Stock Market FY27 Outlook: वित्त वर्ष 2026-27 आज यानी बुधवार से शुरू हो गया है। बीते वित्त वर्ष की बात करें तो निवेशकों को 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में 2,20,583 करोड़ रुपये घट गया। एमकैप के लिहाज से इंडेक्स की टॉप 5 दिग्गज कंपनियों का वैल्यूएशन भी घटा है। अब बात नए वित्त वर्ष की हो रही है तो यह एक नहीं बल्कि कई बड़ी चुनौतियों के साथ शुरू हो रहा है। पश्चिम एशिया में संघर्ष, ट्रंप के टैरिफ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के काले बादल बाजार के सर पर मंडरा रहे हैं। बरहाल, अब निवेशकों का फोकस पिछले वित्त वर्ष की भुलाकर नए वित्त वर्ष पर हैं। बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछले 24 महीनों में रिटर्न लगभग शून्य रहने के कारण मौजूदा स्थिति निवेशकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। खासकर उन निवेशकों के लिए जिन्होंने कोविड के बाद के दौर में लंबी अवधि की समय आधारित गिरावट का अनुभव नहीं किया है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के प्रमुख इंडेक्स निफ्टी-50 और सेंसेक्स का प्रदर्शन पिछले छह सालों में सबसे कमजोर रहा है। इस साल भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ी कीमतें और विदेशी निवेशकों (FIIs) की लगातार निकासी जैसे ट्रिगर निवेशकों पर हावी रहे। इसी वजह से भारतीय बाजारों के इंडेक्स दुनिया के कई अन्य बाजारों से पीछे रह गए।
बीते वित्त वर्ष के दौरान निफ्टी-50 में 5.1 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई। जबकि इस दौरान बीएसई सेंसेक्स 7.1 प्रतिशत नीचे आया। महामारी वाले वित्त वर्ष 2020-21 के बाद इन दोनों इंडेक्स का यह सबसे खराब प्रदर्शन रहा। ब्रोडर मार्केटस का प्रदर्शन भी मिला-जुला रहा। निफ्टी मिडकैप 100 में 1.9 फीसदी की बढ़त हुई, वहीं निफ्टी स्मॉलकैप 100 में करीब 6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
| इंडेक्स | रिटर्न |
|---|---|
| निफ्टी-50 | -5.1% |
| सेंसेक्स | -7.1% |
| निफ्टी मिडकैप 100 | +1.9% |
| निफ्टी स्मॉलकैप 100 | -6% |
FY26 का प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल मार्केट कैप 4,11,55,003 करोड़ रुपये के रहा। जबकि 28 मार्च 2025 को यह 41,375,586 करोड़ रुपते था। इस तरह, बीते वित्त वर्ष में बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप 2,20,583 करोड़ रुपये घट गया। यह 2 जनवरी 2026 को यह 481 लाख करोड़ रुपये के शिखर पर पहुंचा था, जहां से बाद में गिरावट आई। कंपनियों की आय में सुधार के कारण पहले नौ महीनों में हल्की बढ़त देखने को मिली, लेकिन वैश्विक निवेश में अचानक बदलाव और कुछ सेक्टरों में कमजोरी के चलते बाजार की रफ्तार धीमी हो गई।
| अवधि | मार्केट कैप (₹ करोड़ में) |
|---|---|
| FY25-26 अंत | 4,11,55,003 |
| FY24-25 अंत | 4,13,75,586 |
| गिरावट | -2,20,583 |
| ऑल टाइम हाई | 4,81,00,000 |
अमेत्रा पीएमएस के को-फाउंडर करण अग्रवाल ने कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 को असफल ब्रेकआउट का साल कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सितंबर 2024 के हाई लेवल के ऊपर निर्णायक बढ़त के कई प्रयास टिक नहीं पाए। इसकी मुख्य वजह हाई वैल्यूएशन का दबाव और ब्रोडर मार्केट में प्रति शेयर आय (ईपीएस) में गिरावट रही। जीएसटी कटौती, नरम मौद्रिक नीति और अमेरिका-भारत ट्रेड डील जैसे सकारात्मक कारक भी कमजोर होते बुनियादी संकेतकों को संभाल नहीं सके, जो बाजार के हाई वैल्यूएशन से मेल नहीं खाते।
उन्होंने कहा कि भारत का पीईजी रेश्यो बीते वर्ष में 2.5x–3x के ऊंचे स्तर पर बना रहा। जबकि जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे प्रमुख एशियाई बाजारों में यह 1x–2x के बीच है। ऐसे में उचित ईपीएस ग्रोथ के अभाव में निफ्टी 500 कंपनियों के 23x–25x के ऊंचे पी/ई रेश्यो को सही ठहराना मुश्किल रहा। इसके चलते पूरे साल विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली देखने को मिली।
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| निवेशक प्रकार | निवेश/निकासी (₹ करोड़) |
|---|---|
| FPI (विदेशी) | -1,82,000 |
| DII (घरेलू) | +8,35,000 |
