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मोदी-कुक की वो मुलाकात और बदल गई किस्मत: कैसे 9 साल में भारत बना ऐपल का ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब

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टिम कुक के नेतृत्व में ऐपल ने भारत को अपना प्रमुख विनिर्माण केंद्र बनाया, जिससे देश अब दुनिया के हर चार में से एक आईफोन का उत्पादन कर रहा है

Last Updated- April 21, 2026 | 10:56 PM IST
Apple CEo Tim Cook
टिम कुक | फाइल फोटो

टिम कुक मई 2016 में पहली बार भारत आए थे। अपनी इस यात्रा के दौरान कुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। मोदी के साथ इस बैठक का मकसद भारत जैसे बाजार में ऐपल की पहुंच बढ़ाने के तरीके तलाशना था जहां उसकी उपस्थिति उस समय काफी सीमित थी। मगर ऐपल इंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) टिम कुक को जल्द ही इस बात का एहसास हो गया कि यह सफर आसान नहीं होगा।

उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में अपने शीर्ष अधिकारियों की टीमें भेजी ताकि वे भारत सरकार के सामने देश में फोन असेंबल (तैयार करने) करने के लिए जरूरी प्रस्ताव पेश करें। कुक ने यह कदम इसलिए उठाया था क्योंकि तब रिफर्बिश्ड आईफोन (पुराने या छोटी-मोटी खराबी के बाद पुनः बाजार में बेचे जाने वाले फोन) के आयात और बिक्री की अनुमति देने का उनका शुरुआती प्रस्ताव सिरे से खारिज कर दिया गया था। इसके बजाय उन्हें स्थानीय स्तर पर आईफोन असेंबल करने की संभावनाओं का पता लगाने के लिए कहा गया।

हालांकि, सरकार को मनाने के प्रयास विफल रहे। मार्च 2017 में राज्य सभा में लिखित जवाब में तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि ऐपल का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया था। उस प्रस्ताव में भारत में आईफोन तैयार करने की शर्त के रूप में स्मार्टफोन के पूंजीगत उपकरणों, पुर्जों और उपभोग्य सामग्रियों के साथ सेवा एवं मरम्मत पर 15 वर्षों की अवधि के लिए शुल्क छूट की मांग शामिल थी।

सीतारमण ने एकल-ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए आवश्यक विवादास्पद 30 प्रतिशत स्थानीय स्रोत सामान का इंतजाम करने (सोर्सिंग) नियमों में छूट देने का ऐपल का अनुरोध भी खारिज कर दिया। अब नौ साल बाद जब कुक ने अपने पद से हटने की घोषणा की तो वैश्विक स्तर पर उपलब्ध प्रत्येक चार आईफोन में कम से कम भारत से ताल्लुक रखता है। वर्ष 2016 में 95 प्रतिशत आईफोन चीन में तैयार होते थे ।

अब भारत अमेरिका को आईफोन निर्यात करने वाले सबसे बड़े देशों में शुमार हो गया है। मोबाइल उपकरणों के लिए उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना (वित्त वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2026) के पांच वर्षों में देश ने कुल 70 अरब डॉलर के माल ढुलाई मूल्य (फ्रेट ऑन बोर्ड) का आईफोन का उत्पादन किया है। इतना ही नहीं, ऐपल ने अपना पीएलआई उत्पादन लक्ष्य 80 प्रतिशत से अधिक पार कर लिया है जिससे इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं भारत से निर्यात की जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी श्रेणी बन गई हैं।

 ऐपल को भारत में कैसे मिली सफलता?

