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अल-नीनो का खतरा: कमजोर मॉनसून की आशंका, जल संरक्षण पर नहीं ध्यान तो सूख जाएंगे खेत-खलिहान

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मौसम विभाग का कहना है कि यदि अप्रैल का पूर्वानुमान सटीक साबित हुआ, तो देश में तीन वर्ष बाद सामान्य से कम वर्षा हो सकती है।

Last Updated- April 16, 2026 | 10:39 PM IST
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प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति मजबूत होने से इस वर्ष भारत में मॉनसून को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। मौसम विभाग का कहना है कि यदि अप्रैल का पूर्वानुमान सटीक साबित हुआ, तो देश में तीन वर्ष बाद सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। विभाग का अनुमान है कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून एलपीए का 92 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो 2023 के बाद पहली बार सामान्य से कम होगा। मौसम विभाग के अनुसार, एलपीए का मतलब किसी क्षेत्र विशेष में 30 या 50 वर्षों जैसी लंबी अवधि में महीने या सीजन के दौरान दर्ज औसत वर्षा से है) मौसम विभाग ने यह भी कहा कि उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीप को छोड़ देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है।

नोएडा स्थित निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने भी इसी तरह का पूर्वानुमान जारी किया है। उसके अनुसार मॉनसून सीजन (जून से सितंबर) में 5 प्रतिशत कम या ज्यादा के साथ 94 प्रतिशत वर्षा हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही ये आंकड़े कागजों पर बहुत कम न लगें, लेकिन वर्षा में मामूली कमी से भी परिणाम विकट हो सकते हैं। यदि यह पूर्वानुमान सच साबित हुआ, तो कृषि और पेयजल आपूर्ति पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है।

मॉनसून देश की जीवन रेखा

भारत में लगभग 45 प्रतिशत खेती मॉनसून पर निर्भर रहती है। यदि वर्षा कम या ज्यादा होती है तो उसका सीधा असर फसल उत्पादन पर देखने को मिलता है। वर्ष 2019 के नीति आयोग के कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स (सीडब्ल्यूएमआई) के अनुसार, लगभग 74 प्रतिशत गेहूं और 65 प्रतिशत चावल की खेती वाले क्षेत्र पहले से ही भारी जल-संकट का सामना कर रहे हैं।

सीडब्ल्यूएमआई के अनुमान के अनुसार 2030 तक कृषि जल में मांग-आपूर्ति का अंतर 570 अरब क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकता है। देश में 62 प्रतिशत भूजल सिंचाई लायक है और निगरानी वाले आधे से अधिक क्षेत्रों में यह लगातार घट रहा है। जल संरक्षण के लिए काम करने वाले और रेमन मैगसेसे पुरस्कार एवं स्टॉकहोम वाटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह कहते हैं, ‘मॉनसून हमारी जल प्रणाली की जान है। कमजोर मॉनसून का फसलों और लोगों के जीवन पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।’ सिंह कहते हैं कि व्यावसायिक फसलों और औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ते रुझान से भारत में मॉनसून की वर्षा पर निर्भरता बढ़ रही है।’

दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स ऐंड पीपल्स के समन्वयक हिमांशु ठक्कर ने भी इसी तरह की चिंताएं व्यक्त की हैं। उन्होंने कहा, ‘आने वाले महीनों में जब तापमान बढ़ने की संभावना दिख रही है, ऐसे में कम वर्षा का पूर्वानुमान चिंता बढ़ाने वाला है।’

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बारिश की कमी इतनी ज्यादा मायने नहीं रखती जितना उसका वि​भिन्न क्षेत्रों में समान या असमान रूप से बरसना प्रभाव डालता है। यदि पर्याप्त पानी नहीं बरसे तो कृ​षि सबसे अ​धिक प्रभावित होती है। वर्षा के समय को महत्त्वपूर्ण बताते हुए ठक्कर कहते हैं, ‘ फसल के प्रारंभिक या फूल के चरण में पानी नहीं बरसा तो बड़ा नुकसान हो सकता है।’

