वित्त वर्ष 2026 में घरेलू शेयर बाजार में कारोबारी गतिविधियां धीमी रहीं। बाजार में नकदी के कारोबार में गिरावट आई। डेरिवेटिव में भी वृद्धि की रफ्तार सुस्त रही। नियामकीय सख्ती और बाजार के कमजोर प्रदर्शन का असर कारोबार पर पड़ा। एनएसई और बीएसई दोनों के इक्विटी कैश सेगमेंट में औसत दैनिक टर्नओवर (एडीटीवी) सालाना आधार पर 6 प्रतिशत गिरकर 1.13 लाख करोड़ रुपये रह गया। वित्त वर्ष 2025 में यह 1.21 लाख करोड़ रुपये था।
इसके विपरीत दोनों एक्सचेंजों में वायदा एवं विकल्प (एफऐंडओ) सेगमेंट में कुल एडीटीवी में मामूली 4.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 447 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। लेकिन एनएसई पर गतिविधियों में कुछ सुस्ती के संकेत दिखे और एफऐंडओ कारोबार में 18 प्रतिशत की गिरावट आई।
पिछले 18 महीनों में हुए कई नियामकीय बदलावों का डेरिवेटिव में भागीदारी पर असर पड़ा है। इन नियामकीय बदलावों में एक एक्सचेंज-एक साप्ताहिक एक्सपायरी ढांचा, सख्त अपफ्रंट मार्जिन की जरूरतें और लॉट आकार में बढ़ोतरी शामिल हैं। उद्योग से जुड़े लोग इस वित्त वर्ष में ट्रेडिंग वॉल्यूम में और गिरावट की आशंका से इनकार नहीं कर रहे हैं।
बाजार का प्रदर्शन भी सुस्त रहा। वित्त वर्ष 2026 के दौरान निफ्टी-50 सूचकांक में 5.1 प्रतिशत की गिरावट आई जबकि सेंसेक्स 7.1 प्रतिशत गिरा। इससे भी कैश सेगमेंट में गतिविधियां धीमी पड़ गईं। भले ही कुल वॉल्यूम में नरमी आई हो, लेकिन सभी एक्सचेंजों पर औसत ट्रेड का
आकार बढ़ गया, जो ज्यादा वैल्यू वाले सौदों की ओर रुझान का संकेत देता है। एनएसई पर औसत ट्रेड का आकार एक साल पहले के 29,046 रुपये से बढ़कर 31,545 रुपये हो गया। बीएसई पर यह 18,720 रुपये से बढ़कर 22,822 रुपये हो गया।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के अनुसार नियामकीय बदलाव के बीच बीएसई को फायदा हुआ है। सितंबर 2025 में इसकी बाजार भागीदारी 38 प्रतिशत था, जो मार्च 2026 में बढ़कर 44 प्रतिशत हो गया। वहीं, ऑप्शंस प्रीमियम में इसका हिस्सा 24.4 प्रतिशत से बढ़कर 26.1 प्रतिशत हो गया, भले ही साप्ताहिक एक्सपायरी गुरुवार को शिफ्ट हो गई हो।
सेबी के ज्यादातर सुधार अब लागू हो चुके हैं। इसलिए कारोबारी अब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से संभावित बदलावों पर ध्यान दे रहे हैं। इन बदलावों से कारोबार पर और भी असर पड़ सकता है। साथ ही बुधवार से लागू एसटीटी बढ़ोतरी का भी असर दिख सकता है।
आरबीआई की बैंक गारंटी से जुड़े नए नियम 1 जुलाई से लागू होंगे। इससे व्यवस्था में कर्ज लेकर दांव लगाना मुश्किल हो सकता है। फिलहाल उद्योग के मार्जिन के लगभग 35 प्रतिशत हिस्से को सावधि जमा और बैंक गारंटी होती है।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा, ‘यह मानते हुए कि इनमें से आधा हिस्सा पूरी तरह से बैंक गारंटी है और उस पर 50 प्रतिशत का असर होगा, तो डेरिवेटिव कारोबार पर इसका कुल असर लगभग 8-10 प्रतिशत रहने का अनुमान है।’
आईआईएफएल कैपिटल के उपाध्यक्ष देवेश अग्रवाल ने कहा कि इसका असर धीरे-धीरे दिख सकता है। उन्होंने कहा, ‘हालांकि प्रोप्राइटरी ट्रेडरों का मुनाफा कम हो सकता है, लेकिन गतिविधियों का लेवल उसी अनुपात में कम नहीं होगा। लेवरेज कम होने से शॉर्ट टर्म में कारोबार 10-15 फीसदी तक गिर सकता है, और यह समायोजन छह से नौ महीनों में पूरा होगा।’