मई में शेयर बाजार में कमजोरी का असर म्युचुअल फंड निवेश पर भी दिखा। इक्विटी और हाइब्रिड फंडों में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ गई, लेकिन एसआईपी के जरिए निवेश लगातार मजबूत बना रहा। ऐसे माहौल में निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या बाजार की मौजूदा अनिश्चितता के बीच निवेश जारी रखना चाहिए या इंतजार करना बेहतर होगा।
म्युचुअल फंड उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव को देखकर निवेश रोकने के बजाय निवेशकों को अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि बाजार की गिरावट अक्सर लंबे समय के निवेशकों के लिए अवसर लेकर आती है।
पीजीआईएम इंडिया म्युचुअल फंड के CEO अभिषेक तिवारी का कहना है कि मौजूदा अस्थिर बाजार एसआईपी निवेशकों के लिए अच्छा मौका है। जब बाजार में गिरावट आती है तो निवेशकों को कम कीमत पर ज्यादा यूनिट्स मिलती हैं। इससे समय के साथ खरीद की औसत लागत कम होती है और लंबे समय में बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
उनका कहना है कि निवेशकों को बाजार के छोटे-छोटे उतार-चढ़ाव की बजाय लंबे समय तक निवेश में बने रहने पर ध्यान देना चाहिए। तिवारी के मुताबिक, निवेश की निरंतरता ही सफल निवेश की सबसे बड़ी कुंजी है।
अभिषेक तिवारी ने कंपनी के आईसीआरए एमएफआईई के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी निवेशक ने 2001 में निवेश किया होता और दिसंबर 2025 तक निवेश बनाए रखा होता, तो उसे करीब 17.33 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न मिलता। लेकिन अगर वह इस दौरान बाजार के सबसे अच्छे 50 कारोबारी दिनों से चूक जाता, तो उसका रिटर्न घटकर सिर्फ 4.74 प्रतिशत रह जाता।
उनके मुताबिक यह आंकड़ा दिखाता है कि बाजार में सही समय पकड़ने की कोशिश अक्सर नुकसानदायक साबित हो सकती है। इसलिए निवेशकों को बाजार की टाइमिंग करने के बजाय लंबे समय तक निवेश में बने रहने की रणनीति अपनानी चाहिए।
| वर्ष/अवधि | सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न (CAGR) |
|---|---|
| 2008-2010 | -1.5% |
| 2011-2013 | 1% |
| 2014-2016 | 13.6% |
| 2017-2019 | 13.7% |
| 2020-2022 | 17.5% |
तिवारी ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि यदि किसी निवेशक ने जनवरी 2008 में, यानी वैश्विक वित्तीय संकट के समय बाजार के उच्च स्तर पर 15 साल की एसआईपी शुरू की होती, तो शुरुआती कई वर्षों तक उसे खास रिटर्न नहीं मिलता।
2008 से 2010 के बीच निवेश पर नकारात्मक रिटर्न रहा, जबकि 2011 से 2013 के दौरान भी बढ़त बहुत सीमित रही। हालांकि बाद के वर्षों में बाजार में तेजी आने से निवेशकों की संपत्ति तेजी से बढ़ी। अंतिम छह वर्षों में कुल लक्ष्य का बड़ा हिस्सा हासिल हुआ और आखिरी तीन वर्षों में निवेश लगभग दोगुना हो गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह उदाहरण दिखाता है कि संपत्ति निर्माण की प्रक्रिया शुरुआत में धीमी हो सकती है, लेकिन समय के साथ चक्रवृद्धि का असर तेजी से दिखने लगता है।
अभिषेक तिवारी का कहना है कि केवल एसआईपी करना ही पर्याप्त नहीं है। निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखनी चाहिए। समय-समय पर मुनाफावसूली और रीबैलेंसिंग भी जरूरी है ताकि किसी एक एसेट क्लास में जरूरत से ज्यादा जोखिम न बढ़े।
उन्होंने कहा कि बाजार में बड़ी गिरावट आने पर निवेश बढ़ाने जैसी रणनीतियां भी लंबी अवधि में फायदेमंद साबित हो सकती हैं। जिन निवेशकों को यह सब खुद करना मुश्किल लगता है, उन्हें वित्तीय सलाहकार की मदद लेने पर विचार करना चाहिए।
बड़ौदा बीएनपी परिबा म्युचुअल फंड के MD और CEO संजय ग्रोवर का कहना है कि पिछले करीब 20 महीनों में बाजार में कई बार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। इसके बावजूद निवेशकों को एसआईपी जारी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन लोगों की आय और बचत करने की क्षमता बढ़ी है, वे अपनी मौजूदा एसआईपी में टॉप-अप कर सकते हैं। इसके अलावा नए निवेशक भी इस समय चरणबद्ध तरीके से निवेश शुरू करने पर विचार कर सकते हैं।
ग्रोवर के मुताबिक निवेश का फैसला हमेशा व्यक्ति के वित्तीय लक्ष्यों, निवेश अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता को ध्यान में रखकर करना चाहिए। जो निवेशक कम जोखिम लेना चाहते हैं या जिनकी निवेश अवधि कम है, वे लिक्विड फंड, मनी मार्केट फंड और अन्य डेट फंडों जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प चुन सकते हैं। वहीं जिन निवेशकों का नजरिया लंबी अवधि का है और जो ज्यादा जोखिम उठा सकते हैं, वे इक्विटी, मल्टी-एसेट और हाइब्रिड फंडों में निवेश पर विचार कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में उतार-चढ़ाव हमेशा बना रहेगा। ऐसे में निवेशकों को घबराकर निवेश रोकने या बाजार की दिशा का अनुमान लगाने की कोशिश करने के बजाय अनुशासित तरीके से निवेश जारी रखना चाहिए। एसआईपी इसी अनुशासन को बनाए रखने का एक आसान और प्रभावी तरीका है, जो लंबी अवधि में धन सृजन में मदद कर सकता है।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय एक्सपर्ट की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)