नैसडैक में सूचीबद्ध आईटी सेवा कंपनी कॉग्निजेंट अपने ‘प्रोजेक्ट लीप’ कार्यक्रम के तहत 7,000 से 15,000 कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है। यह अनुमान नौकरी छोड़ने पर मिलने वाली रकम (सेवरेंस रकम) मद में कंपनी के आवंटन पर आधारित है। इस कदम का मकसद कॉग्निजेंट के परिचालन मॉडल को एआई के लिए अधिक तैयार करना है क्योंकि यह आईटी सेवा कंपनी एक अस्थिर वृहद आर्थिक माहौल और ग्राहकों की कमजोर मांग से जूझ रही है।
सूत्रों ने बताया कि अंतिम आंकड़ा कंपनी द्वारा अपनाई जाने वाली सेवरेंस पॉलिसी- तीन महीने का पैकेज या छह महीने का पैकेज- और प्रभावित इलाकों पर निर्भर करेगा। कॉग्निजेंट के कर्मचारियों की कुल संख्या 31 मार्च, 2026 तक 3,57,600 कर्मचारी थी। कंपनी के अधिकतर कर्मचारी भारत में हैं। ऐसे में छंटनी का प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है। कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 31 दिसंबर तक भारत में 2,56,900, उत्तरी अमेरिका में 41,600, महाद्वीपीय यूरोप में 14,600 और ब्रिटेन में 7,800 कर्मचारी थी।
कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) जतिन दलाल ने वित्तीय नतीजे जारी करने के बाद विश्लेषकों से बातचीत में कहा, ‘प्रोजेक्ट लीप का लक्ष्य कॉस्ट ऑफ डिलिवरी मॉडल के जरिये लागत में काफी हद तक बचत करना है। जब हम इसे लागू करेंगे तो साल के शेष समय में इससे हमारे सकल मार्जिन को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।’
कंपनी के शेयर में भी गिरावट आई है। साल की शुरुआत से अब तक शेयर मूल्य करीब एक तिहाई घट चुका है। इससे सीईओ पर तत्काल रिटर्न देने का दबाव बढ़ गया है। दलाल ने कहा कि साल की शुरुआत से मांग में नरमी आई है और बाजार की स्थितियां काफी अनिश्चित हो गई हैं। कंपनी का मानना है कि निकट भविष्य में भी वृहद आर्थिक अनिश्चितता बरकरार रह सकती है। छंटनी के बारे में पूछे जाने पर कॉग्निजेंट ने कोई जवाब नहीं दिया।
यह इन्फोसिस के मुख्य कार्याधिकारी सलिल पारेख के उस बयान के बिल्कुल विपरीत है जिसमें उन्होंने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा था कि इस बार कंपनी को वृहद आर्थिक स्थितियों के बारे में पिछले साल के मुकाबले बेहतर स्पष्टता है।
हालांकि सभी इस बात से सहमत हैं कि कई आईटी सेवा कंपनियां ऐसे मुकाम पर पहुंच गई हैं जहां पारंपरिक सेवाओं की कमजोर मांग, कम मार्जिन के साथ सौदों का नवीनीकरण, एआई का बढ़ता उपयोग और जीसीसी द्वारा इनसोर्सिंग के प्रभाव ने उन्हें लागत कम करने और मार्जिन में सुधार के लिए कर्मचारियों की संख्या घटाने के लिए मजबूर कर दिया है। टीसीएस ने पिछले साल ऐसा ही तरीका अपनाया था।