स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड (एसआईएफ) की दुनिया में होड़ और गहराने वाली है। निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी देखते हुए लगभग एक दर्जन फंड कंपनियां इस मैदान में उतरने को तैयार हैं। इस होड़ से निवेशकों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं। क्या एसआईएफ वास्तव में उनकी जरूरतें पूरी करेंगे या नई योजना होने की वजह से कंपनियां इन पर जोर दे रही हैं? क्या ये म्युचुअल फंड से बेहतर विकल्प हैं ज्यादा जोखिम और ज्यादा लचीलेपन वाले साधन हैं? और आखिर में, क्या इनमें आंख मूंदकर पैसा लगा देना चाहिए या अनुभवी निवेशकों के लिए ही ये अच्छे हैं? इन सवालों के जवाब तलाशने से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर एसआईएफ हैं क्या।
एसआईएफ म्युचुअल फंड के भीतर ही एक नई श्रेणी है, जिसमें फंड मैनेजरों को निवेश रणनीति के मामले में ज्यादा छूट मिल जाती है। इन फंडों में कम से कम 10 लाख रुपये का निवेश होता है और ये इक्विटी, डेट अथवा हाइब्रिड हो सकते हैं। एसआईएफ की खास बात यह कि बाजार गिरे चाहे उठे, दोनों सूरत में इनमें मुनाफा कमाने की कोशिश होती है।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के 27 फरवरी 2025 को जारी सर्कुलर के मुताबिक एसआईएफ पारंपरिक म्युचुअल फंड और मोटी रकम वाली पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं (पीएमएस) के बीच आते हैं।
आने वाले हफ्तों में कई बड़ी फंड कंपनियां एसआईएफ बाजार में कदम रखने को तैयार हैं। कोटक म्युचुअल फंड (इनफिनिटी हाइब्रिड लॉन्ग-शॉर्ट फंड), मिरे ऐसेट म्युचुअल फंड (प्लेटिनम हाइब्रिड लॉन्ग शॉर्ट फंड) और एचएसबीसी म्युचुअल फंड (रेडहेक्स हाइब्रिड लॉन्ग शॉर्ट फंड) को पहला एसआईएफ लाने के लिए सेबी से मंजूरी मिल गई है। यूनियन म्युचुअल फंड भी जल्द ही अपना पहला इक्विटी लॉन्ग शॉर्ट फंड ला सकता है।
पहला एसआईएफ सितंबर 2025 में आया था, जो क्वांट म्युचुअल फंड ने पेश किया था। तब से 11 और फंड कंपनियां इस मैदान में उतर चुकी हैं। इस श्रेणी में योजनाओं की कुल संख्या 31 मार्च 2026 तक 14 थी। इस श्रेणी में कुल 44,573 फोलियो हैं। और पिछले महीने तक एसआईएफ 10,620 करोड़ रुपये से ज्यादा संपत्तियां संभाल रहे थे।
पारंपरिक पोर्टफोलियो की दिक्कत यह है कि वे जोखिम को बाजार के बदलते हालात के हिसाब से ठीक से संभाल नहीं पाते। एसआईएफ यहीं काम आ सकते हैं। टाटा ऐसेट मैनेजमेंट में फंड मैनेजर (एसआईएफ) सूरज नंदा कहते हैं, ‘म्युचुअल फंडों में निवेशक आम तौर पर 90 से 100 फीसदी रकम इक्विटी में ही लगाते हैं, बाजार की हालत कैसी भी हो। इसके उलट एसआईएफ में फंड जरूरत के मुताबिक निवेश की मात्रा बदल सकते हैं, जोखिम को हेज कर सकते हैं और शॉर्ट पोजिशन भी ले सकते हैं। इससे निवेशक चढ़ते बाजार में ही नहीं बल्कि हर तरह के बाजार में भागीदारी कर सकते हैं।’
वह यह भी कहते हैं कि एसआईएफ को बेचने के लिए ही बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है बल्कि उतार-चढ़ाव से जूझते बाजारों में पोर्टफोलियो प्रबंधन के तरीके में यह बुनियादी बदलाव है, जिससे जोखिम के बाद भी अच्छा रिटर्न मिल सकता है।
एडलवाइस म्युचुअल फंड के प्रेसिडेंट और सेल्स हेड दीपक जैन ने कहा कि अन्य चीजें स्थिर रहें तो एसआईएफ निवेशकों को ज्यादा रिटर्न देते हैं या जोखिम कम रखते हैं।
एसआईएफ पारंपरिक म्युचुअल फंड और मोटी रकम वाली पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवा के बीच पुल का काम करते हैं। जोखिम को मुस्तैदी से संभालने और बदलते बाजार के हिसाब से खुद को ढालने में म्युचुअल फंड की खामियों को भी ये दूर करते हैं।
मिरे ऐसेट में प्रोडक्ट्स, बिजनेस स्ट्रैटजी और इंटरनैशनल बिजनेस के हेड वैभव शाह बताते हैं, ‘पारंपरिक म्युचुअल फंड्स में शॉर्ट पोजिशन लेने की गुंजाइश नहीं थी और एआईएफ महंगी थी, कर अधिक नहीं बचाती थीं और बहुत अधिक निवेश (1 करोड़ रुपये) मांगती थीं।’
