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FY26 में शेयर बाजार सुस्त: सेंसेक्स-निफ्टी का 6 साल का सबसे खराब प्रदर्शन, FPI की रिकॉर्ड बिकवाली

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इस वित्त वर्ष के दौरान निफ्टी 50 में 5.1% की गिरावट आई जबकि सेंसेक्स 7.1% नीचे आया। महामारी से प्रभावित वित्त वर्ष 20 के बाद दोनों सूचकांकों का यह सबसे खराब प्रदर्शन था

Last Updated- March 30, 2026 | 10:14 PM IST
stock Market Crash

वित्त वर्ष 26 में भारत के बेंचमार्क सूचकांकों ने पिछले छह सालों में अपना सबसे कमजोर प्रदर्शन किया है। इस साल भू-राजनीतिक झटके, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और विदेशी निवेश के लगातार बाहर जाने जैसी घटनाएं हुईं। इस कारण भारत के इंडेक्स दुनिया के ज्यादातर दूसरे बाज़ारों से पीछे रह गए।

इस वित्त वर्ष के दौरान निफ्टी 50 में 5.1 फीसदी की गिरावट आई जबकि सेंसेक्स 7.1 फीसदी नीचे आया। महामारी से प्रभावित वित्त वर्ष 20 के बाद दोनों सूचकांकों का यह सबसे खराब प्रदर्शन था। व्यापक बाजारों का मिला-जुला हाल रहा। जहां निफ्टी मिडकैप 100 में 1.9 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई, वहीं निफ्टी स्मॉलकैप 100 में करीब 6 फीसदी की गिरावट आई।

वित्त वर्ष 26 में भारत का बाजार पूंजीकरण 412 लाख करोड़ रुपये पर करीब-करीब स्थिर रहा जबकि 2 जनवरी, 2026 को उसने 481 लाख करोड़ रुपये का शिखर छुआ था जहां से यह नीचे आया। कंपनियों की आय में सुधार के बल पर पहले नौ महीनों में एक अंक में वृद्धि दर्ज करने के बाद वैश्विक निवेश में अचानक आए बदलाव और सेक्टोरल कमजोरी के कारण बाज़ारों की रफ्तार धीमी पड़ गई।

एआई में वैश्विक रूप से आगे कंपनियों को पूंजी का आवंटन बढ़ा तो घरेलू आईटी शेयरों में अभूतपूर्व बिकवाली हुई और विदेशियों की लगातार निकासी हुई। इन सबने बाजार के सेंटिमेंट पर भारी असर डाला। निफ्टी आईटी इंडेक्स फरवरी में 19.5 फीसदी गिर गया जो सितंबर 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से इसमें सबसे बड़ी मासिक गिरावट थी।

वित्त वर्ष के आखिर में बिकवाली और तेज हो गई क्योंकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ तीन महीनों में ही करीब 80 फीसदी बढ़ गईं। इससे भारत में महंगाई, बाहरी संतुलन और वृद्धि को लेकर चिंताएं बढ़ गईं, क्योंकि भारत तेल का एक बड़ा आयातक है। भारतीय शेयर बाजार भी ज्यादातर एशियाई और उभरते बाज़ारों के मुकाबले पीछे रहे। तेल से जुड़े लगातार दबाव के बीच रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया और बॉन्ड यील्ड भी बढ़ गई।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) लगातार बिकवाली करते रहे और वित्त वर्ष 26 में उन्होंने रिकॉर्ड 1.82 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की। इसकी भरपाई काफी हद तक घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) के 8.35 लाख करोड़ रुपये के मजबूत निवेश से हुई, जिसने बाजार में गिरावट को रोकने में मदद की। कमजोर होते रुपये ने विदेशी निवेशकों के रिटर्न को घटा दिया।

बॉन्ड यील्ड बढ़ने से इक्विटी की अपील कम हो गई, जिससे बाजार का मूड और भी ठंडा पड़ गया। निफ्टी अब लगातार चौथे महीने गिरा है, जिससे मूल्यांकन कुछ हद तक नरम हो गए हैं। लेकिन ब्रोकरेज फर्म अभी भी सतर्क हैं और इसकी वजह ऊंची एनर्जी कीमतों से जुड़े बढ़ते आर्थिक जोखिमों को बता रही हैं।

गोल्डमैन सैक्स, सिटी, नोमूरा और यूबीएस जैसी वैश्विक ब्रोकरेज फर्मों ने ग्लोबल पोर्टफोलियो में भारत का भार कम कर दिया है और निफ्टी के लिए लक्ष्य घटा दिए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतें लगातार ऊंची रहने से देश का आर्थिक हिसाब-किताब गड़बड़ा सकता है।

गोल्डमैन सैक्स ने कहा है, लंबे समय तक ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत के लिए आर्थिक संकेतकों को बिगाड़ती हैं। उसने धीमी वृद्धि ,भारी महंगाई और चालू खाते के बड़े घाटे के जोखिमों की ओर भी इशारा किया है। ब्रोकरेज फर्म ने 12 महीने के लिए निफ्टी का लक्ष्य घटाकर 25,900 कर दिया है और कैलेंडर वर्ष 26 के लिए आय वृद्धि का अनुमान भी घटाकर 8 फीसदी कर दिया है, जो पहले के अनुमानों से काफी कम है।

उसने यह भी चेतावनी दी कि आय में गिरावट और एआई से होने वाली उथल-पुथल से जुड़ी चिंताओं के कारण विदेशी निवेश की वापसी में देरी हो सकती है। कोटक इंस्टिट्यूशनल इक्विटीज (केआईई) ने कहा कि हालिया सुधार से बाजार के कुछ हिस्सों में जोखिम-प्रतिफल का संतुलन बेहतर हुआ है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि स्थितियां एकदम से तेजी वाली नहीं हैं।

केआईई ने एक नोट में कहा, मूल्यांकन में ठीक-ठाक गिरावट के बाद हमें बाजार के ज्यादातर हिस्सों में जोखिम-प्रतिफल का बेहतर संतुलन दिख रहा है।…

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First Published - March 30, 2026 | 10:05 PM IST

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