West Bengal Election Results 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार की सुबह एक ऐतिहासिक बदलाव की गवाह बनी। जब मतगणना शुरू हुई, तो BJP के दिल्ली मुख्यालय से लेकर कोलकाता की गलियों तक ‘झालमुड़ी’ के साथ जश्न का दौर शुरू हो गया। दोपहर 2 बजे तक के रुझानों ने न केवल तृणमूल कांग्रेस (TMC) को चौंका दिया, बल्कि खुद BJP के अपने अनुमानों को भी पीछे छोड़ दिया। पार्टी को उम्मीद थी कि वह 180 से ज्यादा सीटें जीतेगी, लेकिन दोपहर तक BJP 190 से ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाती दिखी।
ममता बनर्जी के 15 साल के शासन को चुनौती देकर BJP ने जिस तरह बंगाल में यह बड़ी जीत हासिल की है, उसके पीछे पांच प्रमुख रणनीतियां और जमीनी मुद्दे रहे हैं। रिपोर्ट्स की मानें तो इन पांच वजहों ने बंगाल का पूरा चुनावी गणित ही बदल दिया।
बंगाल चुनाव में इस बार सबसे बड़ा रोल महिलाओं के वोट ने निभाया। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, BJP की अंदरूनी रिपोर्ट में सामने आया है कि करीब 5% महिला वोटर्स इस बार सीधे BJP के पक्ष में आए। माना जा रहा है कि पिछले महीने केंद्र सरकार ने जो महिलाओं को आरक्षण देने का कदम उठाया था, उसका असर जमीन पर साफ दिखा और उसी ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई।
BJP ने प्रचार के दौरान विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ साबित करने का जो विमर्श (नैरेटिव) तैयार किया, उसने बंगाल की करोड़ों महिलाओं को प्रभावित किया। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बंगाल के कुल 6.44 करोड़ मतदाताओं में महिलाओं की संख्या 3.16 करोड़ है, जो पुरुषों (3.28 करोड़) के लगभग बराबर है। 2021 में जहां TMC ने 48% वोट पाकर महिलाओं का बड़ा समर्थन हासिल किया था, इस बार वह तिलस्म टूटता नजर आ रहा है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने भी महिलाओं के बीच सुरक्षा के मुद्दे को हवा दी, जिसका सीधा फायदा BJP को मिला।
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चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह ने ‘परिवर्तन यात्रा’ में एक बड़ा वादा किया था कि अगर सरकार बनी तो 45 दिनों के भीतर सातवां वेतन आयोग लागू कर दिया जाएगा। यह बात बंगाल के सरकारी कर्मचारियों को सीधे तौर पर पसंद आई और BJP के लिए एक तरह से मास्टरस्ट्रोक साबित हुई। वैसे भी बंगाल में दिल्ली की तरह सरकारी कर्मचारियों की संख्या काफी बड़ी है, इसलिए यह दांव काफी असरदार रहा।
राज्य में लगभग 20 से 50 लाख ऐसे मतदाता हैं, जो या तो अभी सरकारी कर्मचारी हैं, पेंशनभोगी हैं या फिर सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवा हैं। TMC सरकार पर DA (महंगाई भत्ता) रोकने और कर्मचारियों के अधिकारों को नकारने के आरोपों ने एक गहरी नाराजगी पैदा कर दी थी। BJP ने इसी नाराजगी को भुनाया। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ‘सर्विस इलेक्टर्स’ (सेवा मतदाता) की संख्या सबसे अधिक (1.08 लाख) थी, जो असम और तमिलनाडु जैसे राज्यों से कहीं ज्यादा है। सातवें वेतन आयोग और रिक्त पदों को भरने के आश्वासन ने इस बड़े वोट बैंक को BJP के पक्ष में कर दिया।
बंगाल का चुनाव इस बार पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकास मॉडल’ और ममता बनर्जी के ‘शासन मॉडल’ के बीच की जंग बन गया था। BJP ने आरोप लगाया कि TMC सरकार ने केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को राज्य में लागू नहीं होने दिया, जिससे गरीब जनता को नुकसान हुआ।
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प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल में एक दर्जन से अधिक जनसभाएं कीं और हर रैली में बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) और औद्योगिक विकास का भरोसा दिया। इस वादे ने मध्यम वर्ग और पहली बार वोट देने वाले युवाओं (First-time voters) को अपनी ओर खींचा। आंकड़ों के मुताबिक, इस बार करीब 5.23 लाख मतदाता पहली बार वोट दे रहे थे, जबकि 20 से 29 साल के युवाओं की संख्या 1.31 करोड़ के आसपास थी। BJP ने सोशल मीडिया और ग्राउंड कैंपेन के जरिए इस युवा पीढ़ी को यह समझाने में कामयाबी हासिल की कि उनका भविष्य केंद्र के साथ मिलकर चलने में ही सुरक्षित है।
बंगाल में चुनावी हिंसा हमेशा से बड़ा मुद्दा रही है, लेकिन इस बार BJP ने खास तौर पर लोगों के मन से डर निकालने पर फोकस किया। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने जमीन पर सक्रिय होकर लोगों को वोटिंग की अपील की। संघ ने विचारधारा से ऊपर उठकर आम मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि वे बिना किसी डर के वोट डाल सकते हैं, जिसका असर वोटिंग पर भी देखने को मिला।
केंद्रीय सुरक्षा बलों (CAPF) की भारी तैनाती ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। चुनाव आयोग के निर्देशानुसार, मतगणना के बाद भी 500 कंपनियां राज्य में शांति बनाए रखने के लिए तैनात रहेंगी। इसके अलावा EVM और मतगणना केंद्रों की सुरक्षा के लिए 200 कंपनियां अलग से लगाई गईं। इस सुरक्षा कवच ने उन लोगों को भी बाहर निकलकर वोट देने का साहस दिया, जो पहले हिंसा के डर से घर बैठ जाते थे। आरजी कर जैसे मामलों ने कानून-व्यवस्था पर जो सवाल खड़े किए थे, उन्हें प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने चुनावी रैलियों में प्रमुखता से उठाया, जिससे सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) और मजबूत हो गई।
BJP की जीत की एक तकनीकी लेकिन बेहद अहम वजह ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी SIR प्रक्रिया भी मानी जा रही है। पार्टी ने पहले ही आरोप लगाया था कि बंगाल की वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में बाहरी और फर्जी नाम शामिल हैं। इस बार चुनाव ने ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ के आधार पर गहन जांच की, जिसके बाद करीब 27 लाख संदिग्ध नाम सूची से हटा दिए गए।
पार्टी का मानना है कि इस सफाई के बाद सिर्फ असली वोटर्स ही वोट डाल पाए। 2021 के मुकाबले इस बार करीब 30 लाख ज्यादा वोट पड़े, जो यह दिखाता है कि लोगों ने ज्यादा उत्साह के साथ मतदान किया। BJP ने बाहरी लोगों की एंट्री और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था और इसे जनता का समर्थन भी मिला। इन सभी फैक्टर्स ने मिलकर BJP को उस जादुई आंकड़े तक पहुंचाने में मदद की, जिसने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी।