Gold ETF Outflows: भारत में गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (Gold ETFs) से मई महीने में 6.1 करोड़ डॉलर (करीब 582 करोड़ रुपये) की शुद्ध निकासी हुई, जो लगभग 0.4 टन सोने के बराबर है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के आंकड़ों के अनुसार, इससे इन फंड्स की कुल होल्डिंग घटकर 116.3 टन रह गई। यह पिछले एक साल में पहली बार था जब गोल्ड ETF से मासिक आधार पर शुद्ध निकासी दर्ज की गई।
इस बीच, एचडीएफसी एसेट मैनेजमेंट कंपनी (HDFC AMC) ने अपने HDFC Gold ETF Fund of Fund में एकमुश्त निवेश (लंपसम) और स्विच-इन की सीमा तय कर दी है। अब किसी भी पर्मानेंट अकाउंट नंबर (PAN) पर एक कैलेंडर महीने में अधिकतम 10 लाख रुपये तक ही निवेश किया जा सकेगा।
गोल्ड फंड्स ने पिछले एक साल में 57.1 फीसदी का शानदार रिटर्न दिया है। हालांकि पिछले तीन महीनों में इनमें 3.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
निवेशकों ने सोने जैसी सुरक्षित (डिफेंसिव) संपत्तियों से पैसा निकालकर ज्यादा जोखिम वाले एसेट्स में निवेश करना शुरू कर दिया। निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड के कमोडिटी हेड और फंड मैनेजर विक्रम धवन कहते हैं, “जोखिम लेने की धारणा (रिस्क सेंटिमेंट) बेहतर होने और ग्रोथ-ओरिएंटेड सेक्टर्स में अवसर दिखने के कारण निवेशकों ने डिफेंसिव एसेट्स से पैसा निकालकर इक्विटी जैसे जोखिम वाले निवेश विकल्पों में लगाया।”
घरेलू बुलियन बाजार में आयात प्रतिबंधों और सप्लाई संबंधी बाधाओं के कारण फिजिकल सोने की मांग पूरी करने के लिए ETF के पास मौजूद सोने के भंडार का ज्यादा इस्तेमाल किया गया।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ीं। एक्सिस डायरेक्ट की सीनियर रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटी) देवेया गगलानी कहती हैं, “ब्याज दरों में कटौती की बजाय बढ़ोतरी की संभावना बढ़ने और बॉन्ड यील्ड्स में उछाल ने सोने पर दबाव बनाया।” आमतौर पर वास्तविक ब्याज दरें (रियल इंटरेस्ट रेट्स) बढ़ने पर सोना कमजोर प्रदर्शन करता है।
इसके अलावा, सोने की कीमतों में पहले ही काफी तेजी आ चुकी थी। मिरे असेट म्युचुअल फंड के ईटीएफ प्रोडक्ट और फंड मैनेजर सिद्धार्थ श्रीवास्तव कहते हैं, “सोने की कीमतों में आई तेज रैली थमने के बाद निवेशकों ने मुनाफावसूली (प्रॉफिट बुकिंग) की।”
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हालांकि, सोने में लंबी अवधि के निवेश की संभावनाएं अब भी मजबूत बनी हुई हैं। धवन के अनुसार, इसकी सबसे बड़ी वजह दुनिया भर में सरकारों की बढ़ती देनदारियां और लगातार बढ़ता वैश्विक कर्ज है।
इसके अलावा, कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम कर रहे हैं और निवेश को अलग-अलग तरह के एसेट्स में बांट रहे हैं। इस बदलाव से भी लंबे समय में सोने को मजबूती मिलने की उम्मीद है। ऊंची कीमतों के बावजूद दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे हैं, जो इस कीमती धातु के प्रति उनके भरोसे को दर्शाता है।
धवन ने कहा, “2026 की पहली तिमाही में केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की खरीदारी लॉन्ग टर्म एवरेज से ऊपर बनी रही।” इसके अलावा, दुनिया भर में जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितता भी सोने के प्रदर्शन को सहारा दे रही है।
सोने की कीमतों में तेजी के बावजूद कुछ ऐसे फैक्टर हैं जो इसकी आगे की बढ़त को सीमित कर सकते हैं।
