वित्त पर बनी संसद की स्थायी समिति ने अपनी 32वीं रिपोर्ट में कहा कि वित्त मंत्रालय को एक ऐसी राजस्व व्यवस्था बनानी चाहिए , जिससे सरकारी खजाने पर लगातार दबाव डाले बिना यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) वित्तीय सततता हासिल कर सके।
गुरुवार को संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया, ‘हालांकि 3 साल की प्रस्तावित योजना और कैशबैक की व्यवस्था मझोले और छोटे शहरों में डिजिटल भुगतान को लोकतांत्रिक बनाने के लिए जरूरी है, जहां इसकी पहुंच नहीं हुई है। लेकिन वित्तीयसेवा विभाग को एक आत्मनिर्भर राजस्व मॉडल तलाशने की जरूरत है।’
समिति ने कहा कि यूपीआई से हर महीने 150 अरब लेनदेन होने और 60 करोड़ नए यूजर जुड़ने की उम्मीद है, लेकिन मौजूदा सरकारी प्रोत्साहन इस उद्योग की असल लागत का सिर्फ 11 प्रतिशत और संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) संग्रह का सिर्फ 14 प्रतिशत है।
इसकी वजह से एक ढांचागत वित्तपोषण अंतर बनता है और दीर्घावधि के हिसाब से बुनियादी ढांचे पर निवेश पर इसका असर पड़ेगा। समिति ने कहा कि सरकार सुनिश्चित करे कि तेजी से पूंजी बढ़ाने, संभावित बड़े विलय और विदेशी निवेश की कोशिशों से सरकारी बैंकों के जरूरी काम कमजोर न पड़ें, जिसमें प्राथमिकता वाले क्षेत्र को कर्ज देना और कम लाभ वाली ग्रामीण शाखाओं की सेवा प्रदान करना शामिल है।