वित्त वर्ष 2025-26 की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ, साल के बीच में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव की चिंता और अंत में पश्चिम एशिया तनाव की तिगड़ी ने बाजार को उठने का मौका नहीं दिया।
वित्त वर्ष के अंत में बिकवाली और बढ़ गई। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ तीन महीनों में करीब 80 फीसदी तक बढ़ गईं। इससे भारत में महंगाई, बाहरी संतुलन और आर्थिक वृद्धि को लेकर चिंता बढ़ गई। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत तेल का बड़ा आयातक और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इम्पोर्ट पर निर्भर है। भारतीय शेयर बाजार भी अधिकतर एशियाई और उभरते बाजारों के मुकाबले पीछे रहे। तेल के दबाव के चलते रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया और बॉन्ड यील्ड भी बढ़ गई।
अलग-अलग घटनाक्रमों की वजह से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने लगातार बिकवाली जारी रखी और वित्त वर्ष 2025-26 में उन्होंने रिकॉर्ड 1.82 लाख करोड़ रुपये की निकासी की। हालांकि, इसकी काफी हद तक भरपाई घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) के 8.35 लाख करोड़ रुपये के मजबूत निवेश से हुई। इसने बाजार को ज्यादा गिरने से बचाया। वहीं, कमजोर रुपये की वजह से विदेशी निवेशकों के रिटर्न भी कम हो गए।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से इक्विटी में निवेश की आकर्षण घट गया। इससे बाजार का माहौल और कमजोर हो गया। निफ्टी लगातार चौथे महीने गिरा है, जिससे वैल्यूएशन कुछ नरम हुए हैं। लेकिन एनालिस्ट अभी भी सतर्क हैं और इसकी वजह ऊंची ऊर्जा कीमतों से जुड़े बढ़ते आर्थिक जोखिमों को मान रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी चिंताओं और ट्रेड वॉर के डर के बावजूद वित्त वर्ष 2026-27 में इक्विटी अन्य ज्यादातर एसेट क्लास के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, जिन्होंने वित्त वर्ष 2025-26 के ज्यादातर समय बाजार की चाल को प्रभावित किया।
इन्वैस्ट पीएमएस में पार्टनर और फंड मैनेजर अनिरुद्ध गर्ग का मानना है कि हाल की गिरावट ने वित्त वर्ष 2026-27 में निवेशकों के लिए इक्विटी में प्रवेश का बेहतर मौका दिया है। भारत की इनकम सायकल अभी भी मजबूत है। इसे कैपेक्स, मजबूत बैंकिंग और घरेलू निवेश का समर्थन मिल रहा है। ऐसे में इक्विटी में निवेश बढ़ाना समझदारी होगी। 65% इक्विटी निवेश से वित्त वर्ष 2026-27 में 12 से 15 प्रतिशत रिटर्न मिल सकता है, हालांकि सेक्टर के बीच अंतर रहेगा और सही शेयर चुनना जरूरी होगा।
सोना और चांदी में आई गिरावट को ट्रेंड बदलने का संकेत नहीं समझना चाहिए। मुद्रा अस्थिरता और वैश्विक कर्ज के माहौल में इनकी भूमिका मजबूत बनी हुई है। यह गिरावट निवेश का अच्छा मौका देती है, इसलिए 25% निवेश सोना-चांदी में उचित है, जहां मध्यम अवधि में 10–12% रिटर्न मिल सकता है। बाकी 10% निवेश फिक्स्ड इनकम में रखना पोर्टफोलियो को स्थिरता देता है।
आनंद राठी वेल्थ में मैनेजिंग डायरेक्ट भरत राठौड़ ने कहा कि भारतीय शेयर बाजार इस समय उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहे हैं। 2001 से अब तक निफ्टी 50 को देखें, तो यह हर साल औसतन 18 प्रतिशत तक गिरा है। ऐसे में मौजूदा गिरावट ऐतिहासिक औसत से काफी कम है। इससे यह साफ होता है कि अब तक का बाजार सुधार सामान्य दायरे में है।
उन्होंने कहा कि निवेशक अपने पोर्टफोलियो के लिए इक्विटी और डेट में 80:20 का एसेट एलोकेशन बनाए रखते हुए एक लॉन्ग टर्म रणनीति अपनाएं। इक्विटी लॉन्ग टर्म में वेल्थ बनाती है। जबकि डेट पोर्टफोलियो को स्थिरता देता है। इक्विटी हिस्से के लिए निवेशकों को अलग-अलग इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश करना चाहिए ताकि अलग-अलग वर्गों और सेक्टर में संतुलित निवेश बना रहे। इससे पोर्टफोलियो हर तरह की स्थिति में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
एक्सपर्ट ने कहा, ”निवेशकों को चाहिए कि वे छोटी अवधि के उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हों और अपनी रणनीति पर टिके रहें। अनुशासन और निरंतरता ही उन्हें अपने लंबे समय के लक्ष्यों तक पहुंचने में मदद करेगी।”