमी का संकेत दिखा जिसकी एक वजह सूचीबद्धता के बाद कमजोर मुनाफा था।