अब यह बात स्पष्ट होती जा रही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ईरान पर एक महीने पहले शुरू किए गए हमले से किसी तरह अपना चेहरा बचाते हुए बच निकलने के लिए जूझ रहे हैं। इस युद्ध के लिए दो लक्ष्य घोषित किए गए थे: सत्ता परिवर्तन और परमाणु क्षमता को नष्ट करना। लेकिन पिछले सप्ताह राष्ट्र के नाम किए गए एक अत्यंत निराश करने वाले संबोधन में शांति और तनाव कम करने का मार्ग पेश करने के बजाय राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ईरान को पाषाण काल में पहुंचाने तक उस पर बमबारी करेगा। एक संप्रभु राष्ट्र को पूरी तरह नष्ट करने तक उस पर बमबारी करने को कोई उद्देश्य नहीं माना जा सकता है।
इससे न तो ईरान किसी तरह आत्मसमर्पण करने के बारे में सोचेगा और न ही यह पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की गारंटी देगा। ईरान पर बहुत घातक हमले किए गए लेकिन इसके बावजूद उसके पास अब भी मिसाइल क्षमता बची हुई है और इस बात ने उसके विरोधियों तक को चकित किया है। इजरायल को यह सबक मिला है कि लगातार दो साल तक गाजा और लेबनान पर की गई तेज बमबारी के बावजूद वह सुरक्षित नहीं रह सका है।
ईरान-प्रायोजित हमास अब भी गाजा के खंडहरों के आधे हिस्से पर नियंत्रण रखता है, जिससे अमेरिकी-नेतृत्व वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की महत्त्वाकांक्षी रियल एस्टेट योजना खतरे में पड़ जाती है, और हिजबुल्ला ने उत्तरी इजरायल पर रॉकेट और ड्रोन से हमले जारी रखे हैं। लाल सागर के किनारे ईरान-प्रायोजित हूतियों की देर से हुई लामबंदी ने ईरान की विषम युद्ध क्षमताओं को भी रेखांकित किया है।
यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक दबाव डाल रहा है और इसे समाप्त कर पाने में अक्षमता के बावजूद किसी तरह के आत्मावलोकन की प्रक्रिया शुरू होती नहीं नजर आती। इसके बजाय अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश का इस्तेमाल विशुद्ध तेल एवं गैस निर्यातक के रूप में कर रहे हैं जो पश्चिम एशिया की आपूर्ति पर निर्भर नहीं है। उनका यह भी कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट अमेरिका का सिरदर्द नहीं है। यह बात सही है कि इन रास्तों से अमेरिका का आयात नगण्य है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति का वक्तव्य असाधारण रूप से जवाबदेही से भागने का रहा है।
अगर अमेरिका और इजरायल ने क्रमश: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और राइजिंग लायन नहीं लॉन्च किया होता तो ईरान ने खाड़ी में अमेरिका के सहयोगी देशों के तेल और गैस ढांचों में से कुछ को निशाना नहीं बनाया होता। न ही उसने होर्मुज स्ट्रेट को बंद किया होता। गौरतलब है कि विश्व स्तर पर कच्चे तेल और गैस परिवहन का पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
उल्लेखनीय यह है कि अमेरिका के सहयोगी देश, विशेषकर यूरोप में, और प्रतिद्वंद्वी चीन तेजी से वैश्विक सुरक्षा ढांचे को नया रूप देने की कोशिश कर रहे हैं ताकि एक अप्रत्याशित महाशक्ति पर निर्भरता कम की जा सके। ट्रंप के नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) से बाहर निकलने की बात पहले ही वैकल्पिक गठबंधनों को प्रोत्साहित कर रही है। वह नाखुश हैं क्योंकि प्रमुख यूरोपीय देशों ने अमेरिकी सैन्य विमानों को उड़ान अधिकार देने से इनकार कर दिया।
अटलांटिक पार संबंधों में बदलाव पिछले वर्ष शुरू हो गया था, जब यूरोप ने यूक्रेन को अपनी सहायता में उल्लेखनीय वृद्धि की, जबकि ट्रंप प्रशासन ने उसकी बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता कम कर दी। पिछले सप्ताह की घटनाओं ने उन प्रवृत्तियों को और मजबूत किया है।
ब्रिटेन की पहल, जिसमें विभिन्न देशों के विदेश मंत्रियों को एकत्रित करके होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के तरीकों पर चर्चा की गई, इसका एक उदाहरण है। इसके साथ ही 1974 से पश्चिम एशिया में तेल व्यापार को सहारा देने वाली पेट्रो-डॉलर प्रणाली को चुनौती दी जा रही है, क्योंकि ईरानी शासन अपने सहयोगी समझे जाने वाले देशों को चीनी युआन में तेल खरीदने की अनुमति देकर एक छोटा लेकिन बढ़ता हुआ पेट्रो-युआन व्यापार चला रहा है। ये बदलाव और वैश्विक व्यवस्था में पुनर्संयोजन समय ले सकते हैं।
लेकिन एक बात निश्चित है। भले ही ट्रंप युद्ध को ‘दो या तीन सप्ताह’ में समाप्त करने में सफल हो जाएं, बिना स्ट्रेट को फिर से खोले अमेरिका की वैश्विक स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है।