भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के एक चर्चा पत्र में डिजिटल भुगतान माध्यमों से एक खाते से दूसरे खाते में 10,000 रुपये से अधिक हस्तांतरण पर एक घंटे की देरी का प्रस्ताव रखा है, जिसका मकसद बढ़ती धोखाधड़ी को रोकना है। उम्मीद की जा रही है कि इस तरह के लेनदेन को रखने में सक्षम आईटी इन्फ्रास्ट्रक्टर बनाने में बैंकों को अधिक लागत का वहन करना पड़ेगा, क्योंकि इस दायरे में आने वाला लेनदेन प्रतिदिन करीब 1 अरब तक पहुंच जाता है।
भुगतान में देरी करने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में लागत बढ़ेगी, लेकिन धोखाखड़ी को रोकने के लिए बैंकर तत्काल भुगतान व्यवस्था में इस व्यवधान के खिलाफ नहीं हैं। हालांकि उन्होंने संकेत दिए हैं कि वे 10,000 रुपये की सीमा को बढ़ाकर 25,000 रुपये किए जाने की मांग कर सकते हैं।
बैंकरों का कहना है कि इससे तत्काल भुगतान करने वाली व्यवस्था यूपीआई कमजोर पड़ सकती है क्योंकि देरी से भुगतान आम लोगों की अपेक्षाओं के विपरीत है। भारतीय बैंक संघ और भुगतान स्वनियामक संगठनों (एसआरओ) जैसे उद्योग निकायों के साथ प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करने करने के बाद बैंक 8 मई तक आरबीआई को अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। पेमेंट टेक्नॉलजी सर्विस प्रोवाइडर (टीएसपी) में एक अधिकारी ने कहा, ‘तकनीकी रूप से यह व्यावहारिक है कि देरी की जाए। लेकिन अब तक कुल मिलाकर बाधारहित लेनदेन पर ध्यान रहा है। जानबूझकर देरी किए जाने की व्यवस्था लाए जाने से व्यवस्था में कई स्तर पर बदलाव करना पड़ेगा क्योंकि अभी भुगतान के लिए अलग तरह की व्यवस्था बनाई गई है।’
पिछले सप्ताह जारी एक चर्चा पत्र में रिजर्व बैंक ने डिजिटल भुगतानों में बढ़ते घोटालों को रोकने के उपायों का सुझाव दिया है। इसमें लाभार्थी के खाते में जमा होने से पहले 10,000 रुपये से अधिक के डिजिटल भुगतान में एक घंटे की देरी किया जाना शामिल है।
इसके अलावा कमजोर यूजर्स के मामलों में विश्वसनीय व्यक्तियों से अतिरिक्त प्रमाणीकरण की जरूरत, बड़े भुगतान प्राप्त करने वाले खातों की सख्त जांच और ग्राहकों को अतिरिक्त सुरक्षा सुविधा मुहैया कराया जाना शामिल है।
एक बड़े सरकारी बैंक के बैंकर ने कहा, ‘ज्यादातर लेनदेन अब ऑनलाइन हो गया है। करीब 90 प्रतिशत लेनदेन यूपीआई के माध्यम से हो रहा है। यूपीआई लेनदेन रोजाना बढ़कर 0.8 से 0.85 अरब और सालाना करीब 26 से 27 अरब हो गया है, जिसका मतलब यह है कि बहुत छोटी सी संख्या को इससे अलग किया जाना भी बड़ा आंकड़ा होगा।
इसके लिए स्विच स्तर पर बदलाव की जरूरत होगी, जिसमें एक अलग आर्किटेक्चर और काफी अधिक भंडारण क्षमता शामिल है। बैंकों को जोखिम-आधारित दृष्टिकोण अपनाने, प्रेषक से संपर्क करने के लिए तंत्र विकसित करने और मानक संचालन प्रक्रियाओं को डिजाइन करने की भी आवश्यकता होगी।’ स्विच स्तर पर बदलाव से अतिरिक्त लागत आएगी, जिनका बोझ टीएसपी बैंकों पर डालेंगे। अभी रियल-टाइम लेनदेन होता है, इसकी तुलना में यूपीआई के बुनियादी ढांचे पर कुछ अतिरिक्त बोझ होगा।
सूत्र ने कहा, ‘नए दिशानिर्देश लागू होने पर सभी बैंक यूपीआई स्विच वेंडरों पर निर्भर होंगे। उनके कोर बैंकिंग में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।’ बैंकिंग में होने वाली धोखाधड़ी में संख्या के हिसाब से देखें तो 10,000 रुपये से अधिक के मामले 45 प्रतिशत हैं। मूल्य के हिसाब से 95 प्रतिशत धोखाधड़ी 10,000 रुपये से ऊपर के मामले में होती है। मूल्य के हिसाब से पिछले 5 साल में डिजिटल धोखाधड़ी 41 गुना बढ़कर करीब 23,000 करोड़ रुपये हो
गई है।
उपरोक्त बैंकर ने कहा, ‘यूपीआई भुगतान में कोई पैसे नहीं कमाता। वहीं इसके बुनियादी ढांचे पर भारी लागत आती है जिसका वहन बैंक करते हैं। इसमें मिलने वाला समर्थन वास्तविक खर्च की तुलना में बहुत कम है। यह इतना बड़ा बदलाव है कि लोगों को इस पर विचार करना होगा।’ उनके अनुसार केंद्रीय बैंक के इस तरह के उपाय भुगतान प्रणाली के अब तक के मुख्य लक्ष्य को कमजोर कर सकते हैं, लेकिन धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों को देखते हुए इस तरह का उपाय उचित है।’
रिजर्व बैंक ने व्यापारियों को भुगतान के मामले को अलग रखा है, जहां बैंक या पेमेंट एग्रीगेटर अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं। वहीं व्यक्ति से व्यक्ति को होने वाले हस्तांतरण के मामले में सीमित अतिरिक्त जांच होती है।
निजी क्षेत्र के बैंकर ने कहा, ‘यह सुविधा और धोखाधड़ी रोकने के उपाय के बीच का मसला है। इसे 10,000 रुपये होना चाहिए या 25,000 रुपये किया जाना चाहिए, यह हमेशा बहस का मसला हो सकता है। मेरा मानना है कि यह अभी चर्चा के स्तर पर है, इसलिए इसे 10,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये किया जा सकता है क्योंकि बड़ी राशि के मामले में नुकसान का असर अधिक होता है।’