कोविड महामारी से पहले की तुलना में अब देश की विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियां अपने कर्मचारियों को उत्पादित माल के मूल्य के मुकाबले कम वेतन दे रही हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2018-19 में जहां कर्मचारियों को उत्पादन (बिक्री और स्टॉक या भंडार में बदलाव) का 5.16 फीसदी हिस्सा वेतन के रूप में मिलता था वहीं वित्त वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा घटकर 4.97 फीसदी रह गया है।
यह रुझान इस लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में नोएडा में वेतन को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए और हजारों ठेका मजदूर सड़कों पर उतर आए। इससे पहले मानेसर में इसी तरह के मुद्दों पर हुए आंदोलन के कारण न्यूनतम मजदूरी में 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 1991 में, मजदूरी वास्तव में बिक्री और स्टॉक में बदलाव के 7 फीसदी से अधिक थी, जो श्रम भुगतान के लिए इस मापदंड में एक दीर्घकालिक गिरावट के संकेत देता है।
यह गिरावट सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध दोनों तरह की कंपनियों में देखी गई है और वित्त वर्ष 2019 के बाद से दोनों में यह कमी आई है। यह आंकड़े 10 साल पहले की तुलना में थोड़े अधिक हैं। बढ़ती महंगाई के कारण रहने की लागत बढ़ने और खासकर ईरान युद्ध के बाद रसोई गैस की कीमतों में हुई वृद्धि के चलते, कर्मचारी अब उच्च वेतन की मांग को लेकर आवाज उठा रहे हैं।
हालिया आर्थिक समीक्षा 2024-25 ने भी इस ओर इशारा किया था कि वित्त वर्ष 2024 में कंपनियों के मुनाफे में पिछले 15 साल में सबसे बड़ी उछाल आई है जबकि कर्मचारियों के वेतन में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। सर्वेक्षण में कहा गया, ‘भले ही सकल मूल्य वर्धित में श्रम की हिस्सेदारी थोड़ी बढ़ी हो लेकिन कंपनियों के मुनाफे में, खासकर बड़ी कंपनियों में असमान वृद्धि ही वास्तव में आय असमानता के मोर्चे पर चिंता बढ़ाती है। मुनाफे का अधिक हिस्सा और वेतन वृद्धि में ठहराव का जोखिम, मांग कम करके अर्थव्यवस्था को धीमा कर सकता है।’
सीएमआईई के आंकड़े मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों को कवर करते हैं। इसका कहना है कि वित्त वर्ष 2019 से वित्त वर्ष 2025 के बीच कर्मचारियों का मुआवजा 52 फीसदी बढ़ा जबकि कर चुकाने के बाद लाभ में 149 फीसदी की भारी वृद्धि हुई।
उद्योगों के सालाना सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार भारत की संगठित विनिर्माण कंपनियों में कुल श्रमिकों में अनुबंध श्रमिकों की हिस्सेदारी 42 फीसदी तक पहुंच गई है, जो पिछले 25 वर्षों में सबसे अधिक है।
फरीदाबाद और नोएडा में छोटे और मध्यम उद्यमों के श्रमिकों ने वेतन वृद्धि की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया है क्योंकि उनकी जीवनयापन की लागत बढ़ गई है। यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ (ब्रिटेन) के विजिटिंग प्रोफेसर, संतोष मेहरोत्रा ने कहा, ‘वास्तविक अर्थों में वेतन स्थिर रहने के कारण परेशानी बढ़ी है। संकट का मुख्य कारण एलपीजी की बढ़ी कीमतें हैं।’
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया कि कई कंपनियां वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं का हिस्सा हैं, जिसके कारण उन्हें प्रतिस्पर्धी बने रहना पड़ता है ऐसे में अपनी लागत से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए श्रमिकों के मोर्चे पर ही कटौती करने को तरजीह देती हैं।