जलाशयों में भी पानी की कमी

वर्तमान में जलाशय जरूर अस्थायी रूप से मददगार साबित हो सकते हैं, लेकिन इनमें भी पानी की कमी होती जा रही है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) कुल 183.565 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) क्षमता वाले 166 प्रमुख जलाशयों के भंडारण पर नजर रखता है। यह देश की अनुमानित कुल जलाशय क्षमता 257.812 बीसीएम का लगभग 71.20 प्रतिशत है।

सीडब्ल्यूसी के 9 अप्रैल 2026 के बुलेटिन में कहा गया कि इन जलाशयों में भंडारण 82.070 बीसीएम या कुल क्षमता का 44.71 प्रतिशत है। यह पिछले साल के 69.752 बीसीएम के स्तर से अधिक है और 10 साल के औसत 64.618 बीसीएम से ऊपर है। इससे पता चलता है कि वर्तमान जलाशय भंडारण पिछले साल के स्तर का लगभग 117.66 प्रतिशत और दशकीय औसत का 127.01 प्रतिशत है, लेकिन हाल के महीनों में इसमें तेजी से कमी आ रही है।

इनमें भंडारण इसी साल 29 जनवरी को कुल क्षमता का 126.354 बीसीएम (68.83 प्रतिशत) से 2 अप्रैल को 85.698 बीसीएम (46.69 प्रतिशत) और 9 अप्रैल तक 82.070 बीसीएम तक गिर गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि जलाशयों में पर्याप्त पानी 2025 के मॉनसून सीजन में अच्छी बारिश के कारण है, जबकि इस साल कमजोर मॉनसून की आशंका है। ऐसे में आगे बफर जल्दी से खत्म हो सकता है।

भूजल स्तर बनाए रखना चुनौती

केवल कम वर्षा होने से ही दिक्कतें नहीं बढ़ रहीं, ब​ल्कि प्राकृतिक पुनर्भरण प्रणाली कमजोर होने से भी हालात बिगड़ रहे हैं। यदि समय पर समान रूप से वर्षा होती है तो भूजल भंडार अच्छी तरह भर जाते हैं, लेकिन वर्षा का बदलता पैटर्न मु​श्किलें खड़ी कर रहा है। अब निरंतर मध्यम स्तर की बारिश देखने को नहीं मिलती। अब बहुत कम समय के लिए तेज बौछारों वाली बारिश अ​धिक होती है। इसका सीधा असर भूजल भंडारण पर पड़ता है। ऐसे में उन तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंचता।

राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘पहले हर गांव में तालाब जैसे जल निकाय हुआ करते थे, जो पानी के बैंक के रूप में काम करते थे। पानी के ये बैंक यानी तालाब और झीलें भूजल एक्वीफर को रिचार्ज करने और वाष्पीकरण के माध्यम से पानी का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं, लेकिन अब ये लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। इसी वजह से बाढ़ और सूखे की ​स्थिति पैदा हो रही है।’

ठक्कर ने भी कहा, ‘हम भूजल का अधिक उपयोग करते हैं, जिससे इसकी कमी होती जा रही है।’ केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में निकाले जाने वाले 87 प्रतिशत भूजल का उपयोग कृषि के लिए किया जाता है, जबकि लगभग 11 प्रतिशत घरेलू उपभोग के लिए होता है।

भारत की भूजल संसाधन मूल्यांकन रिपोर्ट-2025 के अनुसार, भूजल का कुल वार्षिक पुनर्भरण 448.52 बीसीएम है, जिसमें 407.75 बीसीएम निकालने योग्य हैं। वर्ष 2025 में कुल निकासी 247.22 बीसीएम रही, जिससे भूजल निकलने का स्तर 60.63 प्रतिशत हो गया। देश में 75 प्रतिशत से अधिक वर्षा मॉनसून सीजन (जून से सितंबर) के दौरान होती है, जो तीव्र मौसमी असंतुलन का कारण बनती है। यही वर्षा भूजल पुनर्भरण का प्राथमिक स्रोत भी है।

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First Published - April 16, 2026 | 10:36 PM IST

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