Investment Strategy: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने अब सिर्फ सीमाओं को नहीं, बल्कि भारत के शेयर बाजार को भी झकझोर दिया है। 27 फरवरी से जैसे ही हालात बिगड़े, बाजार में घबराहट साफ दिखने लगी। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही 7 प्रतिशत से ज्यादा टूट चुके हैं। निवेशकों के मन में एक ही सवाल है। क्या यह गिरावट और बढ़ेगी या यहीं से वापसी शुरू होगी?
विशेषज्ञों की मानें तो यह गिरावट किसी बड़ी आर्थिक कमजोरी की वजह से नहीं आई है। यह ज्यादा भू-राजनीतिक तनाव का असर है। यानी कंपनियों की कमाई और देश की अर्थव्यवस्था अभी भी मजबूत है। जैसे ही हालात साफ होंगे, बाजार में स्थिरता लौट सकती है।
मास्टर कैपिटल सर्विसेज के रवि सिंह कहते हैं कि बाजार में आई गिरावट पूरी तरह खराब संकेत नहीं है। उनके मुताबिक आगे खपत, बैंकिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सेक्टर बाजार को संभाल सकते हैं। हालांकि उनका कहना है कि अभी जल्दी बड़ा मुनाफा मिलना मुश्किल है और बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। जब तक कच्चे तेल की कीमतें और जंग की स्थिति साफ नहीं होती, तब तक अनिश्चितता रहेगी। ऐसे समय में अच्छी और मजबूत कंपनियों में थोड़ा-थोड़ा करके निवेश करना बेहतर माना जाता है।
आनंद राठी की तन्वी कंचन कहती हैं कि इस समय निवेशकों को बहुत सोच समझकर कदम उठाना चाहिए। उनके अनुसार उन कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए जिनकी बैलेंस शीट मजबूत है और जिनकी कमाई स्पष्ट दिखती है। वित्तीय, ऑटो और खपत सेक्टर में हाल की गिरावट ज्यादा डर की वजह से आई है, न कि कंपनियों की हालत खराब होने से। इसलिए यहां आगे सुधार की संभावना बन सकती है।
27 फरवरी के बाद सबसे ज्यादा गिरावट PSU बैंक सेक्टर में देखी गई है, जो करीब 13 प्रतिशत गिरा। ऑटो सेक्टर 10.9 प्रतिशत नीचे आया और ऑयल एंड गैस सेक्टर में 9.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। तेल की बढ़ती कीमतों ने महंगाई की चिंता बढ़ा दी है। साथ ही गैस और ईंधन की कमी की आशंका ने कई सेक्टरों पर दबाव बना दिया है।
JM फाइनेंशियल की रिपोर्ट के मुताबिक अगर वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ती है, तो ब्याज दरों में कटौती रुक सकती है। इससे बाजार पर और दबाव आ सकता है। वहीं नोमुरा का कहना है कि ऑटो कंपनियों के लिए खतरा बढ़ सकता है। अगर गैस की कमी होती है, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है, खासकर उन कंपनियों में जो पहले से पूरी क्षमता पर काम कर रही हैं।
इतिहास बताता है कि भू-राजनीतिक तनाव के कारण बाजार में थोड़े समय के लिए उतार-चढ़ाव जरूर आता है, लेकिन हालात साफ होते ही भारतीय शेयर बाजार तेजी से संभल जाता है।
स्मॉलकेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में इजरायल-हमास संघर्ष के दौरान बाजार में 4 से 6 प्रतिशत की गिरावट आई थी। लेकिन यह गिरावट एक महीने के भीतर पूरी तरह खत्म हो गई और उसके बाद अगले छह महीनों में बाजार में अच्छी तेजी देखने को मिली।
इसी तरह अमेरिका-चीन के बीच व्यापार तनाव और टेक्नोलॉजी विवाद के समय भी बाजार में 5 से 8 प्रतिशत तक गिरावट आई थी, लेकिन आम तौर पर दो महीने के भीतर बाजार फिर से स्थिर हो गया।
क्षेत्रीय तनाव का असर भी ज्यादा समय तक नहीं रहता। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव के दौरान बाजार में 2 से 3 प्रतिशत की गिरावट आई थी, लेकिन जल्दी ही रिकवरी हो गई। वहीं 2025 में अमेरिका द्वारा भारतीय आयात पर नए टैरिफ की चिंता भी ज्यादा समय तक असर नहीं डाल पाई, क्योंकि देश की मजबूत अर्थव्यवस्था ने बाजार को संभाल लिया।
इन उतार-चढ़ाव के बावजूद, लंबी अवधि में भारतीय शेयर बाजार ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। पिछले चार साल में बाजार ने करीब 12.7 प्रतिशत सालाना रिटर्न दिया है, जो इसके सामान्य औसत के बराबर है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।