राजधानी दिल्ली में इस साल 11 मार्च को अधिकतम तापमान 36.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था और यह पिछले 50 साल में मार्च का सबसे गर्म दिन बन गया। तापमान में ऐसी बढ़ोतरी ने खतरे की घंटी बजा दी और इशारा किया कि इस बार गर्मी जल्दी आ सकती है।
हालांकि उस दिन से अभी तक तापमान में गिरावट आई है मगर साल के शुरुआती महीनों में ही पारे का इतनी तेजी से चढ़ना अच्छा संकेत नहीं है। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि अल नीनो की जल्दी शुरुआत के कारण 2026 में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून भी कमजोर रह सकता है। इसका मतलब है कि भारत को इस साल लंबी और ज्यादा भीषण गर्मी के लिए तैयार रहना चाहिए, जिसमें ज्यादा तेज और लगातार लू चलती रहेगी।
स्काईमेट वेदर सर्विसेज के उपाध्यक्ष (मौसम विज्ञान और जलवायु परिवर्तन) महेश पलावत ने कहा, ‘हिमालय क्षेत्र में मॉनसून से पहले की हलचल के कारण तापमान में अचानक आई तेजी अभी भले ही कम हो गई हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अप्रैल और मई में तापमान सुहावना बना रहेगा। हमारे हिसाब से इस साल भीषण गर्मी पड़ने वाली है।’ सरकारी भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने भी अपने हालिया पूर्वानुमान में कहा है कि 2026 में मई तक दक्षिण प्रायद्वीपीय हिस्सों तथा मध्य और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों को छोड़कर देश के अधिकतर हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान ‘सामान्य से अधिक’ रहने की संभावना है।
मार्च के शुरुआती दिनों के बाद भीषण गर्मी से राहत बेशक मिल गई मगर अप्रैल और मई में एक बार फिर भीषण गर्मी पड़ने की आशंका है। अल नीनो के कारण दक्षिण-पश्चिम मॉनसून देर से आया अनियमित रहा तो लंबी और भीषण गर्मी खरीफ फसलों की बोआई पर असर डाल सकती है, जो आम तौर पर मॉनसून के आगमन के साथ जून में शुरू होती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि पिछले कुछ साल में भारत में सिंचाई का दायरा काफी हद तक बढ़ गया है मगर कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा अब भी मॉनसून की अनिश्चितता से प्रभावित होता है।
खरीफ ऋतु में अनियमित मॉनसून से तिलहन और दलहन फसलें मुख्य रूप से प्रभावित होती हैं क्योंकि इनकी खेती ज्यादातर उसी जमीन पर होती है, जहां सिंचाई बारिश के भरोसे रहती है। पश्चिम एशिया संकट के कारण फसलों के प्रमुख तत्त्वों की आपूर्ति पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे हालात ज्यादा पेचीदा बनते दिख रहे हैं।
अध्ययनों से पता चलता है कि मार्च में गर्मी बढ़ना केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। दिल्ली की सलाहकार फर्म क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि मार्च में हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में लू या भीषण लू की स्थिति बनी रही, जहां दिन का अधिकतम तापमान सामान्य की तुलना में 5.1 से 8 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। महाराष्ट्र के विदर्भ में भी लू की स्थिति बनी रही, जहां तापमान सामान्य से 3.1 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में दिसंबर में शुरू होने वाला ला-नीना ठंडा करता है मगर इस बार जलवायु परिवर्तन ने उसका असर कम कर दिया, जिससे उत्तर भारत में सर्दी जल्दी खत्म हो गई। जलवायु परिवर्तन के कारण ही लू समय से पहले चलने लगी है और भारत में सर्दियों की अवधि भी कम हो गई है। क्लाइमेट ट्रेंड्स ने कहा, ‘आम तौर पर दुनिया का तापमान कम करने वाले ला नीना पिछले साल था मगर ग्लोबल वार्मिंग मौसम के लंबे अरसे से चले आ रहे मिजाज को बदल रही है।’
यह पहला मौका नहीं है, जब ग्लोबल वार्मिंग ला नीना पर भारी पड़ी हो। पूरे भारत में 2025 में जमीनी सतह का आसत वार्षिक तापमान 1991 से 2020 के बीच के औसत से 0.28 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। इसीलिए ला नीना सक्रिय होने के बाद भी यह 1901 के बाद से आठवां सबसे गर्म साल बन गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 से अब तक कुल चार साल में ला नीना की स्थिति रही है और 2024 ऐसा आखिरी साल था। आम हालात में ला नीना वैश्विक तापमान को नीचे ले आया मगर ग्रीनहाउस गैसों का लगातार उत्सर्जन तापमान को बढ़ाता रहा और ला नीना वाले ये सभी साल अब तक के सबसे गर्म सालों में शुमार हो गए।
