भारत में सार्वजनिक क्षेत्र (पीएसबी) के ज्यादातर बैंक गिनती के कुछ स्वतंत्र निदेशकों के साथ चल रहे हैं। ये हालात तब हैं जब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) बैंकों के बोर्ड को अधिक सक्षम बनाने का प्रयास कर रहा है। यही नहीं, देश के 11 राष्ट्रीयकृत बैंकों में से फिलहाल केवल तीन में ही गैर-कार्यकारी अध्यक्ष हैं। यह स्थिति खराब कही जा सकती है क्योंकि कभी आरबीआई ने बैंकों के संचालन में गैर-कार्यकारी अध्यक्षों की तुलना ‘जहाज के कप्तान’ से की थी। अधिकांश बैंकों के बोर्ड में चार्टर्ड अकाउंटेंट भी नहीं हैं।
प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी (एमडी एवं सीईओ), कार्यकारी निदेशकों, आरबीआई और सरकार द्वारा नामित निदेशकों के अलावा अधिकांश बैंकों के बोर्ड में केवल दो या तीन अन्य स्वतंत्र निदेशक हैं जो मुख्य रूप से शेयरधारकों की श्रेणी से होते हैं। किसी बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के बोर्ड में 16 सदस्य हो सकते हैं। बेंगलूरु स्थित केनरा बैंक (27 लाख करोड़ रुपये से अधिक कुल कारोबार वाला एक बड़ा सार्वजनिक बैंक) लगभग चार महीने से एमडी और सीईओ के बिना चल रहा है।
इस बीच, पिछले सप्ताह सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा और बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (एमडी एवं सीईओ) का कार्यकाल तीन साल के लिए बढ़ा दिया है। इन दोनों बैंकों के सीईओ की नियुक्ति 2023 में हुई थी। वर्ष 2029 में दूसरे कार्यकाल की समाप्ति के बाद दोनों छह साल पूरे कर लेंगे और हाल के समय में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुख बन जाएंगे। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। बैंक ऑफ इंडिया, यूको बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक के अलावा किसी अन्य बैंक में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष नहीं है।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक के पदों को विभाजित कर दिया था। सरकार ने यह कदम बैंक बोर्ड की कार्यकुशलता बढ़ाने और उसमें अधिक पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से उठाया था। हालांकि, पिछले 11 वर्षों में कई सरकारी बैंकों में अध्यक्ष का पद लंबे समय तक रिक्त रहा।
आरबीआई ने हाल ही में बैंकों के बोर्ड को समय का प्रभावी उपयोग करने और रणनीति एवं जोखिम प्रबंधन पर अधिक केंद्रित एवं गुणात्मक कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए मसौदा नियम जारी किए हैं। आरबीआई ने कहा है,‘बोर्ड के अध्यक्ष की बैठक का एजेंडा तय करने की प्राथमिक जिम्मेदारी होगी।’ इस तरह इस पद के महत्त्व पर जोर दिया गया है।
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के बोर्ड में चार्टर्ड अकाउंटेंट श्रेणी के अंतर्गत केवल एक अंशकालिक गैर-सरकारी निदेशक हैं। हालांकि, अधिकांश बैंकों में चार्टर्ड अकाउंटेंट श्रेणी से ऐसा कोई बोर्ड सदस्य नहीं है। बोर्ड की महत्त्वपूर्ण लेखापरीक्षा समिति की अध्यक्षता चार्टर्ड अकाउंटेंट करते हैं और यह सीधे नियामक से संपर्क करती है। कई बैंकों ने अस्थायी व्यवस्था के तहत चार्टर्ड अकाउंटेंट पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति को बोर्ड की लेखा परीक्षा समिति का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंपी है। इस महीने के शुरू में जारी मसौदा मानदंडों में नियामक ने कहा है कि बैंक के प्रदर्शन, आचरण और नियंत्रण की अंतिम जिम्मेदारी बोर्ड की है।