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30% तक बिजली बिल बचाने के लिए कंपनियां छोड़ रहीं पारंपरिक बिजली, अपनाया नया रास्ता

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बिजली की लागत घटाने और 24 घंटे भरोसेमंद सप्लाई पाने के लिए देश की बड़ी कंपनियां तेजी से हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही हैं

Last Updated- June 11, 2026 | 8:58 AM IST
electricity

देश की बड़ी फैक्ट्रियां, कॉरपोरेट दफ्तर, आईटी कंपनियां और डेटा सेंटर अब बिजली खरीदने का तरीका तेजी से बदल रहे हैं। महंगी ग्रिड बिजली पर निर्भर रहने के बजाय ये कंपनियां सीधे सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं से बिजली खरीद रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह लागत में बचत है। इससे बिजली का खर्च 30-45 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

ब्रोकरेज फर्म एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2025 तक देश में कमर्शियल और औद्योगिक (सीएंडआई) उपभोक्ताओं की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़कर करीब 45 गीगावॉट हो गई है, जो सात साल पहले के मुकाबले तीन गुना से ज्यादा है। यह क्षमता वित्त वर्ष 2030 तक बढ़कर 121-134 गीगावॉट तक पहुंच सकती है।

देश की आधी बिजली खपत करते हैं उद्योग और कारोबारी उपभोक्ता

रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल बिजली मांग में उद्योग और कमर्शियल उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत है। वित्त वर्ष 2025 में देश की कुल बिजली खपत लगभग 1,695 अरब यूनिट रही, जिसमें से करीब आधी मांग इन्हीं उपभोक्ताओं से आई। हालांकि इतनी बड़ी बिजली खपत के बावजूद इन उपभोक्ताओं की कुल जरूरत का केवल छोटा हिस्सा ही अभी नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा हो रहा है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में वृद्धि की बड़ी संभावना बनी हुई है।

सस्ती बिजली सबसे बड़ी वजह

रिपोर्ट का कहना है कि हरित ऊर्जा अपनाने के पीछे पर्यावरण से ज्यादा आर्थिक कारण काम कर रहे हैं। उद्योगों को ग्रिड से मिलने वाली बिजली की कीमत आम तौर पर 6.6 रुपये से 8.7 रुपये प्रति यूनिट पड़ती है। इसके मुकाबले समूह कैप्टिव सौर परियोजनाओं से बिजली 4 रुपये से 5.9 रुपये प्रति यूनिट के बीच मिल सकती है। यानी कंपनियां 20 से 60 प्रतिशत तक बचत कर सकती हैं। इसी वजह से बड़ी कंपनियां ओपन एक्सेस और कैप्टिव मॉडल के जरिए सीधे बिजली खरीदने में दिलचस्पी दिखा रही हैं।

ओपन एक्सेस बना सबसे बड़ा माध्यम

पिछले कुछ वर्षों में ओपन एक्सेस मॉडल तेजी से लोकप्रिय हुआ है। इसके तहत कंपनियां बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के बजाय सीधे बिजली उत्पादकों से ऊर्जा खरीद सकती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में सौर और पवन ऊर्जा की नई क्षमता में ओपन एक्सेस की हिस्सेदारी केवल 5 प्रतिशत थी, जो 2024 तक बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई। ब्रोकरेज का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2030 तक हर साल 15-20 गीगावॉट नई सीएंडआई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जुड़ सकती है।

डेटा सेंटर बनेंगे बिजली मांग के नए बड़े ग्राहक

रिपोर्ट में डेटा सेंटर क्षेत्र को सबसे बड़ा नया अवसर बताया गया है। भारत में डेटा सेंटर की आईटी क्षमता मौजूदा लगभग 1.5 गीगावॉट से बढ़कर 2030 तक करीब 7 गीगावॉट होने का अनुमान है। इस क्षेत्र में हाइपरस्केल कंपनियां करीब 47 अरब डॉलर के निवेश की योजना बना चुकी हैं। डेटा सेंटर के लिए बिजली सबसे बड़ा खर्च होता है और कुल परिचालन लागत का 30-40 प्रतिशत हिस्सा बिजली पर खर्च होता है। इसके अलावा डेटा सेंटर को 24 घंटे बिना रुकावट बिजली की जरूरत होती है। इसी वजह से डेटा सेंटर कंपनियां नवीकरणीय ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और ओपन एक्सेस मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रही हैं।

आंध्र प्रदेश में दिखा नया मॉडल

रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में बनने वाले बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट का भी जिक्र किया गया है। करीब 1 गीगावॉट क्षमता वाले इस कैंपस को निजी समानांतर वितरण लाइसेंस दिया गया है। इससे परियोजना सीधे बिजली खरीद सकेगी और पारंपरिक वितरण व्यवस्था पर उसकी निर्भरता कम होगी। ब्रोकरेज का मानना है कि भविष्य में ऐसे मॉडल दूसरे राज्यों में भी देखने को मिल सकते हैं।

राज्यों ने नियम आसान किए, लेकिन चुनौतियां भी बढ़ीं

केंद्र सरकार ने 2022 में ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस नियम लागू किए थे। इससे 100 किलोवॉट तक के उपभोक्ताओं को भी हरित ऊर्जा खरीदने का अधिकार मिला। हालांकि कुछ राज्यों ने हाल के वर्षों में बैंकिंग और ऊर्जा समायोजन से जुड़े नियम सख्त किए हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने कुछ नई शर्तें लागू की हैं, जिससे परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद रिपोर्ट का मानना है कि हाइब्रिड परियोजनाएं और बैटरी स्टोरेज जैसी तकनीकें इन चुनौतियों का असर कम कर सकती हैं।

डिस्कॉम पर क्या पड़ेगा असर?

जैसे-जैसे बड़े औद्योगिक ग्राहक सीधे बिजली खरीदेंगे, डिस्कॉम के लिए चुनौती बढ़ सकती है। हालांकि रिपोर्ट का कहना है कि डिस्कॉम पूरी तरह नुकसान में नहीं रहेंगे क्योंकि उन्हें ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क के इस्तेमाल का शुल्क मिलता रहेगा। लेकिन उनके सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले ग्राहक धीरे-धीरे सिस्टम से बाहर जा सकते हैं। इससे क्रॉस-सब्सिडी मॉडल पर दबाव बढ़ सकता है, जिसमें उद्योगों से ज्यादा शुल्क लेकर घरेलू उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली दी जाती है।

आगे क्या है तस्वीर?

एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग का मानना है कि भारत में औद्योगिक और कमर्शियल क्षेत्र की हरित ऊर्जा क्षमता में अगले पांच वर्षों तक तेज वृद्धि जारी रहेगी। मजबूत मांग, बिजली लागत में बचत, डेटा सेंटर निवेश और सरकार की नीतियां इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगी। रिपोर्ट के अनुसार आने वाले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में सबसे ज्यादा अवसर ओपन एक्सेस, समूह कैप्टिव परियोजनाओं, हाइब्रिड ऊर्जा संयंत्रों और बैटरी स्टोरेज से जुड़े कारोबारों में दिखाई दे सकते हैं।

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First Published - June 11, 2026 | 8:58 AM IST

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