कपास के घरेलू मूल्यों में तेजी से उछाल आने के कारण मिल मालिक, परिधान उद्योग और सरकार इस जिंस के आयात शुल्क में कटौती करने को लेकर बातचीत कर रहे हैं। हालांकि कारोबारियों के एक वर्ग ने चेतावनी दी है कि किसानों के लिए खरीफ की बोआई से ठीक पहले ऐसा करना नुकसानदायक हो सकता है।
यह कपास की फसल को रोके हुए किसानों के लिए भी हानिकारक हो सकता है। अनुमान है कि किसानों ने बेहतर मूल्य की आस में करीब 40 लाख गांठें (एक गांठ = 170 किलो) रोक रखी हैं। लंबे अरसे से कारोबार करने वाले व्यापारी ने कहा, ‘भारत ने पिछली बार जब कपास पर आयात शुल्क कम किया था तो किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे अपना उत्पाद बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा था। दरअसल, सिर्फ तीन महीनों में भारी मात्रा में (लगभग 30 लाख गांठ कपास) आयात किया गया था। ऐसी ही स्थिति फिर से उत्पन्न हो सकती है।’
हालांकि, सरकार ने मंगलवार को कहा कि वह शुल्क को कम करने या समाप्त करने पर विचार कर रही है और संबंधित मंत्रालय इस पर निर्णय लेंगे। कपड़ा मंत्रालय के व्यापार सलाहकार बिपिन मेनन ने पश्चिम एशिया में विकास पर अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग में कहा, ‘हम राजस्व विभाग के साथ इस मामले पर काम कर रहे हैं।’ मेनन ने कहा, ‘इस पर चर्चा चल रही है कि क्या हम इसे गैर-व्यावसायिक मौसम के लिए अस्थायी रूप से कर सकते हैं।’
छूट की अवधि समाप्त होने के बाद 1 जनवरी, 2024 से प्रभावी आयात शुल्क लगभग 11 प्रतिशत है। हालांकि, लंबे रेशे वाले कपास पर आयात शुल्क शून्य बना हुआ है क्योंकि भारत इस प्रकार के कपास का प्रमुख उत्पादक नहीं है
दरअसल, पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार में कपास के दाम बढ़ रहे हैं। इस अप्रैल की शुरुआत के बाद से घरेलू दरें 10-15 प्रतिशत बढ़ गई हैं। यह सितंबर अंत को समाप्त हुए फसल वर्ष 2025-26 में अनुमान से कम उत्पादन के कारण भी हुआ है। उद्योग सूत्रों ने बताया है कि घरेलू कपास उद्योग 2025-26 में उत्पादन 290.9 लाख गांठ के करीब अनुमानित कर रहा है, जो 2024-25 में 297.4 लाख गांठ से थोड़ा कम है।
एक उद्योग अधिकारी ने कहा, “विपणन सत्र के पहले तीन या चार महीनों में, जो अक्टूबर में शुरू होता है, अधिकांश कपास बिक जाती है, लेकिन इस साल हमारा अनुमान है कि किसान और अन्य लोग अभी भी बड़ी मात्रा में माल रोके हुए हैं क्योंकि सत्र की शुरुआत में कीमतें उम्मीद के मुताबिक नहीं थीं।’