ईरान युद्ध के बीच सॉवरिन वेल्थ फंडों की तरफ से निवेश बेचने की आशंकाएं भारत के मामले में कम से कम अभी तक सच साबित नहीं हुई हैं। कहा जा रहा था कि अपनी घरेलू वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए वे निवेश निकाल सकते हैं। डिपॉज़िटरी के आंकड़ों का बिजनेस स्टैंडर्ड ने विश्लेषण किया, जिनसे पता चलता है कि मार्च में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशों में सॉवरिन वेल्थ फंडों की हिस्सेदारी में वास्तव में थोड़ी सी बढ़ी है।
मार्च में सभी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की होल्डिंग में सॉवरिन वेल्थ फंडों की हिस्सेदारी 6.5 फीसदी थी जबकि फरवरी में यह 6.4 फीसदी रही थी। यह तब हुआ, जब विदेशी निवेशक अकेले मार्च में इक्विटी में 1.2 लाख करोड़ रुपये के शुद्ध बिकवाल बने हुए थे। यह फरवरी के अंत में ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद का पहला पूरा महीना था।
एफपीआई की इक्विटी होल्डिंग में कुल 13 फीसदी की गिरावट के मुकाबले सॉवरिन वेल्थ फंडों में कम गिरावट (12 फीसदी) दर्ज की गई। परिसंपत्तियों में यह गिरावट पूरे बाजार की गिरावट भी दर्शाती है, जब बीएसई सेंसेक्स 11.5 फीसदी टूट गया। इक्विटी में एफपीआई होल्डिंग्स में सॉवरिन वेल्थ फंडों का हिस्सा मार्च में 6.9 फीसदी रहा जबकि फरवरी में यह 6.8 फीसदी था। डेट का हिस्सा मोटे तौर पर 0.6 फीसदी पर ही बना रहा। हाइब्रिड सिक्योरिटीज में सॉवरिन का हिस्सा फरवरी के 22.6 फीसदी से बढ़कर मार्च में 23.3 फीसदी पर पहुंच गया। मार्च 2026 तक सॉवरिन वेल्थ फंडों के पास अलग-अलग परिसंपत्तियों में कुल 4.5 लाख करोड़ रुपये थे।
यूटीआई इंटरनैशनल के सीईओ प्रवीण जगवाणी के अनुसार, कई सॉवरिन फंडों के पोर्टफोलियो में भारत का आकार अपेक्षाकृत छोटा है और हाल के समय में इसके प्रदर्शन में गिरावट भी आई है। लिहाजा, इस पर निवेश निकालने का दबाव कम हो सकता है। उन्होंने कहा, अगर आपका वैश्विक आवंटन वाला पोर्टफोलियो है तो आप अच्छा प्रदर्शन करने वाली चीजों को बेचकर जोखिम से बचने का अपना रुझान दर्शाते हैं। भारत में आवंटन (हिस्सा) छोटा है और भारत में निवेश से उनको विविधता मिलती हैा
ऐसा लगता है कि भारत का दूसरे शेयर बाजारों से आपसी संबंध कम हो गया है। पहले सभी उभरते बाजार खराब प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। ताइवान, चीन और दक्षिण कोरिया- इन सभी ने पिछले एक साल में 20 से 150 फीसदी तक का जबरदस्त रिटर्न दिया है जबकि निफ्टी 50 में कोई खास बदलाव नहीं आया है। अभिषेक सराफ, देवेन मिस्त्री और अंशुल अग्रवाल ने मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज की 7 अप्रैल की इंडिया स्ट्रेटेजी रिपोर्ट तैयार की है। इसके अनुसार वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में कमाई की रफ्तार पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर पड़ने की संभावना है।
इसमें कहा गया है, चौथी तिमाही में कम वृद्धि की वजह साफ तौर पर कच्चे तेल और गैस की ज्यादा कीमतों का असर है और यह असर ऊर्जा और कच्चे तेल से जुड़े प्रोडक्ट इस्तेमाल करने वाले अलग-अलग सेक्टरों पर हुआ है। कमाई के हमारे अनुमानों में बदलाव से भी यह बात जाहिर होती है। पिछली दो तिमाहियों से कमाई के अनुमानों में बढ़ोतरी का जो रुझान दिख रहा था, वह बीते मार्च में उलट गया।
इसमें कहा गया है, एक बार जब युद्ध का माहौल शांत हो जाएगा, तो बेहतर एफपीआई निवेश की बहुत ज्यादा संभावना है। यहां तक कि अगर बाहर जाने वाले निवेश में कमी भी आती है तो बाजार इसे सकारात्मक रूप से लेगा और सकारात्मक निवेश से बाजार में तेजी से उछाल आ सकती है।
वित्त वर्ष 25 की तुलना में डॉलर के मुकाबले रुपया करीब दसवां हिस्सा गिरकर 85.58 से 94.65 पर आ गया। इसका मतलब यह था कि पिछले एक साल में विदेशी निवेशकों को भारत में किए गए अपने निवेश के मूल्य का लगभग दसवां हिस्सा सिर्फ रुपये के अवमूल्यन के कारण गंवाना पड़ा।
मुद्रा से जुड़ा दबाव अभी भी बना हुआ है। लेकिन बड़ी कंपनियों के मूल्यांकन अब ज्यादा आकर्षक हैं। विदेशी निवेश का बाहर जाना शायद तुरंत न रुके। जगवाणी के अनुसार अगर लड़ाई जारी रहती है तो खाड़ी देशों के सॉवरिन वेल्थ फंडों पर परिसंपत्तियां बेचकर सरकार के कम होते राजस्व की भरपाई करने का दबाव रहेगा। यह अभी किसी भी तरह से खत्म नहीं हुआ है।