शाह ने कहा कि एसआईएफ इस अंतर को पाटते हैं, क्योंकि ये लॉन्ग-शॉर्ट इक्विटी और डायनेमिक एसेट अलोकेशन जैसी अलग-अलग रणनीतियों को विनियमित तथा पारदर्शी व्यवस्था के दायरे में लाते हैं। साथ ही इनमें केवल 10 लाख रुपये से निवेश किया जा सकता है। एएमसी में भी ऐसा ही होता है। नंदा के मुताबिक किसी निवेशक के पास 10 लाख रुपये हों तो एसआईएफ उनके लिए म्युचुअल फंड की उस कमी को पूरा कर सकते हैं जिसमें ऐक्टिव रिस्क मैनेजमेंट और बदलते बाजार हालात के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता शामिल नहीं होती।
म्युचुअल फंड मूल्यांकन की परवाह किए बगैर पूरी तरह निवेश बनाए रखते हैं मगर एसआईएफ में बाजार गिरने पर शेयरों में निवेश कम किया जा सकता है और मूल्यांकन बढ़ने पर बढ़ाया जा सकता है। साथ ही इनमें जरूरत पड़ने पर नेट शॉर्ट (-25% तक) पोजिशन या आर्बिट्राज की रणनीति अपनाई जा सकती है।
आसान शब्दों में कहें तो म्युचुअल फंड बाजार के साथ चलते हैं, जबकि एसआईएफ बाजार की परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं।
एसआईएफ का मकसद लचीले रुख के साथ निवेश का बेहतर नतीजा देना होता है। इनका लक्ष्य फ्लेक्सीकैप की तरह कम उतार-चढ़ाव के साथ रिटर्न हासिल करना होता है, जिसमें निवेश को सक्रियता के साथ संभाला जाता है और लॉन्ग तथा शॉर्ट दोनों रणनीतियां अपनाई जाती हैं।
इनकी असली खासियत उतार-चढ़ाव भरे बाजार में नजर आती है। मसलन जब बाजार में 12 से 14 फीसदी गिरावट आई थी, उस समय इनकी मदद से गिरावट को 4 फीसदी तक रोक दिया गया। हालांकि इनमें जोखिम ज्यादा है और कम से कम 2 से 3 साल के रिकॉर्ड को देखकर ही इनके नतीजे आंकने चाहिए।
नंदा कहते हैं कि एसआईएफ को धनाढ्य भारतीय (एचएनआई) निवेशकों का पैसा लाने वाला पीएमएस जैसा नहीं मानें बल्कि इसे फंड के ढांचे में ज्यादा लचीली रणनीति मानना बेहतर होगा। ये फ्लेक्सीकैप जैसे परिणाम देने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन इनमें जोखिम के बदले उससे बेहतर नतीजा मिलता है।
इनकी खासियत यह है कि बाजार के हालात देखकर ये रणनीति बदल सकते हैं – लॉन्ग, शॉर्ट और आर्बिट्राज। इनका जोर किसी खास पोजिशन पर नहीं बल्कि बाजार के हर चक्र में लचीला रुख अपनाकर लगातार बेहतर नतीजे देने पर होता है।
सबसे पहले निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में मौजूद कमियों को पहचानना चाहिए। शाह कहते हैं, ‘निवेशकों को देखना चाहिए कि किस प्रकार का रिटर्न और जोखिम वे झेल सकते हैं और उसी के हिसाब से बेहतरीन एसआईएफ रणनीति चुननी चाहिए।’ साथ ही उन्हें देखना चाहिए कि इस रणनीति को संभाल रहे फंड प्रबंधक का पिछला प्रदर्शन कैसा रहा है क्योंकि इस श्रेणी में ज्यादातर फंड नए हैं।
एसआईएफ उन निवेशकों के लिए हैं जो समझते हैं कि ये पारंपरिक उत्पादों से अलग ढांचे वाले निवेश साधन हैं। निवेशक को अपने जोखिम और निवेश के हिसाब से चुनने के लिए 7 श्रेणियां मिलती हैं। शाह कहते हैं, ‘ज्यादा जोखिम उठाने वाले निवेशकों के लिए इक्विटी एक्स टॉप 100 लॉन्ग शॉर्ट या इक्विटी लॉन्ग शॉर्ट जैसे विकल्प सही हो सकते हैं और मध्यम जोखिम उठाने वाले हाइब्रिड लॉन्ग-शॉर्ट को बेहतर मान सकते हैं।’ उनके हिसाब से एसआईएफ का प्रमुख लाभ यह भी है कि इनमें डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल कर शेयरों में गिरावट का जोखिम कम किया जा सकता है।
एसआईएफ उन निवेशकों के लिए बेहतर हैं जो केवल चढ़ते बाजार में अच्छे रिटर्न से संतुष्ट रहते हैं या जिनके पास बाजार के अलग-अलग चक्रों का फायदा उठाने के लिए निवेश 2-3 साल लगाए रहने का समय हो या जो बाजार में गिरावट के दौरान पोर्टफोलियो में कम उतार-चढ़ाव चाह रहे हों।
डेरिवेटिव्स में आम तौर पर बहुत जोखिम माना जाता है। सेबी के हालिया अध्ययन में भी पाया गया कि 90 फीसदी से ज्यादा खुदरा डेरिवेटिव कारोबारियों को नुकसान होता है। लेकिन इस आंकड़े से डेरिवेटिव्स के जोखिम नहीं बल्कि सट्टेबाजी के खतरे नजर आते हैं। शाह कहते हैं कि जो डेरिवेटिव्स सट्टेबाज के हाथों नुकसान दिला सकते हैं, वे ही किसी माहिर फंड प्रबंधक के हाथों में जोखिम कम करने का साधन बन सकते हैं। एसआईएफ में यहां डेरिवेटिव्स का उपयोग मुख्य रूप से हेजिंग, सुरक्षा आदि के लिए किया जाता है, सट्टा लगाने के लिए नहीं।