भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) भारतीय डिपॉजिटरी रिसीट (आईडीआर) को फिर से शुरू करने पर विचार कर रहा है। जानकार सूत्रों ने बताया कि इसके साथ ही इसमें खुलासों और निवेशक सुरक्षा पर विशेष जोर होगा। नियामक ने इस योजना को घरेलू निवेशकों के लिए अधिक व्यावहारिक और सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक बदलावों पर आंतरिक तौर पर चर्चा शुरू कर दी है। आईडीआर के जरिए विदेश में सूचीबद्ध कंपनियों को भारत में अपने शेयर जारी करने की अनुमति होती है।
चर्चा के मूल में यह है कि क्या आईडीआर को एक ऐसे विश्वसनीय माध्यम के रूप में फिर से लाया जा सकता है जिससे भारत का पूंजी बाजार मजबूत हो और भारतीय निवेशकों की वैश्विक कंपनियों तक पहुंच हो सके। इस चर्चा से वाकिफ एक सूत्र ने कहा, ‘इस पर मंथन हो रहा है कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि आईडीआर निवेशकों को प्रत्यक्ष रूप से निवेश का मौका दे और मजबूत नियामकीय सुरक्षा भी बनी रहे।’
इस व्यक्ति ने यह भी बताया कि खुलासे से जुड़े मानकों को भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों के लिए लागू मानकों के अनुरूप किया जा सकता है ताकि सूचना में असंगति को दूर किया जा सके। सूत्र ने बताया, ‘अगर हम बाजार का विस्तार करना चाहते हैं और निवेशकों के लिए उपलब्ध विकल्पों का दायरा बढ़ाना चाहते हैं तो विदेशी प्रतिभूतियां ऐसा विकल्प हो सकती हैं।’ खबर लिखे जाने तक सेबी को ईमेल से भेजे गए प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला था।
आईडीआर को अब तक सीमित सफलता ही मिली है। वर्ष 2010 में स्टैंडर्ड चार्टर्ड पीएलसी, एकमात्र आईडीआर निर्गम लाई थी जिसे जुलाई 2020 में सूचीबद्धता से हटा लिया गया।
नया प्रयास उस समय हो रहा है जब भारतीय बाजार महंगे मूल्यांकन की पेशकश कर रहे हैं, खासकर उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) की स्थानीय सहायक इकाइयों के लिए। पहले ही, हुंडई और एलजी जैसी एमएनसी अपनी भारतीय इकाइयों को पहले ही मूल कंपनियों से भारी प्रीमियम पर सूचीबद्ध करा चुकी हैं। हालांकि, इस प्रकार की सूचीबद्धता के लिए आमतौर पर भारत में स्थापित कंपनी होना जरूरी होता है।
आईडीआर से वैश्विक कंपनियों को भारतीय पूंजी बाजार से पूंजी जुटाने का वैकल्पिक रास्ता मिल सकता है और उन्हें भारत में अपनी स्थानीय सहायक कंपनी भी नहीं बनानी होगी। बाजार से जुड़े लोगों का कहना है कि मूल्यांकन में आर्बिटाज और स्थानीय स्तर पर मौजूदगी अहम कारक है।
एक बाजार विशेषज्ञ ने कहा, ‘कुछ कंपनियां बेहतर मूल्यांकन और अधिक सक्रिय ट्रेडिंग से फायदा उठाने के लिए आईडीआर पर विचार कर सकती हैं, खासतौर पर अगर अपने ही घरेलू बाजार में उनमें ज्यादा ट्रेडिंग नहीं होती हो।’ विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि ऑफर-फॉर-सेल जैसे मौजूदा माध्यम प्रभावी नहीं हुए हैं। इनके तहत विदेशी मूल कंपनी आय वितरित करती है। लागत और जटिलता के कारण रिवर्स फ्लिपिंग भी धीमी हो गई है।
हालांकि, निवेश बैंकरों का कहना है कि आईडीआर की सफलता बड़े पैमाने पर भागीदारी पर निर्भर करेगी, खासतौर पर घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) की भागीदारी पर। एक निवेश बैंकर ने कहा, ‘आईडीआर, अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट (एडीआर) या ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (जीडीआर) से अलग तरह से काम करते हैं क्योंकि उन मामलों में कंपनी पहले से ही विदेश में सूचीबद्ध होती है।’
उन्होंने यह भी बताया कि घरेलू म्युचुअल फंडों को निवेश में समस्या होती है क्योंकि उनकी विदेशी निवेश की सीमा पहले ही पूरी हो चुकी है और मुद्रा दबावों के बीच इसे संशोधित नहीं किया गया है।