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Economic Survey में बड़ा प्रस्ताव: सरकारी कंपनी की परिभाषा बदलकर विनिवेश की राह होगी आसान

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आर्थिक समीक्षा में सरकारी कंपनी की परिभाषा संशोधित करते हुए सूचीबद्ध संस्थाओं में न्यूनतम सरकारी हिस्सेदारी 26 प्रतिशत करने का सुझाव दिया गया है

Last Updated- January 29, 2026 | 10:40 PM IST
Government Company
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

आर्थिक समीक्षा में सुझाव दिया गया है कि सरकार कंपनी अधिनियम के तहत सरकारी कंपनी की परिभाषा में संशोधन करने पर विचार कर सकती है, जो सूचीबद्ध संस्थाओं तक सीमित रहे ताकि ऐसी कंपनियों को न्यूनतम 26 फीसदी सरकारी स्वामित्व के साथ सरकारी कंपनी का दर्जा बनाए रखने की अनुमति मिल सके। साथ ही विनिवेश के माध्यम से ज्यादा इक्विटी बेचकर राजस्व जुटाना सक्षम हो सके।

समीक्षा में कहा गया है, भविष्य में बाजार की स्थितियों और खास उद्यम से जुड़े कारकों के आधार पर न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता मानदंडों से परे कुछ केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों (सीपीएसई) में सरकारी इक्विटी कम करके इक्विटी बेचकर प्राप्तियों को मजबूत बनाया जा सकता है।

आर्थिक मामलों के विभाग में सलाहकार रोज मैरी के. अब्राहम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, समीक्षा में सरकार की हिस्सेदारी को भुनाने की संभावना तलाशने का विकल्प दिया गया है। इसका मतलब कंपनी की पूरी तरह से बिक्री नहीं है। ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया है। हमने सूचीबद्ध कंपनियों के मामले में और सूचीबद्ध कंपनियों के लिए ही यह उल्लेख किया है कि हमें वास्तव में 26 फीसदी हिस्सेदारी की आवश्यकता है, जो विशेष प्रस्ताव के तहत हिस्सेदारी है। 

समीक्षा में यह भी बताया गया है कि किसी कंपनी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए केवल 26 प्रतिशत हिस्सेदारी ही पर्याप्त होती है क्योंकि इससे शेयरधारकों को विशेष प्रस्ताव पारित करने का अधिकार मिलता है। हालांकि, कंपनी अधिनियम के मौजूदा प्रावधानों के तहत कोई कंपनी सरकारी कंपनी तभी कहलाती है जब उसकी कम से कम 51 फीसदी इक्विटी केंद्र या राज्य सरकारों के पास हो, जिससे हिस्सेदारी में और कमी करना मुश्किल हो जाता है। 

समीक्षा में कहा गया है, वर्तमान में सूचीबद्ध सीपीएसई में से लगभग 30 फीसदी में सरकारी शेयरधारिता पहले से ही 60 फीसदी से कम है। इस कारण ओएफएस के माध्यम से आगे विनिवेश सीमित हो जाता है क्योंकि कंपनी अधिनियम में यह निर्धारित है कि एक सरकारी कंपनी में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी केंद्र या राज्य सरकार के पास होनी चाहिए।

वैकल्पिक दृष्टिकोण के रूप में समीक्षा में कहा गया है कि अगर मकसद अंततः निजीकरण है तो सरकार 51 फीसदी की सीमा से नीचे चरणबद्ध ओएफएस (बिक्री प्रस्ताव) जारी रख सकती है और यहां तक कि सरकारी कंपनी की कानूनी परिभाषा को बदले बिना पूरी तरह बाहर निकलने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। इसमें कहा गया है कि इससे सीपीएसई को विनिवेश के बाद विकेंद्रीकृत स्वामित्व, स्पष्ट संचालन मानकों और पारदर्शी उत्तराधिकार ढांचे के साथ पेशेवर रूप से प्रबंधित इकाई के रूप में काम करने की अनुमति मिलेगी।

पूर्व वित्तीय सेवा सचिव दिनेश कुमार मित्तल ने कहा, सरकार आगे बढ़ना चाहती है और कुछ स्थिर क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति को तर्कसंगत बनाना चाहती है। उसे इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए ताकि ये क्षेत्र अर्थव्यवस्था में ज्यादा प्रभावी योगदान दे सकें। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है और रातोरात नहीं हो सकती। 

मित्तल ने कहा कि एक सरकारी कंपनी या संस्था के साथ आमतौर पर कुछ शर्तें जुड़ी होती हैं। मसलन – नियुक्तियां सरकार द्वारा की जाती हैं, यह सीएजी के दायरे में आती है, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम लागू होता है और मुआवजे का तौर-तरीका भी सरकार की तरफ से तय किया जाता है।

उन्होंने कहा, अगर सरकार की हिस्सेदारी कम होने के बाद भी ये सभी प्रतिबंध जारी रहते हैं तो सवाल उठता है कि क्या ऐसी कंपनियां वाकई बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगी। 

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First Published - January 29, 2026 | 10:40 PM IST

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