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Editorial: अमेरिका-ईरान वार्ता के विफल होने से बढ़ी दुनिया की टेंशन

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विश्वास की कमी और सख्त शर्तों ने अमेरिका-ईरान वार्ता को बेनतीजा छोड़ दिया है। होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी और परमाणु विवाद से वैश्विक बाजारों पर जोखिम बरकरार है

Last Updated- April 12, 2026 | 10:23 PM IST
JD Vance
बातचीत बेनतीजा रहने के बाद वापस अमेरिका लौटते उपराष्ट्रपति जेडी वेंस | फोटो: AP/PTI

ईरान में सन 1979 की क्रांति के बाद उसके और अमेरिका के बीच हो रही पहली सीधी वार्ता की विफलता ने इस बात को रेखांकित किया है कि दोनों के रिश्तों में विश्वास की कितनी कमी है और उनमें कितना अधिक सांस्कृतिक भेद है। एक दिन से भी कम की बातचीत के बाद इस्लामाबाद से वापस जाते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने संवाददाताओं से कहा कि ईरान ने अमेरिकी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया है।

इन शर्तों में परमाणु हथियार नहीं बनाने की शर्त भी शामिल थी। ईरान के विदेश मंत्रालय ने अपनी ओर से इस बात पर आश्चर्य जताया कि केवल एक सत्र के बाद ही समझौते की उम्मीद की जा रही थी जबकि वहां के सरकार नियंत्रित प्रेस ने ‘अतिरंजित अमेरिकी मांगों’ को जिम्मेदार ठहराया। इस परस्पर हठी रवैये के चलते युद्ध विराम के कारण वित्तीय बाजारों में आ रही सुधार प्रक्रिया का अचानक अंत हो सकता है। होर्मुज स्ट्रेट में अवरुद्ध नौवहन का मुख्य संकट जारी है। किसी भी देश ने यह संकेत नहीं दिया है कि युद्ध विराम की अवधि समाप्त होने के बाद क्या होगा। 

आपसी संपर्क कायम रखने के अमेरिका और ईरान के संकेतों में सकारात्मकता देखी जा सकती है। अमेरिका से आ रही रिपोर्ट बताती हैं कि जरूरी नहीं कि वेंस द्वारा समझौता कर पाने में नाकामी को बातचीत के अंत के रूप में ही देखा जाए। ईरान के विदेश मंत्रालय ने एक्स पर पोस्ट किया है कि मतभेदों के बावजूद बातचीत जारी रहेगी। हालांकि संवाद के दोबारा शुरू करने की कोई तय समयावधि नहीं दी गई। दोनों पक्षों के बीच आपसी संपर्क जरूरी है लेकिन परमाणु मुद्दे को लंबी अवधि के लिए एक अलग ढंग के संवाद में ले जाना समझदारी होगी।

रचनात्मक संवाद के लिए अधिक अनुकूल वातावरण बनाना एक अच्छा आरंभिक कदम हो सकता है। इसमें अमेरिका द्वारा इजरायल पर दबाव डालना शामिल होगा कि वह लेबनान पर बमबारी करना बंद करे। लेबनान में हुई बमबारी से ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह के हमलों की तुलना में कहीं अधिक निर्दोष लोगों की मौतें हुई हैं।

ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट में नाकेबंदी हटाना, जिसमें आवागमन का शुल्क लेना भी शामिल है, यह संकेत होगा कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून के नियमों का पालन करना चाहता है। समुद्र के कानूनों पर संयुक्त राष्ट्र समझौता अंतरराष्ट्रीय जल में निर्बाध नौवहन की स्वतंत्रता की बात करता है। ईरान ने 1982 में उक्त समझौते पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन इसे अनुमोदित नहीं किया।

जहाजों के मुक्त आवागमन की अनुमति पारंपरिक कानून द्वारा भी शासित है, जिससे ईरान भी बंधा हुआ है। चूंकि ईरान ने अमेरिका के साथ अपने व्यवहार में संयुक्त राष्ट्र मानदंडों का पालन करने की इच्छा जताई है, वह स्ट्रेट खोलने और कुछ जहाजों पर लगाए जा रहे पारगमन शुल्क को समाप्त करने पर विचार कर सकता है। हालांकि सहमति की संभावना कम है, क्योंकि स्ट्रेट पर उसका नियंत्रण अमेरिका के अवैध ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के विरुद्ध उसके पास मौजूद एक शक्तिशाली तुरुप का पत्ता है।

एशियाई सहयोगियों से बातचीत की ईरान की इच्छा भी आशा की एक किरण प्रदान करती है। भारत का ईरान के प्रति कूटनीतिक प्रयास, जिसमें अत्यंत आवश्यक चिकित्सीय आपूर्ति और खाद्य सामग्री भेजना शामिल है, कुछ लाभदायक साबित हुआ है। भारतीय नौसेना की सुरक्षा में भारतीय एलपीजी और कच्चे तेल के टैंकरों को परिचालन समझौते के तहत जलमार्ग से सुरक्षित मार्ग दिया गया है। इससे भारत एक एशियाई गठबंधन में हिस्सा लेने की मजबूत स्थिति में है, ताकि युद्धविराम के शेष दिनों में इस महत्त्वपूर्ण जलमार्ग को फिर से खोलने पर बातचीत की जा सके।

दुर्भाग्यवश, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ऐसी टिप्पणियां की हैं कि ईरान की ‘और अधिक नाकेबंदी’ करने की योजना है। उन्होंने यह दावा भी किया है कि किसी समझौते का परिणाम मायने नहीं रखता क्योंकि अमेरिका ‘जीत’ चुका है। ऐसे में ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ की ओर से अपने देश के कठोर रुख को नरम करने के लिए प्रोत्साहित करने की संभावना नहीं है। लब्बोलुआब यह है कि इस संघर्ष के अंत को लेकर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है।

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First Published - April 12, 2026 | 10:23 PM IST

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