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45 डिग्री गर्मी में काम कर रहे डिलीवरी कर्मचारी, भीषण लू ने बढ़ाई क्विक कॉमर्स कंपनियों की चिंता

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लू के बीच घंटों सड़क पर काम करने को मजबूर डिलीवरी कर्मचारी, कमाई और सेहत के बीच फंसे कर्मचारी

Last Updated- May 28, 2026 | 11:24 AM IST
Quick Commerce Heatwave

Heatwave Impact on Quick Commerce Industry: उत्तर भारत में लगातार बढ़ रही भीषण गर्मी अब क्विक कॉमर्स कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। 10 से 30 मिनट में किराना, दवाइयां और खाना पहुंचाने का वादा करने वाली कंपनियों का पूरा मॉडल उन डिलीवरी कर्मचारियों पर टिका है, जो तेज धूप और लू के बीच सड़कों पर काम करते हैं।

दोपहर के समय जब लोग गर्मी से बचने के लिए घरों में रहने लगते हैं, तब भी हजारों डिलीवरी कर्मचारी शहर की सड़कों पर ऑर्डर पहुंचाने में लगे रहते हैं। इस साल कई शहरों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। ऐसे में बाहर बिताया गया हर अतिरिक्त मिनट शरीर पर भारी पड़ रहा है। लेकिन अगर डिलीवरी धीमी हो जाए, तो कमाई घटने, इन्सेंटिव छूटने और ऑर्डर कम मिलने का डर भी बना रहता है।

भारत में हर साल कई बार लू चलती है और मौसम विभाग अलग-अलग राज्यों में सैकड़ों लू वाले दिनों को दर्ज करता है। दूसरी तरफ देश में गिग अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ रही है। वित्त मंत्रालय के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 तक भारत में करीब 1.2 करोड़ गिग और प्लेटफॉर्म आधारित कर्मचारी थे। नीति आयोग का अनुमान है कि 2029-30 तक यह संख्या बढ़कर 2.35 करोड़ तक पहुंच सकती है।

लू और Quick Commerce का दबाव

अब तक क्विक कॉमर्स कंपनियां बारिश और बाढ़ जैसी परिस्थितियों में अपने कामकाज में बदलाव करती रही हैं। कई बार ग्राहकों को देरी की जानकारी दी जाती है और डिलीवरी कर्मचारियों को अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी मिलती है। लेकिन लू को अभी भी कंपनियां उसी तरह की बड़ी बाधा नहीं मान रही हैं। ज्यादातर ऐप पर ‘गर्मी के कारण देरी’ जैसी चेतावनी नहीं दिखाई देती और डिलीवरी समय भी नहीं बढ़ाया जाता। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि तेज डिलीवरी ही इन कंपनियों की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है। ऐसे में कंपनियों पर लगातार जल्दी डिलीवरी बनाए रखने का दबाव रहता है।

नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी यानी एनडीएमए ने जुलाई 2025 की अपनी एडवाइजरी में माना था कि हीटवेव के दौरान गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं। एनडीएमए ने सलाह दी थी कि ऑरेंज और रेड अलर्ट के दौरान सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक आउटडोर काम रोका जाए और वर्कर्स को बिना पेनल्टी काम छोड़ने का विकल्प मिले।

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सीएमएस इंडसलॉ की पार्टनर अमृता टोंक ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि भारत के मौजूदा कानूनों में गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर अभी भी कई कमियां हैं। उनके मुताबिक, मौजूदा कानून सामाजिक सुरक्षा की बात तो करते हैं, लेकिन कार्यस्थल पर सुरक्षा और लू से बचाव को लेकर स्पष्ट नियम नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई कर्मचारी भीषण गर्मी में काम छोड़ता है, तो उसकी कमाई पर असर पड़ सकता है क्योंकि अभी इसके लिए मुआवजे की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

डिलीवरी धीमी हुई तो कमाई पर असर

दिल्ली में फूड डिलीवरी करने वाले 34 साल के मोहम्मद सदफ ने बताया कि दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक का समय सबसे मुश्किल होता है। उनके मुताबिक, तेज गर्मी में कई घंटे बाहर रहने के बाद शरीर जवाब देने लगता है, लेकिन ज्यादा ऑर्डर कैंसिल करने पर पेनल्टी लग जाती है।

