अमेरिका/इजरायल की ईरान के खिलाफ लड़ाई और ईरान के जवाबी हमलों से पैदा हुई आर्थिक अनिश्चितता ने भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि भारत में लगभग आधा कच्चा तेल, दो-तिहाई एलएनजी और 90 प्रतिशत एलपीजी का आयात खाड़ी देशों से ही होता है और वहां से आने वाले टैंकर होर्मुज स्ट्रेट से होकर निकलते हैं।
यह पूरा क्षेत्र भारत का बाजार भी है और लगभग एक-तिहाई वाणिज्यिक निर्यात से जुड़ा है। यह क्षेत्र भारत में वहां से आने वाली रेमिटेंस राशि की आवक का सबसे बड़ा स्रोत भी है। इस इलाके में संघर्ष से पहले लगभग 1 करोड़ प्रवासी भारतीय काम कर रहे थे।
पश्चिम एशिया युद्ध के चलते भारतीय शेयर बाजार में तीखी बिकवाली हुई है। युद्ध के कारण कंपनियों के व्यापारिक घाटे, ऊर्जा कीमतों में व्यवधान से उत्पादन संबंधित नुकसान और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से लाभ व आय की हानि को ध्यान में रखते हुए निवेशक परिसंपत्ति के मूल्य का फिर से मूल्यांकन कर रहे हैं। युद्ध की शुरुआत के बाद से निफ्टी 50 सूचकांक में 7.4 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि कई सेक्टरों के सूचकांकों में इससे भी ज्यादा गिरावट देखी गई है।
रियल्टी इंडेक्स सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। निफ्टी रियल्टी इंडेक्स 11.3 प्रतिशत गिरा है, क्योंकि निवेशक ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और आर्थिक अनिश्चितता के माहौल में नए घरों की मांग को लेकर चिंतित हैं। युद्ध की शुरुआत के बाद से निफ्टी बैंक में भी 11.3 प्रतिशत की गिरावट आई है। बैंकों में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपने कॉरपोरेट और व्यावसायिक ऋणों में ऊंचे जोखिम के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
विनिर्माण क्षेत्र में ऑटोमोबाइल कंपनियों के शेयरों को सबसे ज्यादा चोट पहुंची है। निफ्टी ऑटो 11 प्रतिशत गिर गया है, क्योंकि ईंधन की ऊंची कीमतों से नए वाहनों की मांग कम होने की आशंका है। तेल और गैस सेक्टर का सूचकांक 10.7 प्रतिशत नीचे आया है, जिसकी अगुआई सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने की है।
इसके विपरीत, निवेशक पश्चिम एशिया में संघर्ष से आईटी सेवा, फार्मा और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों की कंपनियों के लिए केवल मामूली गिरावट की उम्मीद कर रहे हैं। यहां निफ्टी 200 इंडेक्स के 10 ऐसे शेयर शामिल किए गए हैं जिनमें फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने के बाद से सबसे बड़ी गिरावट आई है।