सबसे बड़ा और तात्कालिक दबाव आभूषणों की कमजोर मांग से आ रहा है, खासकर भारत में। धवन के अनुसार, रिकॉर्ड ऊंची कीमतों के कारण सोना आम उपभोक्ताओं की पहुंच से दूर होता जा रहा है, जिससे मांग में नरमी आई है।
शेयर बाजार में अचानक बढ़ी अस्थिरता भी सोने से निकासी का कारण बन सकती है। ऐसे समय में निवेशक मार्जिन कॉल पूरी करने या नकदी जुटाने के लिए सोने जैसी लाभ में चल रही एसेट्स को बेच देते हैं।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी सोने की कीमतों पर दबाव डाल सकती है। धवन का कहना है कि ऊंची वास्तविक ब्याज दरें (रियल इंटरेस्ट रेट्स) सोने जैसे ऐसे निवेश की आकर्षण को कम कर देती हैं, जो कोई नियमित आय या ब्याज नहीं देता।
इसके अलावा, अमेरिका में रियल यील्ड में बढ़ोतरी और अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी सोने की कीमतों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
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एक्सपर्ट्स का मानना है कि सोने की कीमतों में तेज उछाल के बाद गोल्ड आधारित निवेश योजनाओं में बढ़ते निवेश (इनफ्लो) को संभालने के लिए HDFC AMC ने निवेश पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं।
सेबी में रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और SahajMoney.com के फाउंडर अभिषेक कुमार के अनुसार, “ये प्रतिबंध खुदरा निवेशकों को सोने के आयात शुल्क में तेज बढ़ोतरी के बाद बड़ी रकम एकमुश्त निवेश करने से रोकने और उन्हें संभावित जोखिम से बचाने के लिए लगाए गए हो सकते हैं। AMC संभवतः सट्टेबाजी जैसी गतिविधियों पर भी अंकुश लगाना चाहती है।”
कुमार का यह भी कहना है कि एक अन्य वजह फिजिकल सोने की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां हो सकती हैं। सप्लाई संबंधी समस्याओं के कारण एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) को पर्याप्त मात्रा में सोना जुटाने में दिक्कत आ रही हो सकती है।
एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि निवेशकों को इन पाबंदियों को लेकर सतर्क रहना चाहिए। हालांकि, इसे नेगेटिव रिटर्न का सीधा संकेत नहीं माना जाना चाहिए। कुमार के मुताबिक, “ऐसे कदम आमतौर पर रिस्क मैनेजमेंट का संकेत होते हैं, न कि यह बताने के लिए कि आगे रिटर्न खराब रहने वाले हैं।”
मौजूदा निवेशकों को फिलहाल ऊंचे भाव पर सोने में नई बड़ी रकम (लंपसम) लगाने से बचना चाहिए। उन्हें सबसे पहले अपने पोर्टफोलियो में तय एसेट एलोकेशन की समीक्षा करनी चाहिए।
कुमार के अनुसार, “यदि हालिया तेजी के कारण आपके पोर्टफोलियो में सोने का हिस्सा तय लक्ष्य से ज्यादा हो गया है, तो कुछ मुनाफावसूली (पार्शियल प्रॉफिट बुकिंग) पर विचार किया जा सकता है।”
एक्सपर्ट्स का कहना है कि निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में सोने का रणनीतिक आवंटन बनाए रखना चाहिए, लेकिन मौजूदा स्तरों पर आक्रामक तरीके से निवेश बढ़ाने से बचना चाहिए।
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नए निवेशकों को भी मौजूदा कीमतों पर गोल्ड फंड्स में बड़ी एकमुश्त रकम निवेश करने से बचना चाहिए।
कुमार के मुताबिक, “जिन निवेशकों के पोर्टफोलियो में अभी सोने का कोई निवेश नहीं है, उन्हें सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) जैसे अनुशासित और चरणबद्ध तरीके से निवेश शुरू करना चाहिए।”
एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि किसी भी निवेशक के कुल पोर्टफोलियो में सोने की हिस्सेदारी 5 से 10 फीसदी के बीच ही होनी चाहिए। साथ ही, सोने में निवेश कम से कम सात साल के नजरिये के साथ करना बेहतर माना जाता है।