ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से खुदरा निवेशक शेयरों की लगातार खरीद कर रहे हैं। दूसरी ओर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) निरंतर बिकवाली करते आ रहे हैं। मार्च से अब तक आम निवेशकों ने घरेलू शेयरों में करीब 21,897 करोड़ रुपये का निवेश किया है। दूसरी ओर इस अवधि में एफपीआई ने कुल मिलाकर 2.3 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की है।
सिर्फ अप्रैल में ही खुदरा निवेशकों ने 19,664 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे, जो अक्टूबर 2024 के बाद से उनकी सबसे बड़ी मासिक खरीदारी है। लेकिन मई में वे 607 करोड़ रुपये के शुद्ध बिकवाल रहे। फिर भी, बाजार में आई गिरावट ने कई मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों को आकर्षक बना दिया। मार्च तिमाही की कमाई में किसी तरह की बुरी खबर न होने से खुदरा निवेशकों का भरोसा और भी बढ़ गया।
अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक यूआर भट्ट ने कहा, एसआईपी में निवेश करना अब भारतीय निवेशकों की आदत बन गई है। रुपये में लागत एवरेजिंग और बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान भी निवेश बनाए रखने का विचार पिछले कुछ सालों में छोटे निवेशकों के मन में गहराई से बैठ गया है और इसका जबरदस्त असर हुआ है। यहां तक कि युद्ध, वैश्विक अनिश्चितता या बाजार में भारी गिरावट के समय भी निवेशक अपनी एसआईपी जारी रखते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ये हालात कुछ समय के लिए ही हैं।
उन्होंने कहा, सीधे निवेश में भी यही सोच दिखती है। निवेशक इस बात को ज्यादा मानने लगे हैं कि बाजार में गिरावट का समय अक्सर निवेश का सबसे अच्छा समय होता है। इतिहास बतता है कि बाजार आखिरकार पटरी पर आ जाते हैं और घबराहट के दौर हमेशा नहीं रहते।
जहां एक ओर पश्चिम एशिया के संघर्ष ने विदेशी निवेशकों को जोखिम से दूर रखा है, वहीं घरेलू निवेशक डटे हुए हैं। सीधे निवेश करने के अलावा घरेलू परिवारों ने मार्च से शेयरों में अब तक 2.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है। डीआईआई में म्युचुअल फंड, बीमा कंपनियां और पेंशन फंड शामिल हैं, जिनके पास एसआईपी, बीमा प्रीमियम और लंबी अवधि की रिटायरमेंट योजनाओं के जरिये निवेश के रूप में खुदरा बचत आती है।
जानकारों का कहना है कि एफपीआई अपने फंड एक देश से दूसरे देश में ले जा सकते हैं, लेकिन घरेलू निवेशकों के पास मोटे तौर पर स्थानीय स्तर पर ही निवेश करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता। इसी वजह से वे निचले स्तर पर निवेश के मौकों की तलाश करते हैं और उम्मीद करते हैं कि बाजार फिर से ऊपर बढ़ेगा, जैसा कि संकट के पिछले दौर में हुआ था।
भट्ट ने कहा, अगर आप लंबे समय तक बाजारों को देखें तो गिरावट आमतौर पर ऊपर की ओर जाते रुझान में कुछ समय के लिए होती है। लकिन यह तरीका तब सबसे अच्छा काम करता है जब गिरावट की वजह ढांचागत समस्याएं या बाजार में बहुत ज्यादा तेजी न होकर कुछ समय के लिए होने वाली घटनाएं हों। ऐसे मामलों में लंबे समय के लिए निवेश करने वालों को आमतौर पर फायदा होता है।
खुदरा निवेशकों के निवेश का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे चलकर स्मॉलकैप और मिडकैप शेयर कैसा प्रदर्शन करते हैं। स्वतंत्र इक्विटी विश्लेषक अंबरीश बालिगा ने कहा, बाजार में गिरावट के दौरान असली मुद्दा डर था। जब बाजार तेजी से गिरते हैं तो निवेशक सतर्क हो जाते हैं और नया निवेश करने से बचते हैं। मगर अप्रैल से निवेशकों का मूड बदलने लगा, खासकर तब, जब बाजार ईरान से जुड़ी बिकवाली से उबर गए।
उन्होंने कहा, खास बात यह थी कि लगभग 18 से 20 महीनों के बाद स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों ने फिर से बेहतर प्रदर्शन शुरू कर दिया। एक बार जब निवेशक फिर से पैसा कमाने लगते हैं तो उनकी प्रवृत्ति अपना निवेश बढ़ाने की होती है, भले ही पिछले कुछ सालों में उन्हें नुकसान उठाना पड़ा हो। ऐसा लगता है कि अभी बाजार इसी दौर से गुज़र रहा है।
बालिगा ने कहा कि यह रुझान जारी रह सकता है क्योंकि मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों में तेजी अभी भी शुरुआती दौर में है। उन्होंने कहा, लगभग दो साल तक उम्मीद से कमजोर प्रदर्शन करने के बाद हाल के नतीजे भी बेहतर आए हैं, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है।