रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने बुधवार को नीतिगत रीपो दर को अपरिवर्तित रखने का सही निर्णय लिया। नए वित्त वर्ष में यह समिति की पहली बैठक थी। अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम के बाद पश्चिम एशिया संकट की गहनता भले ही कम हुई है लेकिन अनिश्चितता बरकरार है और ऐसे में मौद्रिक नीति समिति द्वारा नीति को समायोजित करने के पहले कुछ और स्पष्टता की प्रतीक्षा करना सही निर्णय है।
यह बात भी ध्यान देने लायक है कि जहां जिंस कीमतों में उछाल खासकर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेजी के कारण आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ सकती है, वहीं जंग की शुरुआत के पहले खुदरा मुद्रास्फीति की दर अपेक्षाकृत कम थी और उल्लेखनीय नीतिगत राहत प्रदान कर रही थी। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर जनवरी और फरवरी में क्रमश: 2.7 और 3.2 फीसदी रही।
यह देखना अहम होगा कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच दो सप्ताह का युद्धविराम कायम रहता है या नहीं, और क्या यह संकट का स्थायी समाधान खोजने के लिए पर्याप्त होगा। यदि दोनों पक्ष समाधान खोजने में विफल रहते हैं और युद्ध फिर से शुरू होता है, तो दोबारा संवाद आरंभ होने में बहुत वक्त लगेगा। होर्मुज स्ट्रेट में किस हद तक और किन शर्तों पर आवाजाही बहाल होती है यह भी देखना होगा।
माना जा रहा है कि युद्ध के दौरान क्षतिग्रस्त तेल और गैस सुविधाओं को फिर से काम करना शुरू करने में कुछ समय लगेगा। फिर भी, युद्धविराम ने तेल की कीमतों को कम करने और शेयर व बॉन्ड की कीमतों को बढ़ाने में मदद की है। इससे मुद्रा बाजार में आवश्यक स्थिरता लाने में भी मदद मिलेगी। आने वाले दिनों में वित्तीय बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि कूटनीतिक प्रयास किस तरह आगे बढ़ते हैं।
इस अनिश्चित माहौल में अर्थव्यवस्था के आकलन की बात करें तो रिजर्व बैंक ने 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर को अनुमानत: 6.9 फीसदी रखा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के दूसरे अग्रिम अनुमान ने 2025-26 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.6 फीसदी बताई थी। इस प्रकार वर्तमान में वृद्धि के अपेक्षाकृत धीमा रहने की उम्मीद है।
आंशिक रूप से देखें तो ऐसा बाहरी अनिश्चितताओं के काराण होगा। निजी क्षेत्र के एक पूर्वानुमानकर्ता के मुताबिक इस वर्ष मॉनसून सामान्य से कम रह सकता है। इससे वृद्धि और मुद्रास्फीति के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। मुद्रास्फीति के मोर्चे पर, रिजर्व बैंक को उम्मीद है कि 2026-27 में दर औसतन 4.6 फीसदी रहेगी, जिसमें तीसरी तिमाही के दौरान सबसे अधिक दर 5.2 फीसदी होगी।
ये पूर्वानुमान पश्चिम एशिया के घटनाक्रम के आधार पर काफी बदल सकते हैं। जैसा कि मौद्रिक नीति रिपोर्ट में दिखाया गया है, रिजर्व बैंक का कच्चे तेल की कीमतों के लिए आधारभूत अनुमान वित्तीय वर्ष के लिए औसतन 85 डॉलर प्रति बैरल है। अगर जंग दोबारा शुरू हुई तो यह बहुत अधिक बढ़ सकता है।
यदि ये पूर्वानुमान सही साबित होते हैं, तो नीतिगत ब्याज दर पूरे वर्ष वर्तमान स्तर पर बनी रहेगी। दिलचस्प बात यह है कि रिजर्व बैंक ने अब मुख्य मुद्रास्फीति दर का भी अनुमान देना शुरू किया है, जो वर्ष के दौरान औसतन 4.4 फीसदी रहने की उम्मीद है। इस अतिरिक्त जानकारी का समावेश स्वागत योग्य है। इससे सूचना असमानता कम करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, यद्यपि केंद्रीय बैंक का लक्ष्य हेडलाइन यानी समग्र मुद्रास्फीति दर है किंतु संचार में कोर दर का उपयोग अपेक्षाओं को प्रबंधित करने में उपयोगी हो सकता है, विशेषकर आपूर्ति-जनित झटकों के दौरान जो समग्र दर को अधिक अस्थिर बना देते हैं। मौद्रिक नीति समिति के निर्णय के साथ, रिजर्व बैंक ने कारोबारी सुगमता में सुधार के लिए भी कदमों की घोषणा की, और उनमें से एक यहां उल्लेखनीय है।
हाल ही में उसने 9,000 से अधिक नियामक निर्देशों को समेकित कर उन्हें 238 मास्टर निर्देशों में बदल दिया है। इसी तरह का अभ्यास पर्यवेक्षी निर्देशों के लिए भी किया जा रहा है। इन्हें मिलाकर देखा जाए तो यह विनियमित संस्थाओं के बीच स्पष्टता बढ़ाने और टकराव कम करने में मदद करेगा।