यह सही है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के अंतिम परिणाम को लेकर अभी काफी अनिश्चितता बनी हुई है लेकिन रविवार को इसकी घोषणा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव को स्पष्ट रूप से कम कर दिया है। रिपोर्टों में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट में यातायात धीरे-धीरे बढ़ेगा। कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को सामान्य स्तर पर लौटने में अगर महीनों नहीं तो भी हफ्तों का समय लग सकता है।
आंशिक रूप से ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि युद्ध के दौरान इस क्षेत्र में कई संयंत्र-केंद्र क्षतिग्रस्त हो गए। इसके बावजूद कच्चे तेल की कीमतें कम हुई हैं और आपूर्ति दबाव कम होने के साथ इनके और नीचे आने की उम्मीद है। कम ऊर्जा कीमतें और बेहतर उपलब्धता वैश्विक अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाएंगी। खासतौर पर भारत जैसे देशों को जो कच्चे तेल की अपनी अधिकांश जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
पश्चिम एशिया में छिड़ी लड़ाई ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर काफी दबाव डाला। खासतौर पर बाहरी खातों को संभालने में। देश का चालू खाते का घाटा (सीएडी) तेल और गैस की ऊंची कीमतों के कारण बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 2 फीसदी तक हो जाने की आशंका थी। व्यापक अनिश्चितता ने पूंजी के बाहर जाने के हालात बनाए। परिणामस्वरूप भारत को चालू खाते और पूंजी खाते दोनों में घाटे का सामना करना पड़ा जिससे रुपये पर दबाव आया।
भारतीय रुपया मार्च से मई के बीच 5 फीसदी से अधिक गिर गया। विदेशी मुद्रा प्रवाह में सुधार लाने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक ने इस महीने की शुरुआत में कई उपायों की घोषणा की। इनमें विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के कराधान में विसंगति को ठीक करना, बाहरी वाणिज्यिक उधार को प्रोत्साहित करना और बैंकों को प्रवासी भारतीयों से नई विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (एफसीएनआर-बी) जमा जुटाने के लिए प्रेरित करना शामिल था।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि विदेशी पूंजी लाने के लिए और कदम उठाए जाएंगे। सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा घोषित उपायों से पर्याप्त प्रवाह आने में मदद मिलेगी। बैंक आक्रामक रूप से एफसीएनआर-बी जमा जुटाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं इसलिए कुछ अनुमानों के अनुसार इससे 100 अरब डॉलर तक का प्रवाह हो सकता है। अपेक्षित प्रवाह और साथ ही पश्चिम एशिया में अनिश्चितता में कमी के कारण अल्पावधि में बाहरी खातों पर दबाव कम होने की उम्मीद है। इसका प्रतिबिंब हाल के दिनों में रुपये में सुधार में भी दिखता है।
हालांकि नीति-निर्माताओं को निकट भविष्य में स्थिरता की संभावित वापसी से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि बाहरी खाता पिछले वर्ष भी दबाव में था। ऐसा आंशिक रूप से व्यापार-संबंधी अनिश्चितताओं के कारण था। भारत को कई मोर्चों पर काम करने की आवश्यकता है क्योंकि विभिन्न मदों के तहत विदेशी उधारी बढ़ाना दीर्घकालिक टिकाऊ समाधान नहीं हो सकता। आमतौर पर हमारे यहां चालू खाते के घाटे की हालत रहती है जो विकास स्तर और निवेश आवश्यकताओं को देखते हुए उचित है।
हालांकि हमें अपने बचत और निवेश के अंतर को पाटने के लिए स्थिर दीर्घकालिक पूंजी की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई आमतौर पर विदेशी पूंजी का सबसे वांछित रूप माना जाता है। लेकिन 2024-25 में सकल एफडीआई आवक 2020-21 में प्राप्त स्तर से कम थी। इसके अलावा भारतीय कंपनियों द्वारा विदेश में निवेश और विदेशी कंपनियों द्वारा रकम वापस ले जाने का स्तर बढ़ गया है जिससे शुद्ध एफडीआई कम हो गया है जो भुगतान संतुलन के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है।
यद्यपि भारतीय कंपनियों द्वारा कुछ विदेशी निवेश और विदेशी कंपनियों द्वारा धन वापसी अपेक्षित है लेकिन लक्ष्य सकल प्रवाह को पर्याप्त रूप से बढ़ाने का होना चाहिए। इसके अलावा भारत को निर्यात बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हाल के महीनों में कई व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करना एक अच्छा कदम रहा है। हालांकि पिछले दशक या उससे अधिक में बढ़े हुए शुल्कों के प्रभाव की समीक्षा करना उचित होगा। गत 18 महीनों में रुपये में काफी गिरावट आई है जिससे व्यापार योग्य क्षेत्रों को मदद मिल सकती है। शायद अब शुल्क घटाना शुरू करने का समय आ गया है। इसके अलावा बढ़ती अनिश्चित दुनिया में मुद्रा प्रबंधन की भी समीक्षा की जरूरत हो सकती है।