खांसी के सिरप की बिना पर्चे के बिक्री से जुड़े नियम कायदे कड़े करने का सरकार का कदम ग्रामीण इलाकों में आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी सिरप की मांग बढ़ाने वाला साबित तो सकता है। सरकार ने खांसी के सिरप को अनुसूची ‘के’ से हटाकर ग्रामीण भारत के उन हिस्सों में उनकी ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) या बिना चिकित्सक के पर्चे पर उपलब्धता को सीमित कर दिया है, जहां वे पारंपरिक रूप से ढीले लाइसेंसिंग चैनलों के माध्यम से बेचे जाते थे। इस कदम के बाद इन सिरप तक पहुंच के लिए चिकित्सक का पर्चा और लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी का होना जरूरी हो सकता है जिससे इन बाजारों में खरीद का व्यवहार भी बदल सकता है।
जुलाई 2025-जून 2026 के दौरान देश में आयुर्वेदिक और आयुष दवाओं ने 171 करोड़ रुपये की बिक्री की। फार्मारैक नामक बाजार शोध फर्म के अनुसार अकेले खांसी और जुकाम का अनुमानित बाजार लगभग 6,700 करोड़ रुपये का है। यह दर्शाता है कि यदि मांग आयुष उपचारों की ओर स्थानांतरित होती है तो वृद्धि की बड़ी संभावना मौजूद है।
यह कदम केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के उस निर्णय के बाद आया है जिसमें दवा नियमों की अनुसूची ‘के’ से ‘सिरप’ शब्द को हटाया गया। इस प्रावधान ने कुछ घरेलू उपचारों को बिना औपचारिक बिक्री लाइसेंस के उन गांवों में बेचने की अनुमति दी थी जिनकी आबादी 1,000 से कम थी और जहां आसपास कोई लाइसेंस प्राप्त विक्रेता उपलब्ध नहीं था। अब खांसी का सिरप खरीदने के लिए पर्चा आवश्यक होगा। सरकार ने कहा कि यह संशोधन नियामक निगरानी को मजबूत करने और छूट ढांचे को वर्तमान सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए है।
दिल्ली की एक फार्मा कंपनी के एक अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘शुरुआती बदलाव उन उत्पादों की ओर हो सकता है जो अधिक आसानी से उपलब्ध रहते हैं। जिनमें आयुष सिरप भी शामिल हैं विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य पेशेवरों की पहुंच सीमित है।’ फार्मारैक के वाइस प्रेसिडेंट शीतल सापले ने कहा कि ग्रामीण बाजार खांसी के सिरप के बड़े उपभोक्ता हैं। इनमें भी विदर्भ, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड अहम बाजार हैं।
यह परिवर्तन देश के ग्रामीण इलाकों में चुनौतियां पैदा कर सकता है जहां प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का करीब 75 फीसदी ग्रामीण चिकित्सकों (आरएमपी) या अप्रमाणित केमिस्टों द्वारा संभाला जाता है जो अक्सर बिना जांच किए सामान्य खांसी और जुकाम के लिए सिरप लिख देते हैं।
टीमलीज रेगटेक के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यपालक अधिकारी ऋषि अग्रवाल ने कहा, ‘इसका प्रभाव असमान होगा और यह इस पर निर्भर करेगा कि दवा खुद खरीदी जा रही है या चिकित्सक के कहने पर। महानगरों में चिकित्सक का पर्चा प्राप्त करना आसान हो सकता है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में योग्य डॉक्टरों तक पहुंच सीमित हो सकती है। यदि किसी का बच्चा रात में खांस रहा है तो वे संभवतः शेल्फ से आसानी से उपलब्ध समाधान चुनेंगे। उस शेल्फ पर अब भी आयुष सिरप मौजूद हैं। एएसयू उत्पादों को अलग से ड्रग्स ऐक्ट के अध्याय चार ए और अनुसूची टी के तहत विनियमित किया जाता है और यह संशोधन उन पर लागू नहीं होता।’
