दुनिया भर में उथल-पुथल है, तेल की कीमतें चढ़ी हुई हैं, रुपये पर दबाव है, और ब्याज दरों का खेल हर दिन नया मोड़ ले रहा है। ऐसे माहौल में अगर कोई सेक्टर मजबूती से खड़ा दिख रहा है, तो वह है बैंकिंग सेक्टर। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज की ताजा रिपोर्ट कहती है कि मार्च तिमाही में बैंकों का प्रदर्शन डराने वाला नहीं, बल्कि राहत देने वाला हो सकता है। यानी माहौल भले टेढ़ा हो, लेकिन बैंकिंग की गाड़ी अभी पटरी पर है और ठीक-ठाक रफ्तार से चल रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक इस तिमाही में बैंकिंग सिस्टम का कर्ज करीब 4 प्रतिशत तिमाही दर तिमाही बढ़ सकता है। इसका मतलब साफ है कि बाजार में मांग अभी बनी हुई है और कंपनियां भी कर्ज उठा रही हैं। खास बात यह है कि इस बार थोक कर्ज में तेजी दिख सकती है, क्योंकि कई कंपनियां बॉन्ड की जगह सीधे बैंकों से कर्ज लेना पसंद कर रही हैं। दूसरी तरफ जमा भी बढ़ रहे हैं, लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट है- बड़े जमा पर ब्याज महंगा हो गया है, जिससे बैंकों की फंडिंग लागत पर दबाव बढ़ रहा है। यानी कमाई हो रही है, लेकिन जेब पर थोड़ा बोझ भी है।
रिटेल कर्ज की दुनिया में इस समय सबसे बड़ा हीरो गोल्ड लोन है। रिपोर्ट बताती है कि गोल्ड लोन में सालाना आधार पर जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है और यही रिटेल ग्रोथ को संभाले हुए है। पर्सनल लोन में भी कुछ जान दिखी है, लेकिन क्रेडिट कार्ड और होम लोन अभी भी सुस्त पड़े हैं। मतलब आम आदमी की जेब और खर्च करने की आदतें बदल रही हैं- जहां जरूरत है, वहां कर्ज लिया जा रहा है, लेकिन बड़े फैसलों में लोग अभी भी सावधानी बरत रहे हैं।
पिछले कुछ क्वार्टर में सरकारी बैंकों ने कर्ज बढ़ोतरी के मामले में प्राइवेट बैंकों को पीछे छोड़ा है। उनके पास लिक्विडिटी भी ठीक रही और एसेट क्वालिटी भी संभली हुई है, इसलिए वे आक्रामक तरीके से कर्ज दे पा रहे हैं। लेकिन अब बड़े प्राइवेट बैंक भी वापसी के मूड में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक जैसे बड़े नाम इस तिमाही में कर्ज बढ़ोतरी की रफ्तार पकड़ सकते हैं। यानी मुकाबला अब एकतरफा नहीं रहा, प्राइवेट बैंक भी पूरी ताकत से मैदान में उतर रहे हैं।
बैंकों की असली कमाई का खेल एनआईएम यानी नेट इंटरेस्ट मार्जिन से तय होता है, और यहां तस्वीर थोड़ी मिली-जुली है। कुछ बैंकों को मार्जिन पर दबाव झेलना पड़ सकता है, खासकर जहां बड़े जमा ज्यादा हैं और उनकी लागत बढ़ गई है। लेकिन रिपोर्ट यह भी कहती है कि कई बैंकों में एनआईएम स्थिर रह सकता है और कुछ में हल्का सुधार भी दिख सकता है। यानी हालात चुनौतीपूर्ण जरूर हैं, पर कंट्रोल से बाहर नहीं हैं। बैंक अपने तरीके से बैलेंस बना रहे हैं- कहीं लोन मिक्स बदलकर, कहीं जमा की लागत संभालकर।
पिछले कुछ क्वार्टर में एनआईआई यानी ब्याज से होने वाली कमाई की रफ्तार कर्ज बढ़ोतरी से पीछे चल रही थी। लेकिन अब रिपोर्ट का मानना है कि यह नीचे का स्तर छू चुकी है और यहां से सुधार शुरू हो सकता है। अनुमान है कि एनआईआई ग्रोथ सालाना आधार पर करीब 9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जो पहले 2 से 5 प्रतिशत के बीच अटकी हुई थी। यानी बैंक अब सिर्फ कर्ज बांट नहीं रहे, उससे कमाई भी बेहतर करने लगे हैं। यह बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़ा पॉजिटिव सिग्नल माना जा रहा है।
