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FOMO का असर: चांदी की तेजी में फंसे भारतीय निवेशक, 4.6 अरब डॉलर की हुई बड़ी गलती

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भारतीय खुदरा निवेशकों ने चांदी की तेजी का पीछा करते हुए ऊंचे स्तर पर बड़ी खरीदारी की, जबकि वैश्विक संस्थागत निवेशकों ने उसी समय मुनाफा वसूली कर ली

Last Updated- March 16, 2026 | 9:17 PM IST
Silver
फोटो: एआई जनरेटेड

ग्लोबल मार्केट में चांदी पिछले कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली कमोडिटी में से एक बन गई। लेकिन इसकी तेजी के पीछे निवेशकों के व्यवहार की एक दिलचस्प कहानी भी छिपी है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय खुदरा निवेशकों (Indian retail investors) ने चांदी की तेजी का पीछा करते हुए ऊंचे स्तर पर बड़ी खरीदारी की, जबकि वैश्विक संस्थागत निवेशकों (global institutional players) ने उसी समय मुनाफा वसूली कर ली। इस कारण से भारतीय खुदरा निवेशकों को 4.6 अरब डॉलर की भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ा है।

Vallum Capital Research के मुताबिक, जनवरी 2022 से फरवरी 2026 के बीच चांदी की कीमत करीब 24 डॉलर प्रति औंस से बढ़कर 120 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। यानी करीब 400 फीसदी की जबरदस्त तेजी। इस दौरान सिल्वर ईटीएफ (Silver ETFs) में निवेश के आंकड़ों के अंदर एक और अहम कहानी छिपी है। यह कहानी सही समय पर निवेश, निवेशकों की साइकोलॉजी और समझदार निवेश तथा जल्दबाजी में किए गए निवेश के बीच के अंतर को दिखाती है। रिपोर्ट में सिल्वर ETF में इनफ्लो को चार अलग-अलग चरणों में बांटकर समझाया गया है।

जब दुनिया चांदी बेच रही थी, तब भारत खरीद रहा था

जनवरी 2022 से फरवरी 2025 के बीच करीब तीन साल तक वैश्विक संस्थागत निवेशक सिल्वर ETF से धीरे-धीरे पैसा निकालते रहे। इस दौरान उन्होंने कुल मिलाकर लगभग 4.05 अरब डॉलर निकाल लिए। हर महीने औसतन करीब 107 मिलियन डॉलर का आउटफ्लो हुआ। उस समय चांदी उन्हें ज्यादा आकर्षक निवेश नहीं लग रही थी। वहीं भारतीय खुदरा निवेशकों की दिलचस्पी चांदी में बढ़ने लगी। इसी अवधि में उन्होंने लगभग 1.57 अरब डॉलर का निवेश किया। यानी हर महीने औसतन करीब 41 मिलियन डॉलर का निवेश आया।

सीधे-सीधे कहें तो उस समय भारतीय निवेशक वही खरीद रहे थे, जिसे दुनिया बेच रही थी। रिपोर्ट में कहा गया कि देखा जाए तो उनका फैसला गलत नहीं था, लेकिन उन्होंने निवेश थोड़ा जल्दी कर दिया।

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एक समय ऐसा भी आया जब सभी निवेशक चांदी खरीद रहे थे

मार्च से अगस्त 2025 के बीच एक दिलचस्प स्थिति बनी। इस दौरान चांदी की कीमत 33 डॉलर से बढ़कर 39 डॉलर तक पहुंची और वैश्विक निवेशक भी फिर से खरीदारी करने लगे।

इस छह महीने के दौरान वैश्विक फंड्स ने करीब 4.85 अरब डॉलर का निवेश किया, जबकि भारतीय निवेशकों का निवेश भी तेजी से बढ़कर करीब 206 मिलियन डॉलर प्रति माह तक पहुंच गया। उस समय दोनों ही निवेशक चांदी को लेकर बुलिश थे। हालांकि अंतर यह था कि ग्लोबल फंड्स के पास एक तय रणनीति थी, जबकि भारतीय निवेशक तेजी की रफ्तार देखकर निवेश कर रहे थे।

तेजी के शिखर पर भारतीय निवेशकों की भारी खरीदारी

सितंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच चांदी की कीमत में जबरदस्त उछाल आया। इस दौरान कीमत 42.5 डॉलर से बढ़कर 120 डॉलर तक पहुंच गई। यानी 182% की छलांग।

लेकिन यहीं से कहानी बदल गई। वैश्विक संस्थागत निवेशकों ने इस तेजी का फायदा उठाते हुए करीब 3.55 अरब डॉलर की बिकवाली कर दी। वहीं भारतीय निवेशकों ने इसी समय सबसे ज्यादा खरीदारी की और करीब 4.6 अरब डॉलर का निवेश कर दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक यह स्थिति “FOMO” यानी तेजी छूट जाने के डर का उदाहरण है, जब निवेशक केवल कीमत बढ़ने की वजह से खरीदारी करने लगते हैं।

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गिरावट आते ही घबराकर बिकवाली

फरवरी 2026 में चांदी की कीमत गिरकर करीब 81.58 डॉलर प्रति औंस पर आ गई। इस गिरावट के दौरान भारतीय निवेशकों ने घबराकर करीब 100 मिलियन डॉलर की बिकवाली कर दी।

वहीं ग्लोबल फंड्स ने इस गिरावट को अवसर मानते हुए करीब 1.78 अरब डॉलर की खरीदारी कर ली। यानी संस्थागत निवेशकों ने ऊंचे स्तर पर बेचा और गिरावट में खरीदा, जबकि भारतीय खुदरा निवेशकों ने उल्टा किया। यह निवेश में सबसे पुराना और सबसे दर्दनाक गलती है।

क्या है निवेशकों के लिए सबक?

रिपोर्ट का कहना है कि यह कहानी सिर्फ चांदी की नहीं है, बल्कि निवेश के मनोविज्ञान की है। बाजार में अक्सर ऐसा होता है कि अनुभवी निवेशक सही समय पर रणनीति बदल लेते हैं, जबकि खुदरा निवेशक देर से प्रतिक्रिया देते हैं। इसलिए निवेश में धैर्य, जानकारी और अनुशासन बेहद जरूरी है। बाजार में सबसे अच्छे मौके अक्सर वही होते हैं, जिन पर ज्यादा शोर नहीं होता।

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First Published - March 16, 2026 | 7:19 PM IST

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