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Editorial: तेल संकट और महंगे ईंधन की दोहरी मार, बेकाबू हो सकती देश में महंगाई की रफ्तार

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वैश्विक तनाव के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारत में ईंधन के दाम बढ़ाए गए हैं, जिससे आने वाले दिनों में मुद्रास्फीति और आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं

Last Updated- May 17, 2026 | 9:31 PM IST
Petrol Pump
प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो क्रेडिट: PTI

सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने गत सप्ताह पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया। चार साल में यह पहला मौका था जब तेल कीमतें बढ़ाई गईं। गैस वितरण कंपनियों ने भी कंप्रेस्ड नेचुरल गैस यानी सीएनजी की कीमतों में 2 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी की है। वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें बीते कुछ महीनों में 50 फीसदी से अधिक बढ़ चुकी हैं। ऐसा पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग और होर्मुज स्ट्रेट में ईरान और अमेरिका की नाकाबंदी की बदौलत हो रहा है।

सरकार ने कई कारणों से पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि को टाला लेकिन हर बीतते दिन के साथ ऐसा करना अव्यावहारिक होता जा रहा था। पेट्रोल और डीजल पर विशेष उत्पाद शुल्क में कमी के कारण भी उसे नुकसान हो रहा था। तेल विपणन कंपनियों को रोजाना करीब 1,000 करोड़ रुपये की अंडर रिकवरी का सामना करना पड़ रहा था। कीमतों में इजाफे से उनको कुछ राहत मिलेगी लेकिन वह शायद ही पर्याप्त साबित हो। आने वाले दिनों और सप्ताहों में पेट्रोल-डीजल की पंप कीमतों में और इजाफा करना होगा।

ईंधन की कीमतों में वृद्धि को लेकर चिंताएं समझी जा सकती हैं। ऊंची कीमतों का दबाव समाज के सबसे गरीब वर्गों पर सबसे अधिक पड़ता है। हालांकि सरकार या तेल कंपनियों के लिए लंबे समय तक नुकसान सहना भी संभव नहीं है। भले ही ईंधन की मांग को कम लचीला माना जाता है लेकिन कीमतों में वृद्धि अपील की तुलना में अधिक बचत और संयम को प्रोत्साहित करेगी। कीमत में इजाफे का बोझ अंतिम उपभोक्ता पर डालना ही सबसे विवेकपूर्ण नीति विकल्प है लेकिन इसके अन्य व्यापक आर्थिक परिणाम होंगे जिनका प्रबंधन करना होगा।

तेल की कीमतों का झटका आमतौर पर अफस्फीतिकारी प्रभाव डालता है। दूसरे शब्दों में यह वृद्धि दर को कम करता है और मुद्रास्फीति दर को बढ़ाता है। वर्तमान झटका संभावित रूप से बड़ा प्रभाव डाल सकता है क्योंकि ऊंची कीमतों के अलावा, उपलब्धता भी एक समस्या रही है। उदाहरण के लिए गैस की उपलब्धता।

थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर अप्रैल में 8.3 फीसदी तक बढ़ गई जबकि इसके पिछले महीने यह 3.9 फीसदी थी। इसका मुख्य कारण ऊंची ईंधन कीमतें थीं। अप्रैल के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित यानी खुदरा मुद्रास्फीति दर अपेक्षाकृत मामूली स्तर पर 3.5 फीसदी रही, क्योंकि ऊंची तेल कीमतों का सीमित असर उपभोक्ताओं तक पहुंचा। ईंधन की कीमतों में वृद्धि के बाद, अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि खुदरा मुद्रास्फीति दर 4 फीसदी के करीब पहुंच जाएगी।

यह राहत की बात है कि ईरान संघर्ष की शुरुआत में मुद्रास्फीति दरें निचले स्तर पर थीं। चूंकि संघर्ष के शीघ्र समाधान के कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं, ऐसे में ईंधन कीमतों का आगे असर मुद्रास्फीति दर को और बढ़ा देगा। मौद्रिक नीति के संदर्भ में केंद्रीय बैंक आमतौर पर ऊर्जा कीमतों में अचानक वृद्धि को नजरअंदाज करते हैं। हालांकि लगातार ऊंची कीमतें द्वितीयक प्रभाव पैदा कर सकती हैं, जो नीति संबंधी चुनौतियों को बढ़ा सकती हैं।

आने वाले महीनों में रिजर्व बैंक के लिए स्थिति और जटिल हो सकती है क्योंकि इस वर्ष मॉनसून सामान्य से कम रहने की संभावना है। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो खाद्य और ईंधन की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को प्रभावित कर सकती है। इसलिए मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) को अत्यधिक सतर्क रहना होगा।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि विकसित दुनिया के कई हिस्सों में मुद्रास्फीति दरें लक्ष्य से कहीं अधिक चल रही हैं, और उन्हें भारत से पहले दरें बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया के रिजर्व बैंक ने इस महीने की शुरुआत में लगातार तीसरी बार नीतिगत दर बढ़ाई। अमेरिका में मुद्रास्फीति दर लक्ष्य से लगभग दोगुनी चल रही है। विकसित देशों में संभावित दर वृद्धि पूंजी प्रवाह को और प्रभावित कर सकती है और मुद्रा पर दबाव डाल सकती है। जून में होने वाली एमपीसी की बैठक को कई गतिशील पहलुओं से निपटना होगा।

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First Published - May 17, 2026 | 9:31 PM IST

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