पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को चुनाव नतीजे ने पूरी तरह से बदल दिया और भारतीय जनता पार्टी ने जबरदस्त जीत हासिल करते हुए सत्ता पर कब्जा कर लिया। यह नतीजा मतदाताओं के मिजाज में एक निर्णायक बदलाव का संकेत है और इसने ममता बनर्जी तथा उनकी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी)के 15 साल के शासन का अंत कर दिया है। इस बेहद कड़े मुकाबले वाले चुनाव में भगवा पार्टी ने राज्य में अपनी पहली जीत दर्ज करते हुए विधान सभा की 294 सीटों में से 206 सीटों पर बढ़त बना ली। वहीं, सत्ता-विरोधी लहर के जोरदार असर के चलते टीएमसी महज 81 सीटों तक सिमट कर रह गई।
यह नतीजा कई मायनों में ऐतिहासिक है। करीब 50 साल में यह पहला मौका है जब एक ही पार्टी पश्चिम बंगाल और केंद्र दोनों जगह शासन करेगी। ऐसी स्थिति आखिरी बार 1972 और 1977 के बीच मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और केंद्र में कांग्रेस सरकार के समय देखी गई थी।
मतों की हिस्सेदारी की बात करे तो भाजपा को 45.52 फीसदी मत मिले, जो पिछली बार मिले 37.97 फीसदी के मुकाबले खासा ज्यादा है। टीएमसी को 40.8 फीसदी मिले, जो 2021 के 48.02 फीसदी से कम है। उत्तरी बंगाल भगवा पार्टी का गढ़ रहा है, लेकिन वह टीएमसी के गढ़ प्रेसिडेंसी डिविजन में भी सेंध लगाने में कामयाब रही। यह राज्य का राजनीतिक केंद्र है जिसमें कोलकाता, हावड़ा, नादिया, उत्तरी 24 परगना और दक्षिणी 24 परगना ज़िले शामिल हैं।
कोलकाता (11 सीटें), हावड़ा (16) और दक्षिण 24 परगना (जहां 2021 में भाजपा का खाता भी नहीं खुला था) में पार्टी 22 सीटों पर आगे चल रही थी। हालांकि हाई वोल्टेज भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी आगे निकल गईं जबकि शुभेंदु अधिकारी पीछे रह गए। 2021 में बनर्जी नंदीग्राम में अधिकारी से बहुत कम अंतर से हार गई थीं, भले ही उन्होंने राज्य में जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार किस्मत पलट गई।
विश्लेषक इस सत्ता परिवर्तन का श्रेय कई कारकों के मेल को देते हैं – मुस्लिम-बहुल इलाकों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) का असर, अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा, हिंदू वोटों का एकजुट होना और जोरदार सत्ता-विरोधी लहर। विश्लेषक सब्यसाची बसु रे चौधरी ने बताया कि एसआईआर का असर साफ तौर पर दिखा और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नामों का हटाया जाना एक अहम बात थी।
जब से एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई है, पश्चिम बंगाल की मतदाताओं में लगभग 90 लाख की कमी आई है। न्यायिक अधिकारियों द्वारा जांच-पड़ताल के बाद लगभग 27 लाख लोगों को अयोग्य घोषित कर दिया गया और उन्हें ट्रिब्यूनलों के सामने अपील करने का विकल्प दिया गया। मतदान से पहले केवल 1,600 से कुछ ज्यादा नाम ही बहाल किए गए।
हालांकि, बसु रे चौधरी ने यह भी कहा कि यह फैसला बंटे हुए अल्पसंख्यक और महिलाओं के वोटों, महत्वाकांक्षी युवाओं और कल्याणकारी राजनीति की सीमाओं के बारे में भी था। कांग्रेस ने दो सीटें जीती हैं। हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एयूजेपी) ने दो, और सीपीएम तथा जेएसएफ एक-एक सीट पर आगे चल रही थीं।
नतीजे बताते हैं कि भ्रष्टाचार से जुड़ी चिंताएं (जिन्हें पहले विपक्षी पार्टियों ने उठाया था और मतदाताओं ने नजरअंदाज कर दिया था और अब ये चीजें अपना असर दिखा रही हैं। बासु रे चौधरी ने समझाया कि कोलकाता के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आता है, जब कुछ ऐसे कारण (जिनका शायद तुरंत कोई असर न दिखे) समय के साथ जमा होते जाते हैं और आखिरकार एक बड़े आंतरिक संकट का रूप ले लेते हैं; फिर चाहे वह भ्रष्टाचार हो या रोजगार के पर्याप्त अवसरों की कमी।
2011 में ठीक यही हुआ था, जब 34 साल तक सत्ता में रहने के बाद लेफ्ट फ्रंट सत्ता से बाहर हो गया था। सत्ता-विरोधी लहर जोर पकड़ रही थी और नंदीग्राम तथा सिंगुर में जमीन को लेकर हुए आंदोलन (जिन्हें ममता बनर्जी का समर्थन हासिल था) निर्णायक मोड़ साबित हुए। विडंबना यह है कि टीएमसी ने न सिर्फ राज्य गंवाया बल्कि सिंगुर भी भाजपा के हाथों खो दिया। यह घटना कई मायनों में उस पुराने दौर की याद दिलाती है।