Google Hindware Dispute: अगर आप गूगल पर किसी कंपनी का नाम सर्च करते हैं, तो अक्सर उस कंपनी की वेबसाइट के साथ-साथ उसके प्रतिद्वंद्वियों के विज्ञापन भी दिखाई देते हैं। डिजिटल विज्ञापन की दुनिया में यह आम बात है। कंपनियां अपने ब्रांड के नाम पर भी विज्ञापन खरीदती हैं और प्रतिस्पर्धी कंपनियों के नाम पर भी बोली लगाती हैं ताकि ग्राहक उनकी ओर आकर्षित हों। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट के हालिया हिंदवेयर-गूगल मामले के फैसले से यह व्यवस्था बदल सकती है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि गूगल ने “HINDWARE” ट्रेडमार्क को विज्ञापन कीवर्ड के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देकर हिंदवेयर के अधिकारों का उल्लंघन किया। अदालत ने गूगल को 30 लाख रुपये का हर्जाना देने का आदेश भी दिया है। इस फैसले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर कोई ग्राहक किसी खास ब्रांड का नाम सर्च करता है, तो उस ग्राहक तक पहुंचने का अधिकार किसका होना चाहिए- उस ब्रांड का जिसे ग्राहक खोज रहा है या उस कंपनी का जो सबसे ज्यादा विज्ञापन शुल्क देने को तैयार है।
कई उद्यमी और ब्रांड मालिक इस फैसले को सही मान रहे हैं। ज़ेरोधा के संस्थापक नितिन कामथ ने कहा कि जब कोई व्यक्ति “Zerodha” सर्च करता है, तब भी कई बार प्रतिस्पर्धी कंपनियों के विज्ञापन पहले दिखाई देते हैं। उनके मुताबिक, कंपनियों को अपने ही ब्रांड नाम पर विज्ञापन खरीदने पड़ते हैं ताकि प्रतिद्वंद्वी उनके ग्राहकों को न खींच सकें। उनका मानना है कि यह फैसला खासकर उन स्टार्टअप्स के लिए फायदेमंद होगा जो अपने ब्रांड को बनाने में काफी पैसा खर्च करते हैं।
डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ब्रांड के नाम से होने वाली सर्च उस कंपनी की वर्षों की मेहनत, भरोसे और पहचान का नतीजा होती है। अब तक कई स्टार्टअप और नई कंपनियां बड़े ब्रांडों के नाम पर विज्ञापन चलाकर ग्राहक हासिल करती रही हैं। लेकिन अगर ऐसे विज्ञापनों पर कानूनी जोखिम बढ़ता है, तो कंपनियों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। वे सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन, कंटेंट मार्केटिंग, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग और ब्रांड निर्माण पर अधिक खर्च कर सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले का सबसे ज्यादा फायदा उन स्थापित कंपनियों को होगा जिनकी ब्रांड पहचान मजबूत है और जिन्हें लोग सीधे नाम से सर्च करते हैं। इसमें बैंक, बीमा कंपनियां, ब्रोकिंग फर्म, बड़े उपभोक्ता ब्रांड और सॉफ्टवेयर कंपनियां शामिल हैं। दूसरी ओर, नई और छोटी कंपनियों को नुकसान हो सकता है क्योंकि वे अक्सर प्रतिस्पर्धियों के ब्रांड नामों का इस्तेमाल करके नए ग्राहक हासिल करती हैं। इससे उनकी ग्राहक प्राप्ति लागत बढ़ सकती है।
अब तक कीवर्ड विज्ञापन से जुड़े फैसले मुख्य रूप से मार्केटिंग टीम और विज्ञापन एजेंसियां लेती थीं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद कंपनियों को कानूनी, मार्केटिंग, अनुपालन और ब्रांड टीमों के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा। उन्हें अपने ट्रेडमार्क की निगरानी करनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी विज्ञापन रणनीति कानूनी दायरे में रहे।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने माना कि ट्रेडमार्क का इस्तेमाल केवल तब नहीं होता जब ग्राहक उसे देखे, बल्कि तब भी हो सकता है जब उसका नाम पर्दे के पीछे विज्ञापन कीवर्ड के रूप में इस्तेमाल किया जाए। अगर कोई व्यक्ति “Hindware” सर्च करता है और किसी दूसरी कंपनी का विज्ञापन सामने आता है, तो वह कंपनी हिंदवेयर की पहचान और प्रतिष्ठा का फायदा उठा रही है। यह तर्क भविष्य के कई मामलों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले को प्रतिस्पर्धी कीवर्ड विज्ञापन पर पूरी तरह रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि पहले भी ऐसे मामले अदालतों में आ चुके हैं और गूगल के पास इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने का विकल्प है। इसलिए आने वाले समय में कानूनी स्थिति फिर बदल सकती है।
फैसले की आलोचना करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोक्ता जब किसी ब्रांड को सर्च करते हैं तो वे केवल उसी ब्रांड में नहीं, बल्कि उसके विकल्पों और तुलना में भी रुचि रखते हैं। अगर प्रतिस्पर्धी विज्ञापनों पर सख्त रोक लगती है, तो उपभोक्ताओं के सामने कम विकल्प दिखाई दे सकते हैं। साथ ही छोटी और नई कंपनियों के लिए ग्राहकों तक पहुंचना और मुश्किल हो सकता है।
गूगल का कहना है कि उसकी विज्ञापन नीति पहले से ही ट्रेडमार्क की सुरक्षा करती है। कंपनी के अनुसार विज्ञापन के दिखाई देने वाले हिस्से में किसी दूसरे के ट्रेडमार्क का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। गूगल ने कहा है कि वह स्थानीय कानूनों का सम्मान करता है और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखता है।