यह लोकप्रिय आयुर्वेदिक खांसी की दवाओं जैसे हनीटस (डाबर इंडिया), कफलेट (हिमालय वेलनेस), तुलसी कफ सिरप (झंडू, इमामी का हिस्सा) और अन्य क्षेत्रीय ब्रांडों को लाभ पहुंचा सकता है, जो किराना दुकानों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिना पर्चे के बेचे जाते हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि खंडित ग्रामीण वितरण नेटवर्क अक्सर निम्न-आय वाले परिवारों को सस्ते, स्थानीय रूप से उपलब्ध उपचारों की ओर धकेलते हैं, जिन्हें पास-पड़ोस के चिकित्सक सुझाते हैं। सिरप से हुई मौतों के बाद उठाया गया कदम अक्टूबर 2025 में मध्य प्रदेश में खांसी के सिरप से हुई मौतों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को अलर्ट जारी करने पर मजबूर किया। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में कम से कम 22 बच्चों की मौत उन सिरपों के सेवन से हुई जिनमें औद्योगिक रसायनों एथिलीन ग्लाइकोल (ईजी) और डायएथिलीन ग्लाइकोल (डीईजी) की मिलावट थी।
वरिष्ठ स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि यह संशोधन कुछ समय से विचाराधीन था। इसके लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की दवा परामर्श समिति (डीसीसी) ने सिफारिश की थी। 17 नवंबर 2025 को हुई डीसीसी बैठक की कार्यवाही में कहा गया, ‘डीसीसी को खांसी के मिलावटी सिरप से संबंधित हाल की घटनाओं के बारे में अवगत कराया गया और प्रस्ताव रखा गया कि दवा नियम, 1945 की अनुसूची ‘के’ की प्रविष्टि संख्या 13 के तहत खांसी के सिरप को दी गई छूट को हटाया जाए।’
जानकारों के मुताबिक अनुसूची के तहत आने वाली दवाएं ढीली लाइसेंसिंग और निगरानी आवश्यकताओं के अधीन होती हैं। एक नियामक अधिकारी ने कहा, ‘वर्षों से अधिकारियों ने देखा कि कई औषधीय सिरप, विशेषकर खांसी और जुकाम की दवाओं का दुरुपयोग या अवैध बिक्री हो रही थी।’
उद्योग जगत के एक व्यक्ति ने कहा, ‘सिर्फ सिरप हटाए जाने के बाद भी खांसी और जुकाम के लिए गोलियां और टैबलेट ओटीसी दुकानों पर बिना औपचारिक बिक्री लाइसेंस के उपलब्ध रहेंगे। चिकित्सकों का कहना है कि आयुष सिरप भी अंततः प्रिस्क्रिप्शन व्यवस्था के दायरे में आ सकते हैं क्योंकि उनका चिकित्सीय उपयोग होता है। मुंबई के सैफी अस्पताल के पल्मोनोलॉजिस्ट अभिजित आहूजा ने कहा, ‘ऐसी दवाओं की भी एक निश्चित खुराक और समय-निर्भर उपयोग होता है। हमें इस बात से अवगत रहना चाहिए क्योंकि किसी समय इन्हें भी प्रिस्क्रिप्शन की आवश्यकता होगी।’
मेदांता गुरुग्राम में बाल पल्मोनोलॉजी और बाल चिकित्सा देखभाल के निदेशक राजीव उत्तम ने कहा कि बड़ा उद्देश्य स्व-चिकित्सा को हतोत्साहित करना और उचित निदान को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा, ‘सिर्फ एक सिरप श्रेणी से दूसरी में जाना खांसी के मूल कारण का समाधान नहीं करता है जो मामूली वायरल संक्रमण से लेकर अस्थमा, क्षय रोग, रिफ्लक्स रोग या अन्य गंभीर बीमारियों तक हो सकता है।’ चिकित्सकों ने यह भी कहा कि यह कदम प्रतिकूल घटनाओं या उत्पाद वापसी से जुड़ी जांच के दौरान दवा के स्रोत तक पहुंचने में सुधार कर सकता है।