अमेरिका और ईरान के बीच 100 दिन से अधिक चले युद्ध को समाप्त करने के समझौते और होर्मुज स्ट्रेट फिर खुलने की संभावना से भारत को बड़ी राहत मिली है। हालांकि उद्योग के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि समझौते के बावजूद रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण इस जलमार्ग से शिपिंग यातायात सामान्य होने में महीनों लग सकते हैं।
इक्विरस सिक्योरिटीज के शोध प्रमुख मौलिक पटेल ने कहा, ‘शिपिंग कंपनियों को फारस की खाड़ी में पूर्ण संचालन फिर से शुरू करने में कम से कम दो महीने लगने की उम्मीद है, क्योंकि रिफाइनरी के क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत होगी। ऐसे में वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही तक आवाजाही सामान्य होने की संभावना है। भारत को 2026 के शेष महीनों में बढ़ी हुई कीमतों के साथ तालमेल बिठाना होगा।’ अभी समझौते का ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि जहाजों को बिना टोल चुकाए होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति दी जाएगी। अमेरिका और ईरान 19 जून को स्विट्जरलैंड में शांति समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करने
वाले हैं।
रिफाइनरी से जुड़े अधिकारी ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बताया कि भारत की तेल कंपनियां समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर और उसके बाद होर्मुज स्ट्रेट खुलने का इंतजार कर रही हैं, उसके बाद ही तेल आपूर्ति की संभावना के बारे में सोचेंगी। उन्होंने कहा कि जलमार्ग को फिर से खोलने के प्रयास इसके पहले असफल हो चुके हैं।
पटेल ने कहा, ‘शुरुआती चरण में खदानों से भौतिक निकासी, बीमाकर्ताओं का भरोसा बहाल होने और टैंकरों की तैनाती का मसला है। बीमाकर्ता स्थिरता पर नजर रख रहे हैं। ऐसे में टैंकरों की आवाजाही 50 से 60 प्रतिशत तक सामान्य हो पाएगी और उसके बाद युद्ध के पहले के स्तर पर स्थिति पहुंचेगी।’
बहरहाल शांति समझौते का तत्काल प्रभाव ऊर्जा बाजारों पर साफ नजर आ रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें अपने हालिया उच्च स्तर से लगभग 20 प्रतिशत गिर गईं और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) बेंचमार्क की कीमतें भी संभावित आपूर्ति व्यवधानों पर चिंताओं के कम होने के साथ नरम हुईं हैं।
क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक सेहुल भट्ट ने कहा, ‘हाल ही में खुदरा ईंधन की कीमतों में वृद्धि और उत्पाद शुल्क में कटौती के बाद कीमत कम होने से वाहन ईंधन पर होने वाला घाटा काफी हद तक खत्म हो गया है। पेट्रोल और डीजल की बिक्री में मार्जिन पर दबाव कम हो गया है।’
वहीं विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि पश्चिम एशियाई देशों से ऊर्जा आपूर्ति फिर से शुरू होने पर चीन जैसे प्रमुख आयातक खरीद बढ़ा सकते हैं, जिससे कीमतों में तेजी का दबाव बना रह सकता है। रिस्टैड एनर्जी के जियोपॉलिटिक्स एनॉलिसिस के प्रमुख जॉर्ज लियोन ने कहा, ‘वाणिज्यिक स्टॉक और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार सहित कच्चे माल की आपूर्ति में मुनाफा वसूली से कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव पड़ने की उम्मीद है। समझौते से तेल आपूर्ति के झटके की संभावना कम हुई है, लेकिन जोखिम खत्म नहीं हुआ है। इससे घबराहट कम हुई है, लेकिन संघर्ष के पहले की स्थिति बहाल होने में अभी बहुत वक्त लगेगा।’
ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि के साथ चीन ने समुद्री बाजारों से रणनीतिक रूप से कदम पीछे खींचे और मार्च व मई के बीच उसका आयात 60 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा गिर गया। पटेल ने कहा, ‘इसकी वजह से तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर नहीं गईं, और झटका कुछ कम हुआ। जैसे-जैसे चीन आयात बढ़ाना शुरू करेगा और मांग बढ़ेगी, कीमतों में तेजी आएगी।