सरकार के साथ बातचीत विफल होने के बाद कुक एवं उनकी टीम ने अपनी रणनीति बदल दी। वर्ष 2018 तक ऐपल ने अमेरिका के  दबदबे वाले नजरिये से अलह हटकर सरकार की प्राथमिकताओं के अनुरूप स्थानीय विशेषज्ञों की एक टीम बनाने का निर्णय लिया। इसने सरकार से अकेले बातचीत करने के बजाय मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग संघों के साथ मिलकर संवाद करने का विकल्प चुना। यह रणनीति कारगर साबित हुई। तीन साल की कठिन चर्चा के बाद एकल-ब्रांड खुदरा बिक्री के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नियमों में संशोधन हुए।

ऐपल ने सरकार को यह विश्वास दिलाया कि वह स्वयं आईफोन नहीं बनाती है इसलिए अनुबंध पर यह मोबाइल तैयार करने वाले उनके विनिर्माताओं द्वारा जोड़ा गया मूल्य ‘स्थानीय सोर्सिंग’ में गिना जाना चाहिए। इसके ऐपल ने सरकार को आश्वासन दिया कि वह ऐसी अनुचित मूल्य निर्धारण नीतियों में शामिल नहीं होगी जिससे स्थानीय खुदरा विक्रेताओं को नुकसान हो। भारत में इसका पहला खुदरा स्टोर 2023 में मुंबई में खुला। समय ने भी ऐपल का साथ दिया।

वर्ष 2019 में सरकार द्वारा आत्मनिर्भर भारत के लिए किए गए प्रयास और पीएलआई योजना के माध्यम से उद्योग को दिए गए समर्थन का तालमेल ऐपल द्वारा चीन पर अपनी भारी निर्भरता कम करने के प्रयासों के साथ हो गया। हालांकि, ऐपल के वियतनाम में वियरेबल और आईपैड के विनिर्माण केंद्र थे मगर सैमसंग ने अरबों डॉलर के निवेश के साथ पहले ही वहां के स्मार्टफोन बाजार पर अपना दबदबा बना लिया था। इसे देखते हुए ऐपल ने भारत को अपने वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में चुना।

इसके बाद सरकार और ऐपल के बीच सहयोग बढ़ता गया जिसमें कुक ने वैश्विक चुनौतियों (बात चाहे डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में में शुल्कों का दबाव हो या भारतीय सरकार की चिंताओं को दूर करने के लिए रणनीति में बदलाव करना)  से निपटने में अहम भूमिका निभाई। मोबाइल विनिर्माण के लिए पीएलआई योजना को 10 महीने से अधिक की गहन चर्चा के बाद मंजूरी मिली। कई क्षेत्रों में ऐपल ने नीति की सफलता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिस्पर्द्धियों को रियायतें दीं। उदाहरण के लिए पीएलआई के लिए पात्र न्यूनतम फोन मूल्य 300 डॉलर से घटाकर 200 डॉलर कर दिया गया ताकि कम कीमत वाले उपकरण भी शामिल किए जा सकें। हालांकि, इससे  ऐपल को सीधे तौर पर कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि उसके उत्पादों की कीमत अधिक है।

शुरू में ऐपल ने आपूर्ति तंत्र तैयार करने के लिए चीन के अपने आपूर्तिकर्ताओं को भारत लाने की योजना बनाई थी। हालांकि, गलवान में संघर्ष के कारण भारत ने एफडीआई नियमों को सख्त कर दिया जिससे नए उद्यमों में चीन की भागीदारी पर रोक लग गई। इसका उद्देश्य वित्त वर्ष 2026 तक सरकार के 35-40 प्रतिशत के स्थानीयकरण लक्ष्य का समर्थन करना था।

सरकार ने कुछ लचीलापन दिखाया और गहन जांच के बाद चीन की 12 कंपनियों को संयुक्त उद्यम बनाने की मंजूरी दी गई। हालांकि, अप्रैल 2023 में कुक और मोदी के बीच हुई बैठक के दौरान जब वह (कुक)ऐपल  के पहले स्टोर का उद्घाटन करने के लिए भारत आए थे तो उस समय चीन के दबदबे वाले वाली आपूर्ति श्रृंखला को लेकर चिंता जताई गई। कुक ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय और चीन के अलावा दूसरे साझेदारों को शामिल किया। यह रणनीति कारगर साबित हुई और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और समवर्द्धन मदरसन जैसी प्रमुख कंपनियों सहित 40 भारतीय कंपनियां आपूर्ति श्रृंखला में शामिल हो गईं। हालांकि, वर्तमान में 20 प्रतिशत मूल्य वर्द्धन के साथ ऐपल सरकार के लक्ष्यों से पीछे रह गई है।

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First Published - April 21, 2026 | 10:35 PM IST

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