हाल के दिनों में नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में फैली हिंसा को केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह भारत के श्रम बाजार में बढ़ते तनाव को दर्शाती है। उच्च पारिश्रमिक की मांग से शुरू हुआ यह मामला तेजी से बढ़ा, लेकिन असंतोष समय के साथ बढ़ता रहा है। इसके तात्कालिक कारण स्पष्ट हैं।
पड़ोसी राज्य हरियाणा के मानेसर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद राज्य में न्यूनतम मजदूरी 35 फीसदी बढ़ा दी गई। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे एकीकृत श्रम बाजार में इस तरह की असमानताएं अस्वीकार्य हैं। ये तुलना को बढ़ावा देती हैं, शिकायतों को तीव्र करती हैं और राज्य स्तरीय वेतन नीतियों पर दबाव डालती हैं। साथ ही, पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण महंगाई का दबाव बढ़ा है जिससे जीवन यापन के खर्चे तेजी से बढ़ गए हैं।
खासकर असंगठित बाजारों में रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अब नोएडा और गाजियाबाद में 21 फीसदी की अंतरिम वेतन वृद्धि की घोषणा की है। राज्य के अन्य हिस्सों में वृद्धि अपेक्षाकृत कम है।
यह अशांति गहरी संरचनात्मक समस्याओं की ओर इशारा करती है। श्रमिक अनियमित पारिश्रमिक भुगतान और शोषणकारी प्रथाओं का आरोप लगाते हैं। इसका बड़ा कारण ठेकेदारों का व्यापक उपयोग है, जो जवाबदेही को धुंधला कर देता है और प्रवर्तन को कमजोर करता है। कई श्रमिकों के लिए यह स्पष्ट नहीं है कि वे किन अधिकारों के हकदार हैं, और यह आश्वासन तो और भी कम है कि उन्हें वे अधिकार प्राप्त होंगे।
हाल ही में हुए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़े इस असुरक्षा की स्थिति को और पुष्ट करते हैं। भारत में पारिश्रमिक वृद्धि धीमी और असमान रही है, विशेष रूप से आकस्मिक या अस्थायी श्रमिकों के लिए, जो सबसे अधिक जोखिम में हैं। जहां मजदूरी बढ़ी भी है, वह अक्सर महंगाई के साथ तालमेल बिठाने में विफल रही है।
रोजगार की संरचना पर करीब से नजर डालने पर किसी भी आशावाद पर पानी फिर जाता है। भारत का अधिकांश कार्यबल स्वरोजगार में है। यह 2025 में 56 फीसदी से अधिक था, जो उससे पिछले वर्ष की तुलना में मामूली रूप से कम है। नियमित वेतनभोगी रोजगार में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन यह किसी सार्थक बदलाव का संकेत देने के लिए पर्याप्त नहीं है।
आकस्मिक श्रम कुल रोजगार का लगभग पांचवां हिस्सा है और उसमें नगण्य परिवर्तन हुआ है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो रोजगार की संरचना अभी भी इस प्रकार के कार्यों से प्रभावित है जो आमतौर पर अनौपचारिक और असुरक्षित हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत अपने बढ़ते कार्यबल के लिए पर्याप्त रोजगार सृजित नहीं कर रहा है।
संस्थागत प्रतिक्रिया भी अपर्याप्त रही है। न्यूनतम मजदूरी में आवधिक और पूर्वानुमानित संशोधन अक्सर विलंबित होते रहे हैं, जिससे वे स्थिरता के साधन के बजाय प्रतिक्रियात्मक उपाय बनकर रह गए हैं। हाल की घटनाओं से स्पष्ट है कि इस प्रकार की तदर्थ वृद्धि निरंतर वार्ता और विश्वसनीय शिकायत निवारण तंत्र का विकल्प नहीं हो सकती। चार श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन में देरी ने समस्या को और बढ़ा दिया है। इन सुधारों का उद्देश्य एक अधिक समान वेतन ढांचा तैयार करना और श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करना था।
विशेष रूप से, वेतन संहिता का उद्देश्य उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित करने के लिए एक सांविधिक राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी स्थापित करना है, साथ ही यह अनिवार्य करना है कि सरकार पांच वर्ष से अधिक के अंतराल पर न्यूनतम मजदूरी दर में संशोधन करे। फिर भी, नियमों के अभी तक अधिसूचित न होने के कारण, नियोक्ता और श्रमिक दोनों अनिश्चितता की स्थिति में हैं, जिससे भ्रम और अविश्वास बढ़ रहा है।
इनमें से कोई भी बात नोएडा और मानेसर में हुई हिंसा को उचित नहीं ठहराती। लेकिन यह इस बात को उजागर करता है कि आर्थिक स्थिरता के लिए उचित मजदूरी या वेतन, प्रभावी प्रवर्तन और निरंतर सहयोग आवश्यक हैं।