अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिकी वार्ता दल की इस्लामाबाद की यात्रा रद्द करने और ईरान के साथ युद्ध विराम वार्ता को दोबारा शुरू करने के लिए जा रहे इस दल को वापस बुलाने के निर्णय ने संकट के शीघ्र समाधान की उम्मीदों को समाप्त कर दिया है। दोनों पक्षों द्वारा प्रभावी रूप से होर्मुज स्ट्रेट को अवरुद्ध करने की कीमत वैश्विक अर्थव्यवस्था को ही चुकानी पड़ेगी। यद्यपि ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के रक्षा बलों के प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाकात कर संकट समाप्त करने के लिए संभावित ढांचा प्रस्तुत किया लेकिन ईरान इस बात पर अडिग रहा कि प्रत्यक्ष वार्ता एजेंडे में नहीं है।
इसके बाद ओमान की यात्रा, और पिछले महीने सऊदी अरब के विदेश मंत्री के साथ हुई वार्ता, यह संकेत देती है कि ईरानी शासन अपने उन अरब पड़ोसियों के साथ अलग समझौता करने की कोशिश कर रहा है, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। जिन मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है उनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम है, जिसे अमेरिका पूरी तरह रोकना चाहता है और अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का भविष्य, जिसे अमेरिका अपने कब्जे में लेना चाहता है। इनमें होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नाकाबंदी हटाना और युद्ध विराम के विस्तार के बावजूद दक्षिणी लेबनान पर इजरायल के लगातार हमले जैसे मसले भी शामिल हैं।
इस बीच, संघर्ष के लंबे समय तक छिड़े रहने का जोखिम काफी बढ़ गया है। सप्ताहांत में तीसरा विमानवाहक पोत, यूएसएस जॉर्ज डब्ल्यू बुश, ईरान के पास के जलक्षेत्र में प्रवेश कर गया, जो पहले से ही वहां मौजूद दुनिया के सबसे बड़े विमानवाहक पोत यूएसएस जेराल्ड फोर्ड और यूएसएस अब्राहम लिंकन का साथ देगा। क्षेत्र में तीन विमानवाहक पोतों की मौजूदगी अत्यंत असामान्य मानी जाती है और यह वहां अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खतरे को काफी बढ़ा देती है।
इसी समय, शुक्रवार को अमेरिका ने चीन-स्थित एक स्वतंत्र तेल रिफाइनरी और ईरानी तेल परिवहन से जुड़ी लगभग 40 शिपिंग कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए। उत्तर-पूर्वी चीन में स्थित यह रिफाइनरी रियायती कच्चे तेल को प्रोसेस करती है और मुख्यतः अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर काम करती है। इस कदम का उद्देश्य ईरान की ऊर्जा निर्यात को बाधित कर उस पर अधिकतम दबाव डालना है।
हालांकि, पेट्रो-युआन निपटान प्रणाली के लगातार विस्तार ने, जो दशकों पुराने पेट्रो-डॉलर व्यवस्था से प्रतिस्पर्धा कर रहा है, ईरान के इस इनकार को सहारा दिया है कि वह तब तक अमेरिकी वार्ताकारों के साथ प्रत्यक्ष वार्ता नहीं करेगा जब तक अमेरिका विभिन्न क्षेत्रों में उसकी तय सीमाओं को मान्यता नहीं देता।
लेकिन दोनों पक्षों का बातचीत की मेज पर न आ पाना एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि ईरान पर आर्थिक दबाव डालने की ट्रंप की रणनीति से, तेहरान की सत्ता का अमेरिका की शर्तों को मानने के लिए राजी होना मुश्किल ही है।
सप्ताहांत के घटनाक्रम से निकला गंभीर संकेत यह है कि दुनिया को इस अनिश्चितता के साथ अनिश्चितकाल तक जीना सीखना होगा। होर्मुज स्ट्रेट के दोहरे अवरोध से, जिसके माध्यम से दुनिया का 20 फीसदी तेल और गैस प्रवाहित होता है, कच्चे तेल की कीमतों के ऊंचा बने रहने की आशंका है। वैश्विक वृद्धि पूर्वानुमान पहले ही घटाए जा रहे हैं क्योंकि भारत सहित कई देश तेल और गैस के वैकल्पिक स्रोत तलाश रहे हैं। अमेरिका इस प्रवृत्ति का लाभ उठाना चाहता है।
भारत ने पहले ही संकट के प्रभाव को कम करने के लिए 497 करोड़ रुपये की रिलीफ ( रिजिलीअंस ऐंड लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन) योजना की घोषणा की है, जो निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स व्यवधानों से राहत देने के लिए है, और पेट्रोल-डीज़ल पर उत्पाद शुल्क घटाकर मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने का प्रयास किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह भी संकेत दिया है कि सरकार उद्योग के लिए ‘कोविड-युग शैली’ के नीतिगत पैकेज पर विचार कर रही है।
इन सभी उपायों की आवश्यकता है, लेकिन इनकी एक राजकोषीय लागत भी होगी जिनका व्यापक अर्थव्यवस्था पर असर होगा। यदि संकट जारी रहता है तो वृद्धि और मुद्रास्फीति के अनुमानों में महत्त्वपूर्ण संशोधन करने की आवश्यकता पड़ सकती है।