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होर्मुज स्ट्रेट खुलने की उम्मीद से शेयर बाजार दौड़ा, 2 दिन में निवेशकों की झोली में ₹18 लाख करोड़

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सेंसेक्स ने शुरुआत में 1,293 अंक या 1.7 प्रतिशत तक की बढ़त बना ली थी। लेकिन बाद में कुछ बढ़त गंवा दी और आखिर में यह 76,264 पर बंद हुआ, जो 736 अंक या 0.97 प्रतिशत की बढ़त है

Last Updated- June 15, 2026 | 10:00 PM IST
Share Market

सोमवार को सोमवार को वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजारों में भी तेजी देखी गई। इस तेजी का कारण अमेरिका और ईरान का युद्ध खत्म करने के लिए शांति समझौते पर सहमति जताना था। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के इस बयान से निवेशकों का उत्साह बढ़ा कि होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता शुक्रवार को खुल जाएगा।

सोमवार को सेंसेक्स ने शुरुआत में 1,293 अंक या 1.7 प्रतिशत तक की बढ़त बना ली थी। लेकिन बाद में कुछ बढ़त गंवा दी और आखिर में यह 76,264 पर बंद हुआ, जो 736 अंक या 0.97 प्रतिशत की बढ़त है। निफ्टी 231 अंक या 0.98 प्रतिशत बढ़कर 23,854 पर बंद हुआ।

बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 8.5 लाख करोड़ रुपये बढ़कर 470 लाख करोड़ रुपये हो गया। पिछले दो सत्रों में कुल बाजार पूंजीकरण में 18 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई, जिसकी वजह यह उम्मीद थी कि युद्धरत देश जल्द किसी समझौते पर पहुंच सकते हैं।

खबरों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान अपनी लड़ाई खत्म करने के लिए एक रूपरेखा पर सहमत हो गए हैं। इस समझौते के तहत अमेरिका ईरान पर लगी नाकेबंदी हटा लेगा और तेल यातायात का प्रमुख संकरा रास्ता- होर्मुज स्ट्रेट- फिर से खोल दिया जाएगा। शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में दोनों पक्षों के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य जैसे ज्यादा अहम मुद्दों पर 60 दिन के अंदर बातचीत की जाएगी।

फरवरी के आखिर में शुरू हुई इस जंग में हजारों लोगों की जान गई और इसने दुनिया में ऊर्जा का एक बहुत बड़ा संकट पैदा कर दिया। ईरान ने इजरायल और पश्चिम एशिया के देशों पर हमले किए, जिनमें अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया, उनके ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचाया गया और होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया गया, जहां से दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल गुजरता है। इसके जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के बंदरगाहों को ब्लॉक कर दिया।

होर्मुज स्ट्रेट के फिर से खुलने की खबर से तेल की कीमतें गिर गईं। कच्चा तेल 85.52 डॉलर पर कारोबार कर रहा था, जो 4 मार्च, 2026 के बाद का सबसे निचला स्तर है। इसमें 4.43 प्रतिशत की गिरावट आई। लेकिन हालिया गिरावट के बावजूद, कच्चा तेल अभी भी लड़ाई से पहले के स्तर से 11.7 प्रतिशत ऊपर है। कच्चे तेल की गिरती कीमतें भारत के लिए अच्छी हैं, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है। मई में भारत की थोक मूल्य मुद्रास्फीति (डब्ल्यूपीआई) सालाना आधार पर 9.7 प्रतिशत बढ़ गई, जिसका कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर था।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के शोध प्रमुख विनोद नायर ने कहा, ‘अमेरिका-ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते से निवेशकों का भरोसा काफी बढ़ा है, जिससे इक्विटी बाजार में व्यापक बहाली देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से महंगाई को लेकर चिंताएं कम हुई हैं। लिहाजा, ब्याज दरों के स्थिर रहने की उम्मीद बढ़ी है और वित्त वर्ष 2027 के लिए कमाई की बेहतर संभावना दिख रही है। इक्विटी में रिस्क-रिवॉर्ड का समीकरण बेहतर होने के कारण निवेशक ऑटो, इंडस्ट्रियल, पूंजीगत वस्तु और रियल एस्टेट जैसे वृद्धि वाले सेक्टरों पर दांव बढ़ा रहे हैं। ये सेक्टर बेहतर होते माहौल का फायदा उठाने के लिहाज से अच्छी स्थिति में हैं। भू-राजनीतिक जोखिम कम होने से बॉन्ड यील्ड और एफआईआई निकासी में कमी आने और रुपये के मजबूत होने की भी उम्मीद है, जिससे बाजार धारणा मजबूत होगी।’

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First Published - June 15, 2026 | 9:57 PM IST

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