वैज्ञानिकों के अनुसार 2026 में ला नीना के कारण आई ठंडक बहुत कम समय रही और वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के रिकॉर्ड स्तर के कारण लंबे समय तक रहने वाली गर्मी को कम नहीं कर पाई। जलवायु रुझानों से समझ आया कि जलवायु परिवर्तन जैसे-जैसे वैश्विक तापमान को बढ़ा रहा है, ला नीना और अल नीनो जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्रों की विश्वसनीयता कम होती जा रही है, जिससे मौसम अप्रत्याशित होता जा रहा है।
मार्च की शुरुआत में भीषण गर्मी कोई पहली बार नहीं है। लू के थपेड़े अब पहले से ज्यादा व्यापक होते जा रहे हैं। नई दिल्ली की संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरनमेंट ऐंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के 2025 के अध्ययन में कहा गया है कि भारत के लगभग 57 फीसदी जिले बहुत भीषण गर्मी के खतरे में हैं और देश की 76 फीसदी आबादी वहीं रहती है। अध्ययन में पाया गया कि भारत के 734 जिलों में से 417 जिले उच्च और अत्यधिक उच्च जोखिम वाली श्रेणियों में आते हैं।
इनमें 151 उच्च जोखिम और 266 अत्यधिक उच्च जोखिम वाली श्रेणी में हैं। इनके बाद 201 जिले मध्यम श्रेणी में थे और 116 जिले निम्न या अत्यंत निम्न श्रेणी में थे। मगर सीईईडब्ल्यू के अनुसार इसका मतलब यह नहीं है कि इन जिलों में गर्मी का खतरा नहीं है।
खतरा है मगर दूसरे जिलों की तुलना में कम है। इस अध्ययन में दिल्ली, महाराष्ट्र, गोवा, केरल, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को गर्मी के सबसे ज्यादा खतरे वाले 10 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की सूची में रखा है। सीईईडब्ल्यू ने चेतावनी दी है कि रोजमर्रा की जिंदगी के कई पहलुओं पर गर्मी का असर पहले ही पड़ रहा है।
इससे जन स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है, फसलें क्षतिग्रस्त हो रही हैं, जल संसाधन कम हो रहे हैं और मनुष्यों, पशुधन तथा कृषि की उत्पादकता घट रही है। गर्मी के तनाव से भारत में 2030 तक 3.5 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियां खत्म हो सकती हैं और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 4.5 फीसदी गिरावट आ सकती है।
अध्ययनों से पता चलता है कि प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, समन्वित प्रतिक्रिया रणनीतियों और जन जागरूकता पर बढ़ते जोर के साथ पिछले एक दशक में भारत की लू से निपटने की तैयारी काफी बेहतर हुई है मगर आदर्श स्थिति अभी काफी दूर है। अब मौसम विभाग लू की भविष्यवाणी और चेतावनी जारी करता है, जिससे राज्य सरकारों को समय पर उपाय शुरू करने में मदद मिलती है।
यह बदलाव आंशिक रूप से राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा प्रेरित है, जिसने 2016 में लू प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी किए थे। तब से भारत ने हीट ऐक्शन प्लान (एचएपी) को तेजी से अपनाया है और सरकारी आंकड़ों के अनुसार तेज गर्मी की आशंका वाले 23 राज्यों के 250 से अधिक शहरों और जिलों ने परिचालन योजनाओं की रिपोर्ट अब दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें से कई उपाय छोटे स्तर पर अपनाए गए हैं या बहुत खराब तरीके से अपनाए गए हैं। किंग्स कॉलेज लंदन के जलवायु शोधकर्ता आदित्य वलियातन पिल्लई ने कहा कि लू पर प्रतिक्रियाएं राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर किए गए आपातकालीन उपायों पर आधारित होती हैं। एचएपी में अक्सर दीर्घकालिक उपाय शामिल होते हैं, जिन्हें अभी तक संस्थागत रूप नहीं दिया गया है।
पिल्लई ने कहा, ‘ऊपर से आने वाले निर्देश आपातकालीन उपायों को बढ़ावा देते हैं, जो जरूरी तो हैं मगर नीति पर उनका प्रभाव कम ही दिखाई देता है।’ उन्होंने कहा कि उच्च स्तर के अधिकारी लू की समस्या से अवगत हैं, लेकिन उपायों को लागू करने वाले सरकारी कर्मचारियों को इसका कम ही पता है।
