अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की खबरों से वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली है। जीक्वांट इन्वेस्टेक के संस्थापक शंकर शर्मा ने पुनीत वाधवा को टेलीफोन पर बातचीत में बताया कि एक बार जब भूराजनीतिक चिंताएं कम हो जाएंगी, तो बाजार का ध्यान दूसरे मुद्दों, खासकर अमेरिका-भारत व्यापार करार पर केंद्रित हो जाएगा। उनसे बातचीत के मुख्य अंश:
क्या आपको उम्मीद है कि पश्चिम एशिया में शांति वार्ता के माहौल में वैश्विक वित्तीय बाजारों में जोखिम आधारित तेजी बनी रहेगी?
लड़ाई के बावजूद दुनिया भर में तेजी का दौर जारी है। युद्ध के दौरान भी बाजार के कामकाज में कोई बड़ी रुकावट नहीं आई है। असल में, टकराव शुरू होने के बाद से ही दुनिया के शेयर बाजारों में लगातार बढ़त हुई है। भारत और फिलिपींस को छोड़ दें तो दुनिया के लगभग हर बाजार में पिछले 12 से 24 महीनों में जबरदस्त तेजी का दौर रहा है, चाहे वहां एआई हो हो या नहीं।
लेकिन कई जानकारों का मानना है कि वैश्विक बाजार में आई तेजी की मुख्य वजह सिर्फ एआई है?
यह बहुत सीमित सोच है। जिन देशों और इलाकों का एआई से कोई लेना-देना नहीं है, वहां भी अच्छा रिटर्न मिला है। लैटिन अमेरिका और मध्य यूरोप ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। पोलैंड और ग्रीस जैसे बाजारों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया है, जबकि वहां एआई का कोई खास एंगल नहीं है। अक्सर लोग एक अहम बात नजरअंदाज कर देते हैं कि पिछले 12-24 महीनों में यह व्यापक वैश्विक बुल-मार्केट रहा है। आंकड़े से यह बात साबित नहीं होती कि सिर्फ एआई-आधारित बाजारों में ही तेजी आई है। भारत और फिलीपींस जैसे कुछ बाजारों को छोड़ दें तो, दुनिया भर के ज्यादातर बड़े बाजार तेजी के दौर में हैं। इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा है कि वहां एआई से जुड़ी कोई सफलता है या नहीं।
जहां तक भारत की बात है, तो क्या पश्चिम एशिया की घटनाओं से बना बड़ा दबाव अब दूर हो गया है? क्या असल समझौते पर दस्तखत के बाद बाजार में गिरावट आ सकती है?
सबसे पहले, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि 19 जून को समझौते पर पक्का हस्ताक्षर हो ही जाएंगे। अभी भी कई अनिश्चितताएं हैं और कई चीजें बदल सकती हैं। इससे भी अहम बात यह है कि भारत का खराब प्रदर्शन पश्चिम एशिया की जंग से पहले से ही चल रहा है। यह लगभग दो साल पहले शुरू हुआ था और इसका पश्चिम एशिया संकट से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि युद्ध सिर्फ एक अतिरिक्त वजह रही है, न कि भारत के कमजोर प्रदर्शन की मुख्य वजह। इस टकराव से पहले भी भारत का प्रदर्शन वैश्विक और उभरते बाजारों (ईएम) के मुकाबले कमजोर था।
क्या मौजूदा तेजी लंबे समय तक बनी रहेगी?
तेजी के लंबे समय तक बने रहने की बात बिल्कुल अलग है। एक बार जब फौरी भू-राजनीतिक चिंताएं कम हो जाएंगी, तो बाजार का ध्यान दूसरे मुद्दों, खासकर अमेरिका-भारत व्यापार करार पर चला जाएगा। मेरी राय में, वह समझौता भारत के मुकाबले अमेरिका के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है और यह एक बार फिर बाजार के लिए चिंता का सबब बन सकता है।
निवेशकों को किन सेक्टर पर ध्यान देना चाहिए?
मैं जरूरी नहीं कि बाजार को सेक्टर के नजरिये से देखूं। मेरी पसंद साफ तौर पर स्मॉलकैप शेयर हैं। मेरी नजर में भारत में असल में दौलत बनाने का मौका स्मॉलकैप में ही है। इस बारे में मेरा नजरिया बिल्कुल साफ है। मुझे नहीं लगता कि निवेशक प्रमुख लार्जकैप सेक्टर से बहुत ज्यादा रिटर्न कमा पाएंगे।
तो निवेशकों के लिए आपका क्या संदेश है?
सबसे जरूरी बात यह है कि बेंचमार्क इंडेक्स से निवेशकों को बहुत ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना कम है। मेरी नजर में, असली मौके स्मॉलकैप सेगमेंट में हैं। स्मॉलकैप के पक्ष में एक और बात यह है कि इस सेगमेंट में विदेशी संस्थागत हिस्सेदारी ऐतिहासिक रूप से कम रही है। नतीजतन, विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली या डंपिंग का जोखिम अपेक्षाकृत कम होता है।