उन्होंने बताया कि वे रोज करीब 30 से 35 ऑर्डर डिलीवर करते हैं और इसके लिए 14 से 15 घंटे तक काम करना पड़ता है। पूरे दिन में सिर्फ 30 मिनट का ब्रेक मिलता है। अगर पानी पीने या आराम करने के लिए रुक जाएं, तो डिलीवरी लेट हो जाती है और कमाई कम हो जाती है।

एक अन्य डिलीवरी वर्कर राजेश शर्मा ने कहा कि ग्राहक सिर्फ ऐप पर दिखने वाला डिलीवरी टाइम देखते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं दिखता कि 45 डिग्री गर्मी में हेलमेट पहनकर भारी बैग के साथ बाइक चलाना कितना मुश्किल होता है। कई सोसाइटी में बाइक अंदर ले जाने की अनुमति नहीं होती, इसलिए सामान पैदल लेकर अलग-अलग टावरों तक जाना पड़ता है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि ऐप आधारित एल्गोरिदम भी इस दबाव को बढ़ाते हैं क्योंकि इन्सेंटिव, रेटिंग और ऑर्डर अलॉटमेंट डिलीवरी स्पीड से जुड़े होते हैं।

आईजीपी के फाउंडर और CEO तरुण जोशी ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि हीटवेव के कारण डिलीवरी कर्मचारियों की उत्पादकता और काम के घंटे प्रभावित हो रहे हैं। उनके मुताबिक, अत्यधिक गर्मी अब सिर्फ मौसम की समस्या नहीं बल्कि एक बड़ा सुरक्षा जोखिम बन चुकी है। उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी गंभीर गर्मी के दौरान डिलीवरी समय में बदलाव करती है ताकि कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

Quick Commerce कंपनियां क्या कर रही हैं?

कई बड़ी कंपनियों का कहना है कि उन्होंने बढ़ती गर्मी को देखते हुए कुछ सुरक्षा कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

अमेजन ने कहा कि वह डिलीवरी वर्कर्स के लिए पानी, मेडिकल कैंप, आराम के लिए जगह और एयर कंडीशंड मोबाइल रेस्ट वैन जैसी सुविधाएं बढ़ा रही है। कंपनी ने ‘प्रोजेक्ट आश्रय’ के तहत रेस्ट सेंटर का नेटवर्क भी बढ़ाया है।

जोमैटो और ब्लिंकिट चलाने वाले इटरनल ग्रुप ने बताया कि डिलीवरी पार्टनर्स को इंश्योरेंस और आपातकालीन सहायता दी जा रही है। ब्लिंकिट के डार्क स्टोर्स में कूलिंग सिस्टम और पानी की व्यवस्था बढ़ाई जा रही है, जबकि जोमैटो ने देशभर में 5,000 से ज्यादा रेस्ट पॉइंट बनाए हैं।

स्विगी का कहना है कि वह ग्लूकोज वाला पानी, कूलिंग वेस्ट और बेहतर रेस्ट एरिया उपलब्ध करा रही है। साथ ही दोपहर की तेज गर्मी के दौरान लॉगिन नियमों में भी ढील दी जा रही है ताकि वर्कर्स इन्सेंटिव से वंचित न हों। जेप्टो और फ्लिपकार्ट ने भी पानी, कूलिंग एरिया, मेडिकल सुविधा और हीट सेफ्टी ट्रेनिंग जैसे कदम उठाने की बात कही है।

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क्या ग्राहक स्वीकार करेंगे धीमी डिलीवरी?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ग्राहक भी इस बदलाव को स्वीकार करेंगे। भारत में क्विक कॉमर्स कंपनियों ने लोगों को बहुत कम समय में सामान मिलने की आदत डाल दी है। लेकिन बढ़ती हीटवेव के बीच भविष्य में डिलीवरी टाइम बढ़ाना पड़ सकता है।

हैंडपिक्ड के को-फाउंडर और CBO साहिल मदान ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि अब कई ग्राहक सिर्फ तेज डिलीवरी नहीं बल्कि क्वालिटी और भरोसेमंद सेवा को भी महत्व देने लगे हैं। उनके मुताबिक, अगर कंपनियां पारदर्शिता के साथ ग्राहकों को देरी की जानकारी दें, तो ज्यादातर लोग इसे समझेंगे।

विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले समय में क्विक कॉमर्स कंपनियों को अपने डिलीवरी मॉडल, इन्सेंटिव सिस्टम और काम के घंटों में बदलाव करना पड़ सकता है क्योंकि लगातार बढ़ती गर्मी के बीच ‘अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी’ को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।

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First Published - May 28, 2026 | 11:24 AM IST

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