इस तिमाही में बॉन्ड यील्ड बढ़ी है, और इसका असर बैंकों के ट्रेजरी पोर्टफोलियो पर पड़ना तय है। जब यील्ड बढ़ती है तो पुराने बॉन्ड की कीमत गिरती है, जिससे मार्क-टू-मार्केट नुकसान होता है। लेकिन रिपोर्ट में राहत वाली बात यह है कि एएफएस पोर्टफोलियो का बड़ा नुकसान सीधे मुनाफा-नुकसान खाते में नहीं जाएगा, बल्कि रिजर्व में एडजस्ट होगा। यानी नुकसान होगा जरूर, पर उसका पूरा असर नतीजों में नहीं दिखेगा। यही वजह है कि ट्रेजरी कमजोर रहने के बावजूद कुल मुनाफा बहुत ज्यादा नहीं बिगड़ने वाला।
रिपोर्ट के अनुसार प्राइवेट बैंकों का कुल मुनाफा इस तिमाही में तिमाही आधार पर 4 से 5 प्रतिशत और सालाना आधार पर करीब 15 प्रतिशत बढ़ सकता है। इसकी वजह सिर्फ कमाई नहीं, बल्कि खर्च पर नियंत्रण भी है। कई बैंकों ने ऑपरेटिंग खर्च को संभालकर रखा है और जहां खर्च बढ़ा भी है, वहां बेस पहले से ऊंचा था। इसके अलावा कुछ बैंकों को रिकवरी से भी मदद मिल सकती है। यानी बैंक सिर्फ ब्याज कमाई पर निर्भर नहीं हैं, वे अंदरूनी खर्च का खेल भी समझदारी से खेल रहे हैं।
बैड लोन यानी स्लिपेज पर इस तिमाही में अच्छी खबर आने की उम्मीद है। खासकर माइक्रोफाइनेंस वाले पोर्टफोलियो में कई बैंकों के स्लिपेज 25 से 45 प्रतिशत तक कम हो सकते हैं। एग्री कर्ज में भी मौसमी सुधार दिख सकता है, जिससे कुल एसेट क्वालिटी बेहतर होगी। हां, एमएसएमई सेगमेंट में थोड़ी कमजोरी दिख सकती है, लेकिन कुल मिलाकर तस्वीर राहत वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट बैंकों का स्लिपेज रेशियो घट सकता है और सरकारी बैंक तो पहले से ही मजबूत स्थिति में हैं। यानी बैंकिंग सिस्टम में फिलहाल खराब कर्ज का डर बढ़ता नहीं, घटता दिख रहा है।
रिपोर्ट ने साफ कहा है कि मैक्रो माहौल आसान नहीं है। मध्य पूर्व में तनाव है, गैस सप्लाई की दिक्कत है, छोटे कारोबारों पर दबाव है, रुपये ने कमजोर स्तर छुआ है और ब्याज दरें भी ऊपर हैं। इन सबका असर उद्योग, व्यापार और छोटे कारोबारों पर पड़ सकता है, जिससे आगे चलकर कर्ज चुकाने की क्षमता पर असर आए। लेकिन फिलहाल बैंकिंग सिस्टम की बैलेंस शीट इतनी कमजोर नहीं है कि एक झटके में हिल जाए। हां, शुरुआती डिफॉल्ट संकेतों पर नजर रखना जरूरी है, खासकर उन सेक्टरों में जो वैश्विक हालात से ज्यादा जुड़े हुए हैं।
| बैंक का नाम | मौजूदा भाव (रुपये) | रेटिंग |
|---|---|---|
| एक्सिस | 1,198 | BUY |
| बंधन | 146 | BUY |
| सिटी यूनियन बैंक (CUB) | 240 | BUY |
| डीसीबी | 165 | BUY |
| फेडरल | 266 | ADD |
| एचडीएफसी बैंक | 751 | BUY |
| आईडीएफसी फर्स्ट बैंक | 60 | ADD |
| इंडसइंड बैंक | 779 | HOLD |
| केवीबी | 273 | BUY |
| कोटक | 358 | BUY |
| आरबीएल | 301 | BUY |
| एसआईबी | 37 | BUY |
| यस बैंक | 18 | HOLD |
रिपोर्ट का सबसे मजबूत संदेश यही है कि बैंकिंग शेयरों में जो गिरावट आई है, उसने वैल्यूएशन को आकर्षक बना दिया है। यानी डर पहले ही कीमतों में शामिल हो चुका है। ऐसे में अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक आते हैं, तो इन शेयरों में रिकवरी की अच्छी गुंजाइश बनती है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज को बड़े प्राइवेट बैंक ज्यादा पसंद हैं और उसने खास तौर पर एचडीएफसी बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक और एक्सिस बैंक को प्राथमिकता दी है। इनके अलावा कुछ मिड-साइज बैंकों में भी मौका दिख रहा है, लेकिन वहां जोखिम थोड़ा ज्यादा है।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)