संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 की लोक सभा में पराजय, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की 12 वर्षों में पहली ऐसी हार है। इस हार ने सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच विश्वास में कमी की गहराई को रेखांकित किया। लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में एक-तिहाई सीटों के लिए महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने तथा साथ ही निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का प्रस्ताव रखने वाले इस विधेयक को पेश किए जाने के दौरान विपक्षी दलों ने अभूतपूर्व एकता का प्रदर्शन किया। इसके समर्थन में 298 मत पड़े जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी।
संसद के विशेष सत्र के माध्यम से जल्दबाजी में पेश किया गया यह विधेयक राजनीति से प्रेरित प्रतीत हुआ ताकि 2029 के आम चुनाव से पहले महिला आरक्षण को तेजी से लागू किया जा सके और सत्ताधारी दल को चुनावी विमर्श को नियंत्रित करने का मौका मिल सके। परंतु विधेयक को परिसीमन से जोड़कर सरकार ने राजनीतिक माहौल का गलत आकलन किया। यह इस बात को दर्शाता है कि संविधान संशोधन से पहले पारंपरिक रूप से होने वाले संवाद और सहमति निर्माण की कमी रही।
वर्तमान विधान सभा चुनावों के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाने और विस्तृत जानकारी प्रदान करने की मांग कथित तौर पर नजरअंदाज कर दी गई। दक्षिण भारत के राज्यों ने अक्सर अपने बेहतर मानव विकास सूचकांकों से लाभ न मिलने पर गहरा असंतोष प्रकट किया है। उदाहरण के लिए वित्त आयोग की शर्तें तय करते वक्त। ऐसे में सरकार को भी ठहरकर सोचना चाहिए था। खासतौर पर तब जबकि संसद में सत्तारूढ़ दल के पास पर्याप्त संख्या नहीं थी।
वर्ष 2023 में महिलाओं को आरक्षण देने संबंधी 106वां संविधान संशोधन लगभग सर्वसम्मति से पारित हो गया था। हालांकि, इस अधिनियम में कहा गया था कि यह आरक्षण तभी लागू होगा जब अधिनियम के प्रवर्तन के बाद पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन की कवायद पूरी हो जाएगी। वर्तमान जनगणना की संदर्भ तिथि मार्च 2027 है। ऐसे में इस बात की संभावना बहुत कम थी कि परिसीमन की प्रक्रिया 2029 के आम चुनावों के पहले पूरी हो सके। 131वें संविधान संशोधन का उद्देश्य संसदीय सीमाओं पर लगे उस प्रतिबंध को हटाना था, जो 2001 के संविधान संशोधन के माध्यम से लागू की गई थीं और 2026 की जनगणना तक कायम रहने वाली थीं।
इस संशोधन के जरिये 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को अंजाम दिया जाना था। यद्यपि प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें देना निर्विवाद सिद्धांत है, लेकिन विधेयक पर गहराई से नजर डालने पर प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है।
उदाहरण के लिए, संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में प्रावधान है कि प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन किया जाएगा और यह नवीनतम जनगणना पर आधारित होगा। नवीनतम विधेयक ने संसद को यह अधिकार दिया कि वह परिसीमन का समय-निर्धारण और किस जनगणना का उपयोग करना है, तय करे, और ये निर्णय साधारण बहुमत से लिए जाएंगे।
वर्तमान सरकार के पास ये दोनों हैं। यह समस्या इसलिए आई क्योंकि नवीतनम विधेयक ने अगला परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर करने की इजाजत दी। वर्तमान हालात के आधार पर दक्षिण भारत के राज्यों की सीटों की संख्या और हिस्सेदारी दोनों में कमी आती जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को लाभ मिलता।
संसद के उथल-पुथल भरे राजनीतिक माहौल में सरकार का बाद वाला प्रस्ताव जो मूल मसौदे में नहीं था, दब गया। उसमें लोक सभा की सीटों की संख्या 50 फीसदी बढ़ाकर 543 से 850 करने की बात थी, जिससे राज्यों के बीच सीटों का अनुपात नहीं बदलता।
जहां सत्तारूढ़ दल और विपक्षी नेता स्त्री-पुरुष समानता के प्रति प्रतिबद्धता या उसकी कमी पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, वहीं सच्चाई यह है कि महिलाओं का आरक्षण केवल एक साधन है, लक्ष्य नहीं। अन्य सशक्तीकरण उपाय, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरियों में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए कठिन परिश्रम शामिल है, भारतीय महिलाओं को वास्तव में उनके संसदीय गौरव हासिल करने में बहुत मदद करेंगे, बजाय इसके कि वे केवल सकारात्मक कार्रवाई पर निर्भर रहें।