उन्होंने कहा, ‘एचएपी नई बात है, जो शहरी स्थानीय निकायों और पंचायतों में अभी जड़ जमा ही रही है। यह अभी किशोरावस्था में है, लेकिन खतरा इतना फैल गया है कि इसे तेजी से बड़ा होना पड़ेगा।’ योजना में मौजूद बुनियादी कमियों से ये उपाय ज्यादा कारगर नहीं रह जाते। नई दिल्ली के सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) ने ऐसे 37 कार्यक्रमों की समीक्षा की तो पता चला कि केवल दो में जोखिम का प्रभाव ठीक से आंका गया था। इससे उच्च जोखिम वाली आबादी की ठीक से पहचानने और उनके लिए काम करने की अधिकारियों की क्षमता कम हो जाती है।
कामकाज में होने वाली गर्मी का अध्ययन करने वाले एक विशेषज्ञ ने कहा, ‘व्यावसायिक ताप संरक्षण योजनाओं में बुजुर्गों, बाहर से आए कामगारों और गर्भवती महिलाओं को गिन लिया जाता है मगर यह नहीं देखा जाता कि ऐसी आबादी कहां ज्यादा रहती है और उसे बचाने के लिए क्या खास उपाय किए जाएं।’
सीईईडब्ल्यू के अनुसार भारत की भीषण गर्मी से निपटने की प्राथमिक रणनीति एचएपी के जरिये है मगर इन्हें और मजबूत करने की आवश्यकता है क्योंकि 95 फीसदी एचएपी में गर्मी के जोखिमों और कमजोरियों का विस्तृत आकलन नहीं है। सीईईडब्ल्यू ने कहा, ‘इस कमी के कारण अधिकारियों के लिए उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करना और उन्हें प्राथमिकता देना तथा वित्त को कारगर तरीके से लगाना चुनौती बन जाता है।’
अत्यधिक गर्मी और जलवायु अनुकूलन पर काम करने वाले एक गैर-लाभकारी मंच ‘हीट वॉच’ की संस्थापक अपेक्षिता वार्ष्णेय ने कहा कि भारत के भीषण गर्मी के संकट का वास्तविक प्रभाव अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले उन समुदायों पर पड़ता है, जिनके पास इसकी शिकायत करने का कोई मंच नहीं है। उन्होंने कहा, ‘गर्मी कुछ लोगों के लिए जानलेवा है और दूसरों के लिए केवल असहनीय है।’
राष्ट्रीय स्तर पर 16वें वित्त आयोग ने लू को आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के अंतर्गत आने वाली 13वीं आपदा के रूप में शामिल करने की सिफारिश की है। पिल्लई ने कहा, ‘(यह) अधिसूचना लू को किसी भी अन्य आपदा के समान वैधता और महत्त्व देती है और जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही बढ़ाती है।’ उन्होंने कहा कि 11 राज्यों ने इसे आपदा के रूप में अधिसूचित किया है। इससे वे इसके लिए राज्य आपदा राहत कोष का 10 फीसदी उपयोग कर सकते हैं, जो अन्य राज्य-अधिसूचित आपदाओं के लिए भी जाता है।
सीपीआर विश्लेषण में पाया गया कि 37 योजनाओं में से केवल तीन में ही वित्तपोषण स्रोतों की स्पष्ट रूप से पहचान की गई थी, जिससे पता चलता है कि आपदाओं के लिए अलग से धन और संसाधन नहीं लगाए जा रहे। वार्ष्णेय मानती हैं कि राज्य स्तर पर मान्यता मिलना सार्थक तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, ‘जब तक हमारे पास केंद्रीय अधिसूचना, अलग बजट और खर्च की सूचना देना अनिवार्य नहीं किया जाता तब तक जवाबदेही अधूरी रहेगी।’
उन्होंने उष्मा प्रबंधन के लिए गर्मी करने वालों की अधिक जिम्मेदारी (ईपीआर) पर ज्यादा गंभीर चर्चा की मांग की। ईपीआर के मुताबिक व्यावसायिक गतिविधियों के कारण उष्मा का उत्पादन कम करने की जिम्मेदारी उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों की है। उन्होंने कहा कि ‘जो प्रदूषण फैलाएगा वही कीमत चुकाएगा’ का सिद्धांत यहां भी लागू होना चाहिए। अनुकूलन के लिए आर्थिक सहायता और गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए जरूरी संसाधन उन्हीं लोगों से आने चाहिए, जिनके कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संकट सबसे ज्यादा बढ़ा है। लू की घटनाएं और उनकी तीव्रता जिस तरह बढ़ रही है उसे देखते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि तैयारी के अगले चरण में आपातकालीन प्रतिक्रिया से आगे बढ़ना होगा। इसके लिए श्रम, स्वास्थ्य, शहरी विकास और आपदा प्रबंधन विभागों के बीच मजबूत समन्वय की आवश्यकता होगी, जिसके लिए अलग से धन की व्यवस्था और दीर्घकालिक शमन योजना आवश्यक होगी।